अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.12.2015


जन्नत

क़बीला बनी आदम के सरदार अबू आदम के घर एक बहुत ही हसीन और जमील बेटी ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया जन्नत। जन्नत के हुस्न-ओ-जमाल में एक ऐसा अलौकिक आकर्षण था कि उसे जो भी देखता, देखता ही रह जाता था। उसकी आँखों की टकटकी बच्ची के चेहरे से हटने का नाम ही नहीं लेती थी। जन्नत थी ही इतनी ख़ूबसूरत। जब खुद माँ-बाप ने उसे पहली बार देखा, तो दोनों ही अपना आपा खो बैठे। होश में आए तो सीधे-सीधे ख़ुदा के सामने सजदे में गिर पड़े कि उसने उन्हें इतनी हसीन और जमील बेटी अता की। पर यह खुशी बहुत ही जल्द परेशानी में बदल गयी।

अबू आदम की चची ख़ानम बीबी ने, जैसे ही जन्नत को देखा, तो वह एकटक उसे निहारती ही रहीं। फिर जब सँभलीं, तो झट से अपनी उँगली से चाँदी की अँगूठी उतार, जन्नत के दूध के प्याले में डाल दिया, और ऐलान कर दिया, कि हसीन और जमील जन्नत उनकी बहू बनेगी। उधर बेगम आदम, उनकी इस हरक़त पर जल-भुन कर राख हो गई। बेगम ने अबू से साफ-साफ कह दिया, कि जन्नत चची के घर नहीं जाएगी। और अगर इस मसले पर किसी भी तरह की ज़ोर ज़बरदस्ती की गयी, तो वह खुद, और जन्नत दोनों ज़हर खाकर मर जाएँगी।

अबू ने बेगम को समझाया, "बेगम, कैसी बच्चों जैसी बातें करती हैं आप। आप तो जानती हैं, यह क़़बीलायी रस्म है। फिर चची को अभी इस मुक़ाम पर कैसे मना किया जा सकता है। यह ठीक नहीं होगा। बेवज़ह का बवाला खड़ा हो जाएगा। जन्नत को बड़ी होने दीजिए। एक ज़माना पड़ा है अभी। आगे चलकर देखा जाएगा। वैसे भी अगर ऐसा हो भी जाए तो इसमें क्या बुराई है। मेरा भतीजा कोई ऐसा काना-कुतरा या बदशक्ल तो नहीं है। माशा-अल्लाह अपनी जवानी पर हट्टा-कट्टा और सजीला नौजवान निकलेगा। तो आख़िर इसमें क्या बुराई है।"

"और मेरी ज़बान, जो मैंने अपने भाई को दे रखी है, कि अगर मेरे बेटी हुई, तो मैं उसे अपने भतीजे के साथ और अगर बेटा हुआ, तो भतीजी के साथ ब्याहूँगी। उसका क्या, आपको तो पता है न। और उस वक्त आप भी मेरी हाँ में हाँ मिला रहे थे।" बेगम अबू ने पलट कर सवाल किया।

अबू ने कुछ उलझते हुए कहा, "हाँ-हाँ ठीक है बेगम, देखा जाएगा। अभी तो ज़माना पड़ा है इन सब बातों को। देखेंगे। अल्लाह को क्या मंजूर है। और बेगम, जिस अल्लाह ने हमें इतनी हसीन बेटी अता फ़रमाई है आख़िर उसने भी तो उसके लिए कुछ सोच रखा होगा। वह कहते हैं न, कि जोड़े तो जन्नत में ही बन जाते हैं। तुम अपनी और मेरी मिसाल लो। दुनिया ज़माने के न चाहते हुए भी हमारी शादी हुई या नहीं।" अबू ने थोड़ा बेगम के मिज़ाज को ख़ुश करने के लिए, यह बात कहते-कहते, बेगम, के कन्धे से कन्धा ज़रा प्यार से टकरा दिया। बेगम ने थोड़ा लजाते हुए कहा, "अरे हटिए आप भी।"

