| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.31.2008 |
| मधुरिम मधुरिम हो लें आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप" |
|
परिणय के धागे में प्रियतम प्रणय-प्रसून पिरो लें । मधु-मानस-मण्डप में अब हम मधुरिम-मधुरिम लें ।। सस्वर मंत्रगान सा करते बन पर्जन्य-पुरोहित, अभिमंत्रित अमृत वर्षण कर करते ताप तिरोहित । मधुर-मिलन के परम वचन हम सप्तपदी पर बोलें ।। देखो हरित् धरित्री पर अति हर्षित नील गगन है , क्षितिज पार आलिंगन करता कैसा मुदित मगन है । आओ हम भी बीज आज अद्वैत प्रेम का बोलें ।। देख रही ये अपलक सुभगा ले हिय प्रिय उन्माद मदिर मदिर ये अधर चाहते केवल प्रेम-प्रसाद । हीरक-हार हृदय सुन्दरतम हर अवगुण्ठन खोलें ।। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|