कविता
आज कोई तो फैसला
होगा
आने वाला कल देखो
ईमानदारी से चला
...
उसी को
कुछ कहते ...
एक भी खिड़की नहीं
कहने लगे बच्चे कि ...
जब कभी मैं अपने
अंदर ...
दुनियाँ में ईमान धरम ....
दूर बस्ती से
जितना घर होगा
नया सबेरा
नये पत्ते डाल पर
आने लगे
बात कुछ की कुछ
मछेरा ले के जाल
आया है
रोशनी देने इस
ज़माने को
शब्द को कुछ इस तरह
समर्पण
हम ने जितना
खोया
हर दम मेरे पास रहा है