| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 03.28.2009 |
|
अम्ब विमल मति दे |
|
अम्ब विमल मति दे नन्दन कानन हो यह धरती। बहे नीर अमृत सा पावन। कंकर से शंकर गढ़ पायें। हरा-भरा हो सावन-फागुन। नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें। |
|
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|