| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 04.30.2007 |
| हम ने जितना खोया उतना मिला नहीं। सजीवन मयंक |
| हम ने जितना खोया उतना मिला नहीं। फिर भी किसी से हमको कोई गिला नहीं।। अभी अभी तूफान यहाँ से गुज़रा है। लेकिन उससे पत्ता भी तो हिला नहीं।। काँटे उग आये इंसानी पेड़ों पर। अपनेपन का फूल एक भी खिला नहीं।। नक्शे हैं तैयार सुनहरे दिन वाले। मगर अभी तक शुरू कोई सिलसिला नहीं।। हम उन राहों पर चलने के आदी हैं। जिस पर अब तक चला कोई काफ़िला नहीं।। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|