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08.11.2007
 
स्वर्ण देवता दलित देवता
एस. आर. हरनोट
भाग - ४

इस बात ने तूल पकड लिया था। बात आग की तरह हर जगह फैल गई। जहाँ देखो यही चर्चा थी। मुझे गाहे-बगाहे खबर मिल जाती। गाँव में तो ब्राह्मण और कनैत बिरादरी के लोग मुझे देख कर ही मुँह चिढ़ा लेते। सामने से आते तो किनारा कर लेते। कुछ-कुछ अपनी बिरादरी में भी ऐसा ही माहौल था, जैसे मुझे कोई अछूत रोग लग गया हो। मुझे दुख पिता जी का था कि उनके हृदय को बहुत चोट पहुँची है। उनके जख्मों को भरने का मेरे पास न कोई उपाय था न ही अब कुछ कहने की हिम्मत।

एक दिन फिर देवता की कहीं जातरा थी। एक कारदार गाँव-परगने में सभी को बुला गया था। वह पिछली शाम पिता के पास भी आया था।

पिता सुबह से ही शहनाई का अभ्यास करने लगे थे। उन्होंने शहनाई बड़े दिनों से उठाई थी। वरना सुबह-शाम वे बराबर अभ्यास करते रहते थे। बीमारी के कारण शायद पहले उन्होंने तय किया होगा कि बेटा ही अब इस काम को संभाल लेगा पर उनके मन की वह आस भी जाती रही थी। जब मेरे कानों में शहनाई के पत्तों की पीं...पीं..और चीं...चीं सुनाई पड़ी तो मेरा मन कुछ शान्त हुआ। सोचा कि देवता कमेटी ने शायद कोई कड़ी सजा नहीं सुनाई है। इसीलिए पिता देवता के साथ जाने की तैयारी करने लगे हैं। मुझे भेजने का तो अब सवाल ही न था। उन्होंने अभ्यास तो डट कर किया लेकिन देवता के साथ आज वे भी नहीं गए। कई बार एक लड़का उन्हें बुलाने आया पर हर बार उन्होंने अनसुना कर दिया।

 मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। पिता का कई दिनों बाद शहनाई का अभ्यास। बीच-बीच में उठना और मुझे देख जाना। चेहरे पर सहजपन। उन्होंने आँगन में आकर आज दो-तीन बार चिड़ियों को चावल भी डाले थे और उनके लिए पेड़ में टाँगे पानी के पौ में पानी भी भर दिया था। कई दिनों बाद आँगन में चिड़ियों की चहचाहट भर आई थी। इसका मतलब मेरी बात का..........? इतना सोच कर मैं मन ही मन खुश हो गया। पर पिता के सामने जाने का साहस नहीं हुआ। न ही उन्होंने मुझ से कोई बात की। लेकिन मैं जैसे आज सातवें आसमान पर उड़ रहा था।

अन्धेरा हुआ तो अपना ट्रंक खोला। पिछले सप्ताह पिता ने मुझे टेरीकोट का साढ़े पाँच मीटर कपड़ा सादे सूट के लिए लाया था। मैंने चुपके से वह निकाला। काछ के बीच दबाया और बिल्ली के पाँव आँगन से निकल कर देवता के मन्दिर की तरफ भाग गया। हाँपता हुआ पहुँचा। शुक्र है कोई रास्ते में नहीं मिला। पहुँच कर इधर-उधर देखा। वहाँ कोई नहीं था। जूते बाहर खोले। गेट के भीतर गया। द्वारपाल देवता की मूर्ति के सामने आकर मथा टेका। सूट के कोरे कपड़े की तहें खोली और उसे मूर्ति के सिर से लेकर पाँव तक लपेट दिया।

बाहर इतमिनान से निकला। जूते पहने। पहले मन किया कि छोटे रास्ते से निकल जाऊँ पर मन हुआ कि ब्राह्मणों की बेड़ से ही चला जाए।

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