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| 01.16.2009 |
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शून्य से शिखर हो गए सजीवन मयंक |
| शून्य से शिखर हो गए। और तीखा ज़हर हो गए।। कल तलक जो मेरे साथ थे। आज जाने किधर हो गए।। बाप-बेटों की पटती नहीं। अब अलग उनके घर हो गए।। है ये कैसी जम्हूरी यहाँ। हुक्मरां वंशधर हो गए।। क्यो परिन्दे अमन चैन के। ख़ून से तरबतर हो गए।। भूल गए हम शहीदों को पर। देश द्रोही अमर हो गए।। |
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