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08.11.2007
 
स्वर्ण देवता दलित देवता
एस. आर. हरनोट
भाग - ३

दूर घाटी से गुजरती सड़क से कोई रात्री बस सेवा गुजरी। मोड़ काटते हुए उसकी लाइट सीधी मेरे आसपास पड़ी तो मैं चौंक गया। एक पल तो पता ही नहीं चला कि क्या हुआ। दोबारा मोड़ काटते हुए जब उसकी रोशनी सीधी मेरे मुँह पर पड़ी तो मन सहज हुआ। माथे पर हाथ गया तो उँगलियाँ भीग गई। पसीने से तरबतर। नीचे बूँदे टपक रही थी। हालांकि मुझे बैठे काफी समय हो गया था लेकिन उस घटना को याद करते हुए स्मृतियों में उसे पूरी तरह दोबारा जी लिया।

धीरे से उठा। चलना शुरु किया। आसमान की तरफ पुन: नजर गई। आकाश गंगा उत्तर की तरफ चली गई थी। सप्तऋषि तारे पश्चिम की तरफ बढ़ रहे थे। एक बहुत बड़ा तारा चमकतादिखाई दिया। ध्रुव तारा। रात अभी भी काफी है मैंने सोचा। पर घर जाने से कतरा गया। कुछ दूर चलने के बाद फिर एक जगह बैठ गया।

मेरे सामने कई चीजें एकाएक खड़ी हो गई। सबसे पहले जो बात मन में उठी वह देवता को लेकर थी। यह देवता आखिर है किसका? स्वर्णों का या हम सभी का। सचमुच वह देवता है तो सभी का ही होगा। एसे न तो पुजारी या गूर ने कभी प्रत्यक्ष देखा और न ही सरपंचों या कारदारों ने। हमने भी नहीं देखा। बस एक परम्परा तय हुई, उसे पीठ पर उठाए नगाड़ों की तरह हम सभी ढोते चले गए। आज भी निभा रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी। लेकिन क्या इसमें एक खतरनाक साजिश नहीं रची गई?

सोचते हुए पहले तो मुझे सचमुच एक झटका सा लगा। मैं अंधेरे में खड़ा हो गया। आसपास कुछ नहीं था। मन का भ्रम........या देवता का डर..या इन तयशुदा परम्पराओं के विरुद्ध जाने का भय......। मस्तिष्क में कई बातें कौंधती रही।

जिस देवता को छोड़ कर मैं आया हूँ। वह तो उसके निशान मात्र है। रथ है। बहुत सुन्दर जिसे दो लम्बी कनातों पर बनाया गया है। कनाते चाँदी से मढ़ी हैं। शिखर पर सोने का बडा छत्तर है। उसके नीचे मुख्य देवता का एक सोने का मोहरा ( देवता का काल्पनिक चेहरा) है। साथ कई सहायक देवता हैं........एसी की तरह बड़ी देहरी के, जिनके मोहरे चाँदी और पीतल के हैं। एक मूर्ति याक के बालों के नीचे ढकी रहती है। बताते हैं कि वह किसी रकसीन यानी राक्षसी देवी की है। उसे खुली रखे तो उत्पात मचा देती है। उसकी जिधर भी नजर पड़ी सब कुछ वहीं ढेर। बस सुना है, होते किसी ने कुछ नहीं देखा। चारों तरफ चार छत्तर। चाँदी से बने हुए। चारों तरफ चाँदी की गाची यानी चौड़ी पट्‍टी है। उस पर गूर और पुजारी के नाम खुदे हैं........जैसे देवता उन्हीं का है। उसमें जो चार-पाँच किलो चाँदी लगा है वह देवता के नाम का है, निजी तौर पर किसी का भी कुछ नहीं।

पर देवता के भय से कोई कुछ नहीं कहता न पूछता। पूछे-टोके तो बागी। या देवता के खोट के प्रतिभागी। देवता नाराज तो कौन मनाए। आदमी हो तो सौ उपाए। सब कुछ सिर माथे। मुख्य देवता रथ पर चलता है। उसी में रहता है। उसी पर बैठता है। आलीशान कोठी है। दो मंजिली। जब जातरा नहीं होती, कोई मेला नहीं होता तो उस रथ को खोल दिया जाता है। उसके मोहरे भीतर बनी अट्‍टालिकाओं में रहते हैं। उनकी रोज पूजा होती है। सुबह-शाम। घी-दूध से। उसके लिए पुजारी नियुक्त है। ब्राहमण पुजारी। दूसरा नहीं हो सकता। देवता नहीं मानता? जब से गाँव बसा, देवता आया तभी से एक ही खानदान से पुजारी देवता की सेवा में लगा है। पहले उसका पड़दादा। फिर दादा। उसके बाद वह खुद। आगे उसके बेटे। पोते और पड़पोते।

मुख्य और सहायक देवताओं के इलावा कई दूसरे देवता भी हैं। हालांकि ये सभी उस देवता के अंग रक्षक या द्वारपाल है। उनकी न तो आलीशन कोठी हैं, न सोने-चाँदी के मोहरे हैं। न कोई रथ है। न छत्तर है। न ही कोई पालकी।

 देवता के साथ तीन देवता प्रमुख हैं। इन्हें द्वारपाल कहते हैं। पहला गेट के पास रहता है। उसकी आदमकद काले पत्थर की मूर्ति है। किसी अच्छे कारीगर ने घड़ी है। नंगधड़ंग। कपड़े के नाम से महज लिंग ढका है। न कोई चौबारा है न सिर पर किसी तरह की छत। धारणा यह है कि वह न तो कपड़े पहनता है न मन्दिर में रहता है। उसे नंगापन पसन्द है। बाहर खुले आसमान के नीचे रहना अच्छा लगता है।