जैसे-जैसे जन्नत बड़ी होने लगी, उसकी ख़ूबसूरती की रोशनी घरों की दीवारें फलाँग कर चारों ओर फैलने लगी। बात वही, जो भी जन्नत को देखता, उस पर एक जान छोड़ हज़ार जान से फिदा हो जाता, और जो उसकी ख़ूबसूरती की चर्चा सुनता, दिल में उसे देखने की हसरत लिए घर-मोहल्ले के चक्कर लगाता। अब तक कई कबीले के बाअसर लोग अबू के पास अपने बेटों के साथ जन्नत की शादी का पैगाम भेज चुके थे। बात हद से आगे तब बढ़ गयी जब यह बात बनी आदम क़बीले से निकल कर और क़बीलों तक जा पहुँची।

अबू आदम के घर रोज़ाना, किसी न किसी क़बीले का सरदार इसी गरज़ से हाज़िर होता। कोई अपने बेटे के रिश्ते की बात करता, तो कोई खुद अपने ही लिए जन्नत का हाथ मांगता। अजब उलझन थी। अबू इस बात से इतना परेशान हुए, कि उन्होंने ऐलान कर दिया, कि जब तक जन्नत शादी के लायक नहीं हो जाती, तब तक इस सिलसिले में वह किसी से कोई बात नहीं करेंगे, और न ही कोई उनके पास इस सिलसिले में बात करने आए। उनके इस ऐलान से रिश्तों की बाढ़ में कुछ कमी तो आयी, फिर भी यह सिलसिला एकदम बन्द नहीं हुआ। नतीजतन, अबू की कुछ लोगों से कहासुनी और अनबन भी हो गयी।

बात यहाँ तक पहुँच गयी, कि अबू के सुनने में आया कि कुछ सरदारे क़बीला जन्नत का अपहरण करने की ताक में हैं। अबू की परेशानी में यह एक नया इज़ाफा था। अबू को जन्नत की हिफ़ाजत की फ़िक्र सताने लगी। जन्नत को एक बहुत ही मज़बूत और हर तरह से महफूज़ महल में बन्द कर दिया गया। महल के चप्पे-चप्पे पर पहरा बिठा दिया गया। बहुत ख़ास लोगों को दिन रात जन्नत की हिफ़ाजत में लगाया गया। बेगम अबू तो एक पल भी जन्नत को अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देतीं।

यह मसला अब अबू आदम के घर का निजी मामला नहीं रह गया, बल्कि यह बनी आदम क़बीले की नाक और आन-बान-शान का मसला भी बन गया, कि कैसे कोई और क़बीला हमारे क़बीले की एक लड़की पर अपना दावा ठोक सकता है, और उसे ज़बरदस्ती उठा ले जाने की हिम्मत कर सकता है। इस बात पर सारा क़बीला लामबन्द हो गया। बात यहाँ तक पहुँची कि क़बीला बनी आदम ने अपने सहयोगी क़बीलों की एक सभा बुलाकर, सारा मसला उनके सामने रखा। जन्नत हमारी बेटी है, वह हम में से किसी के घर की ज़ीनत बने यह अलग बात है, पर उसकी इज़्ज़त पर ग़ैर आँख उठाकर देखे, यह हमारी ग़ैरत को कैसे गंवारा हो सकता है। सबने एक सुर में कहा, कभी नहीं, कभी नहीं। अगर जन्नत की तरफ किसी ग़ैर ने बुरी नज़र डाली, तो हम उसकी आँखें निकाल लेंगे, हाथ बढ़ाया, तो हाथ तोड़ देंगे। हम जन्नत की इज़्ज़त की हिफ़ाज़त अपनी जान देकर भी करेंगे।

जब यह ख़बर जंगल की आग की तरह फैली, कि क़बीला बनी आदम और उसके सहयोगी क़बीलों ने एक साथ मिलकर यह फैसला लिया है, तो क़बीला बनी आदम के जानी दुश्मन, क़बीला बनी हैवान ने मौका अच्छा हाथ आया देख, बनी आदम के दुश्मन कबीलों और अपने सहयोगी कबीलों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। उनकी एक सभा बुलाई गई और मसला सबके सामने रखा गया। सबने एक साथ मिलकर फैसला लिया कि बनी आदम और उसके सहयोगी क़बीलों ने हमारी ग़ैरत को ललकारा है। लिहाज़ा जन्नत हम में से ही किसी क़बीले की जीनत बनेगी, चाहे इसके लिए खून की नदियाँ ही क्यों न बहानी पड़ें।

और एक दिन वह भी आ गया कि दोनों क़बीले इसी बात को लेकर आमने-सामने आ डटे। मरने-मारने और ख़ून बहाने पर उतारू हो गए। इससे पहले कि तीर-तलवार, भाले-बरछी चले, सर कटें, लाशें गिरें, कुछ समझदार लोगों ने मसले को बातचीत से सुलझाना चाहा, लेकिन कौन किसकी सुनता। ढोल-ताशे पीटे जाने लगे, नगाड़े बजाए जाने लगे। दोनों एक दूसरे को जंग के लिए ललकारने लगे। तीर छूटे, भाले चले, घुड़सवार एक दूसरे से भिड़े, पैदल आपस में गुत्थम-गुत्था हो गए। हर तरफ एक ही मंजर था। मरो या मारो। सर कट रहे थे, धड़ गिर रहे थे, लाशों पर लाशें ढेर हो रहीं थीं। दोनों तरफ के सरदार अपने-अपने लड़ाकों की हिम्मत बढ़ा रहे थे। बढ़-बढ़ कर हमला करो आगे बढ़ो। दुश्मन पर टूट पड़ो, कोई बच कर न जाने पाए। इज़्ज़त पर आन पड़ी है। जान भले चली जाए, पर आान-बान न जाने पाए, युद्ध गीत गाए जा रहे थे। लड़ाके दाँतों को भींचे, तलवारें सूते, एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे।

शाम होते-होते, क़बीला बनी आदम के पैर उखड़ने लगे। क़रीब-करीब उनके सारे बड़े योद्धा मारे जा चुके थे। दूसरी पंक्ति भी क़रीब-क़रीब खत्म हो चुकी थी। तीसरी पंक्ति भी हिम्मत हार चुकी थी, फिर भी कुछ लोग अभी भी अपने दम-ख़म से मोर्चा रोके हुए थे। लेकिन कब तक। आख़िर उनके भी पैर उखड़ गए, और भगदड़ मच गई। हारे हुओं पर जीते हुए लोग और भारी पड़े। पीछे से उन पर आ पड़े। बचे-खुचे सब काट डाले गए। बनी हैवान ने फतह का डंका बजा दिया।

मैदाने जंग से छुटे सारे लड़ाकों ने, उस महल को घेर लिया जिसमें जन्नत थी। पहरेदार पहले ही रफूचक्कर हो चुके थे। महल के मज़बूत दरो-दीवार उखाड़ कर फेंक दिए गए। लोग अन्दर पिल पड़े। जन्नत को ढूँढा जाने लगा। एक कमरे से दूसरे कमरे में, कमरों से दालान में, महल का कोना-कोना छान मारा गया,पर जन्नत नहीं मिली। सरदारों ने कहा ढूँढो यही कहीं होगी,कहाँ जा सकती है। महल के तहख़ाने छान डाले गए सारे ख़ुफिया रास्ते भी खंगाले गए। यहाँ तक कि पूरा महल ही खोद डाला गया। पर जन्नत को न मिलना था न मिली। न जाने उसे ज़मीन खा गई या आसमान निगल गया। पर सिरफिरों ने कहा हमारी तलाश जारी रहेगी, क़यामत तक जारी रहेगी। हम जन्नत को ढूँढ कर रहेंगे। तलाश आज भी जारी है। जंग आज भी जारी है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें