| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 03.28.2009 |
|
सललि - दोहे |
|
अजर अमर अक्षय अजित, अमित अनादि अनंत। प्रणवाक्षर ओंकार ही, रचता द्रिष्ट-अदृष्ट। चित्र गुप्त साकार हो, तभी बनें आकार। कण-कण में बस वह करे, प्राणों का संचार। स्वामी है वह तिमिर का, वह प्रकाश का नाथ। कंकर-कंकर में वही शंकर, तन में आत्म। वह विदेह ही देह का, करता है निर्माण। वह घट है आकाश में, वह घट का आकाश। वह ही विधि-हरि-हर हुआ, वह अनुराग-विराग। वही अनामी-सुनामी, जल-थल-नभ में व्याप्त। उससे सब उपजे, हुए सभी उसी में लीन। वही नर्मदा नेह की, वही मोह का पाश। वह हम सब में बसा है, किसे कहे तू गैर। कौन पराया तू बता?, और सगा है कौन? उत्तर-दक्षिण शीश-पग, पूरब-पश्चिम हाथ। भारत माता कह रही, सबका बन तू मीत। सच्चा राजा वह करे जो हर दिल पर राज। |
|
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|