| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.17.2007 |
|
थम सी गई पृथ्वी संजीव बक्षी |
|
काल थोड़ा और आगे बढ़ गया
मैं उस चौराहे पहुँच गया
बाल थोड़े और सफेद हो गए बच्चे हो गए जवान
बसंत आ गया फिर कि लगा थम सी गई है पृथ्वी
एक कविता लिख गई इस बीच नाटक के पात्र ने रच लिया संसार
कि फिर घूम गई पृथ्वी ।
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|