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05.31.2008
 

गीत खुशी के
समीर लाल 'समीर'


जब पेड़, से कोयल कुहकेगी
फिर फूल खिलेंगे आँगन में
जब मिट्टी मे सोंधी खुशबू
मन झूल उठेंगे सावन में

तब मतवाला हो कर के मैं
एक दुनिया नई सजाऊँगा
तब गीत खुशी के लिख दूँगा
और गा कर तुम्हें सुनाऊँगा।

जब होली और दीवाली पर
रौनक होगी बाज़ारों में
जब घंटों की गुंजार उठेगी
मंदिर के गलियारों में

तब ईशकृपा से नतमस्तक
मै श्रद्धा सुमन चढ़ाऊँगा
तब गीत खुशी के लिख दूँगा
और गा कर तुम्हे सुनाऊँगा।

जब फिर से बदली छायेगी
और मेघ गाये मल्हारों में
जब मै भी शामिल हो पाऊँगा
खुशियों और त्यौहारों में

तब कलम उठा कर हाथों में
एक नया दौर लिख जाऊँगा
तब गीत खुशी के लिख दूँगा
और गा कर तुम्हें सुनाऊँगा।


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