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| 09.06.2008 |
| हिन्दी महिमा -१ आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप" |
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नहीं मात्रभाषा बल्कि मेरी मातृभाषा प्यारी
हिंदी हिंदुस्तान का हृदय हुलसाती है॥ खुसरो अमीर खानखाना वो अब्दुर्रहीम सूर तुलसी कबीर काव्य कुल थाती है॥ भूषण भणे हैं इसी भाषा में कमाल लाल छ्त्रसाल-यश, शिवा-बावनी गुँजाती है॥ खड़ीबोली लल्लूलाल भारतेंदु से निखर विश्वभाषा बन रोम रोम पुलकाती है॥१॥ |
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