प्रवासी वेदना: नशे का गुलाम मैं समीर लाल 'समीर'
कभी जी भर पीने का ख्वाब लिये बेवतन हो दरदर भटक रहा हूँ मैं सुरा ना जाने वो मिलती है किस जहाँ जिसकी हर पल तलाश कर रहा हूँ मैं। प्यास बुझाने को है काफी घर में मगर नशे में मद मस्त होने मचल रहा हूँ मैं जानता हूँ ये है एक मरीचिका मगर नशे का गुलाम प्यासा मर रहा हूँ मैं