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| 05.31.2008 |
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अपराध बोध |
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अगस्त की
उमस भरी शाम। पीछे रेलवे क्वार्टर की सिगड़ियों से उठते कोयले के धुएँ की
खुशबू पूरे माहौल मे भरी हुई थी। ये महक मुझे शुरू
से बहुत भाती है।
हवा खाने
के लिये मैं अपने दूसरी मंजिल के फ्लैट की पीछे वाली बालकनी में निकल आता
हूँ। सिगरेट जलाते ही मेरी नज़र उन दो आँखों से टकरा जाती है,
जो
पिछवाड़े के क्वार्टर के आँगन से मुझे ही ताक रहीं थी। मैं चाह कर भी उसकी
नज़रों से अपनी नजरें नही हटा पाया और एकटक उसे देखने लगा।
कितनी
गहरी और बोलती हुई आँखें हैं। माथे पर अल्हड़ता से बिखरी जुल्फ़ें और पसीने
से बेतरतीब हो गई वो सिंदुरी बिंदिया। एक पुरानी सी धानी रंग की सूती साड़ी
मे लिपटी वो बला की खुबसूरत लग रही थी।
ऐसा नहीं
कि मैंने पहले कभी उसे नहीं देखा मगर आज पहिली बार नज़रें चार हुईं थी। उसकी
आँखों मे एक अजब सा प्रश्न चिन्ह और चेहरे पर आंतरिक वेदना की एक परत।
वो शायद
सिगड़ी उठाने ही बाहर निकली थी। नज़रों के मिलते ही वो जड़वत जहाँ की तहाँ
खड़ी रह गई। काँपते होंठ जैसे कुछ कह देने को आतुर और आँखें अपने भीतर छिपी
असंख्य वेदनाओं का इज़हार करने को बेकरार।
एकाएक
उँगलियों के बीच जलन से बिना पिये सिगरेट खत्म होने की तरफ जैसे ही ध्यान
गया,
हाथ जोर से झटक कर सिगरेट फेंकी। मेरी हालात देख वो बस धीरे से मुस्कराई।
हमारी नज़रें फिर भी एक दूसरे को ही देखती रहीं। कब शाम ढल गई और अंधियारा
घिर आया,
पता ही नही लगा।
एकाएक
उसके घर के दरवाजे पर उसके पति की दस्तक सुनते ही घबड़ा कर वो अंदर भाग गई।
मै वहीं बालकनी मे कुर्सी खींच कर बैठ गया। मन अभी भी उसके आँगन मे ही विचर
रहा था।
उसके घर
से चिल्लाने की आवाज आ रही थी। शायद उसका पति पीकर नशे मे घर लौटा था।
वो चिल्ला
रहा था.. स्स्साआली,
दिन भर पड़ी पड़ी आराम करती रहती है और अब कह रही है अभी खाना बनने में समय
लगेगा... वो बुरी बुरी गालियाँ बकता जाये और उसे बुरी कदर मारता जाये। उसके
रोने की आवाज़ भी मेरे कानों को भेद रही थी।
न जाने वो
कब तक उसे मारता और चिल्लाता रहा। मुझसे सहा ना गया। मैं उठकर भीतर चला आया,
एक
आत्मग्लानि का एहसास लिये कि मेरी वजह से बेचारी की क्या हालत हो रही है। न
मैं बालकनी में निकलता,
न
उससे नज़रें टकराती और न ही खाना बनाने में उसे देर होती... मैं अपराधबोध से
घिरता चला गया।
इस वाकये
को दो हफ़्ते बीत गये हैं। आज फिर बहुत उमस है। शाम हो रही है,
अभी अभी दफ़्तर से लौटा हूँ। कुछ ताजी हवा खाने का मन है लेकिन आज मैं घर की
सामने वाली बालकनी मे आकर बैठ जाता हूँ। उस रोज का सिगरेट से जलने का घाव तो भर गया है, मगर उसकी जलन और अपराधबोध, दोनों अब तक ताज़े हैं। |
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