Sahitya Kunj – साधना सिंह – Sadhna Singh

अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.06.2017


काश..

कभी कहीं दरिया के किनारे..
किन्हीं बादलों के छाँव तले
काश हम बैठें और
दोनों पाँवों से पानी के छीटें उड़ाते
निहारते रहे उस सूरज को
जो दुनियाँ मे उजाला बाँटकर
अपने घर को लौट रहा हो
और जाते-जाते भी हमारे सारे
अरमानों को अपने नारंगी रंग दे जाये
लहरें गुनगुना कर अपने सारे तरंग
हममें भर जाये..

काश.....
काश कोई गोधूली बेला तुम्हें
हम तक खींच लायें
और काश कोई सुनहरी सुबह
तुम्हारे जाने का रास्ता भुला जाये...
ऐसा ना हो तो ख़ैर कोई बात नहीं,
बस मेरे ज़ेहन से ये सारे ख़्याल
उस अंतहीन आसामान के आग़ोश में समा जायें...


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें