अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
07.03.2007
 
समर्पण
सजीवन मयंक


मेरे गीत,
उन पाँवों के छालों के मरहम बनें ।
जिन्होंने नवचरणों को राह दी ।।

मेरे दीप,
उन गाँवों में सूरज बन जले ।
जिन्होंने जीवन को वासंती चाह दी ।।

मेरी तरुणाई,
उन बूढ़े वृक्षों को मिले ।
जिन्होनें हमें मीठे फल दिये ।।

मेरी उमर,
उन महाचरणों को मिले ।
जिन्होने हमें
स्वतंत्र पल दिये ।।

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें