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12.23.2008
 
पेड़ ..एक
संजीव बक्षी

औरों के लिए यह एक खेल है
मेरे लिए परीक्षा की घड़ी
सबकी नज़रें
मेरी ओर टिक गई है
मुझे अपने आप को
‘पेड़ साबित करना है’
पुर्जा निकला है मेरे नाम
‘पेड़’ लिखा है पुर्जे में
कैसे हो सकता है यह
मैंने तो कभी
पेड़ को महसूसा नहीं
इस तरह कि
साबित किया जा सके
अपने आप को पेड़

याद करता हूँ
घने जंगल में
बकरियों को चराता
वह साँवला सा बच्चा
झपकते ही पलक
कभी छुप जाता
पत्तों में तो कभी
पेड़ की ऊँचाई पर होता

मैं न होता
वह बच्चा होता यदि
साबित कर लेता वह
आसानी से
अपने आप को
‘पेड़’
मैंने हरेपन से
इन दिनों
कुछ परहे भी कर लिया है
दरअसल
मुझे चढ़ना तक नहीं आया
अब तक
        पेड़ों पर
            और वैसा तो कतई नहीं
               जैसा चढ़ जाता था
                   जंगल का
                     वह बकरी चराने वाला बच्चा

सच कहूँ तो अभी
मुझे ईर्ष्या होने लगी थी
उससे

मुझे लग रहा था
अपने आपको
पेड़ साबित करने के लिए
पहले मुझे
अपने आपको
बकरी चराने वाला
वह बच्चा साबित करना होगा
सोचता हूँ
यह तो और भी कठिन है
पेड़ तो फिर भी पेड़ है
दूर से ही सही
मैंने देखा तो है उसे
छुआ भी है
कोशिश करूँ
जितना भी बन सकूँ
पेड़ बनूँ

चित्रों में
पा लेते हैं ये पेड़
ज़्यादा तारीफ़
टहनियाँ भी खूब जमती है
चित्रों में
बहुत भाती है
असल से भी अधिक

हाँ वह एक कविता
उसमें सीधी सपाट कई
लाईनों के बाद जब
पेड़ की एक टहनी आती है
कितनी प्यारी लगती है
जैसे हज़ार हज़ार कलियाँ
एक साथ खिल गई हों

मेरे चेहरे की इस आवाजाही कुछ ढूँढते
सबकी नज़रें
मुझ पर टिकी हैं
और अब भी मैं प्रयासरत हूँ
किसी तरह बन जाया जाय पेड़

पीपल के पत्तों को
मैं भी देखता हूँ
चित्रकार भी देखते हैं
बकरियाँ भी देखती हैं
पर कहाँ मेरा देखना
और कहाँ बकरियों का देखना
यदि कहा मुझे
पीपल का पत्ता बनों
मैं कुछ और बनूँगा
पर वह नहीं जो
बकरियाँ बनेंगी

अब तो पसीना पसीना हुआ जा रहा था
मेरा चेहरा

नहीं बन पाने का ’पेड़’
मुझे दर्द था
भाव उतर आया था
बुरी तरह
मेरे चेहरे पर
कि तब ही एक साथ
तालियाँ बज उठती हैं
सारे हाल में, सब ओर
सबके मुँह
एक ही शीर्षक
                 ’पेड़ की व्यथा’
                 ’पेड़ की व्यथा’


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