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04.30.2012
 
थम सी गई पृथ्वी
संजीव बक्षी

काल  थोड़ा और आगे बढ़ गया
थोड़ा और साफ हो गया आकाश

मैं उस चौराहे पहुँच गया
कमल  थोड़ा और खिल गया 
थोड़ी और तन गई पतंग की डोर

बाल थोड़े और सफेद हो गए
आ गई झुर्रियॉ थोड़ी और

बच्चे हो गए जवान

बसंत आ गया फिर
फिर दीवाली आ गई
अभी जो की थी घर की सफाई-पुताई
दीवारों पर दिखने लगा फिर से
वही पुरानापन

कि लगा थम सी गई है पृथ्वी

एक कविता लिख गई इस बीच
एक चित्र बन गया

नाटक के पात्र ने रच लिया संसार

कि फिर घूम गई पृथ्वी ।


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