संजीव बक्षी

कविता
आत्मविश्वास
उसमें सब कुछ था
कमाल की लाईन है
कौमी एकता एक उष्मा
जंगल का सागौन
तब की बात
थम सी गई पृथ्वी
पाप ही पाप
पेड़ ..एक
पेड़...दो
मुख्यधारा
मुझे जंगली कहो
यह, चश्मा है श्रीमान
यह जूता है भाई साहब
यहाँ पीपल की छाँव है
वे पहाड़ हो गए हैं