दूसरे द्वारपाल की मूर्ति तक नहीं है। पुजारी बताता है कि उसे अपनी मूर्ति पसन्द नहीं। एक नुकीला लम्बा सा पत्थर जमीन में स्थापित है। चारों तरफ एक चबूतरा सा बनाया गया है। वहाँ कई लोहे के कड़ोले रखे हैं। उसी तरह के पहले द्वारपाल के गले में भी है। बाहों में भी है। आसपास भी है।

 तीसरे द्वारपाल की निशानी एक लोहे की गुरज है। मोटी लम्बी। उसे जमीन में गाड़ा गया है।

इन द्वारपालों को सोना नहीं चढ़ता। दूध नहीं चढ़ता। घी के दिए नहीं जलाए जाते। चाहे ब्राह्मण हो या दलित, जब कोई मन्नत करते हैं तो उनकी हैसियत देख कर। यानी द्वारपालों को अनछाणा आटा लाएँगे। लोहे के कड़े वे भी अनगढ़े हुए। दिया जलाना हो तो सरसों के तेल का। उसके लिए भी शुरु सरसों का तेल नहीं खरीदेंगे। जो सबसे घटिया होगा, सस्ता होगा उसे ले आएँगे। उन्हे घी से बनी कढ़ाई भी नहीं दी जाएगी। भोग के नाम से कच्चे आटे के रोट। न गरी न छुहारे। न केसर न सुपारी। न ही कोई कपड़ा। कपड़ा जितना आएगा वह बड़े देवता के रथ के लिए। उसी को ही सोना, चाँदी, दूध और घी। यानी जिसकी जैसी हैसियत वैसा चढ़ावा।

इतना ही नहीं उनके लिए गूर भी उसी तरह के। मुख्य देवता का गूर ब्राहमण। उसका दर्जा भी उतना ही बड़ा। उतनी ही इज्जत-परतीत। ऊँचा आसन। और जो द्वारपाल यानी दूसरे सहायक देवता उनके गूर दलित। वैसे ही स्थान। उतनी ही इज्जत-परतीत। उतना जैसा बोलबाला। गूर होने पर भी मंदिर का बरामदा तक छू लें तो दंडित।

बुजुर्ग बताते हैं कि गाँव का मुख्य देवता हम सभी का इष्ट है। कुल देवता है। पर हमें कभ मन्दिर की दहलीज तक भी जाना नसीब नहीं। मन करता है कि भीतर जाकर हम भी घी का दिया जलाएँ। धूप दें। बैठ कर उसकी पूजा करें, लेकिन हमारे लिए सब कुछ निषेद्ध। प्रतिबन्धित। बस दूर से हाथ जोड़ो और मन की मुराद पूरी। ज्यादा ही लोभ है तो बाहर बिठाए द्वारपालों के पास मथा टेको, रोट-आटा चढ़ाओ और मन्नतें माँग कर चलते बनो।

देवताओं में भी दलित देवता.....? स्वर्ण देवता.....? स्वर्ण तो फटाफट सीढ़ियाँ ऐसे चढ़ेंगे जैसे ये देवता इन्हीं के टब्बर-बिरादरी से हैं। पर इसमें शंका भी क्या....? जिस अधिकार से जाते हैं होगा ही। दलितों के लिए तो द्वारपाल यानी दलित देवते बाहर नंगधड़ग खड़े हैं। सर्दी में भी। गर्मी में भी। पाला भी उन्हीं के ऊपर। आँधी-तूफान भी इन्हीं पर। न कपड़ा-न लत्ता। बस घटिया से लोहे की तारों से बनाए कड़ोले। एक चढ़ा दो तो बेचारे प्रसन्न। पर आलीशान कोठी में बसा मुख्य देवता तो नहीं लेगा न लोहे का कड़ोला। किसी की हिम्मत जो उसे चढ़ा दे। नहीं तो उम्र भर खोट-दोष का भागी।

देवता की कथा याद आ रही है। पिता सुनाते हैं कई बार। गाँव में देवता कैसे आया। मन्दिर कैसे बना। किसने पहली बार उसे देखा। एक रात एक तुरी यानी ढोल बजाने वाला ब्याह-शादी बजा कर अपने घर लौट रहा था। गाँव से कुछ दूर पहुँचा तो झाड़ियों में किसी के कहराने की आवाज सुनाई दी। वह पहले खड़ा रहा। आवाज बन्द हो गई। चलने लगा तो आवाज फिर आने लगी। पहले उसने सोचा कि कोई छल हो रहा होगा। लेकिन आवाज आदमी के कहराने की थी। उसने हिम्मत की और झाड़ियों के बीच चला गया। जमीन से आवाज सुनाई दी। एक जगह कुछ पत्थर पड़े थे। उसने पत्थर किनारे किए। आवाज फिर भी बन्द न हुई। ढोल बजाने की एक छट्‍टी निकाल कर जमीन कुरेदने लगा। कुछ देर बाद उँगलियाँ किसी चीज से टकराई। वहाँ उसे चिपचपाहट महसूस हुई। दियासिलाई जला कर देखा तो वह खून था। घबरा गया। चमत्कार....? पहले रुका। फिर हिम्मत बाँध कर मिट्‍टी इधर-उधर करता गया। किसी कठोर चीज से हाथ टकराया। एक पत्थर की पिंडी थी जिससे खून बह रहा था। मफलर उसमें बाँध दिया। कहराना बन्द हो गया। खून भी अब नहीं निकल रहा था। कुछ देर बाद घर आ गया।

उस रात को उसे स्वप्न हुआ। एक आदमी सफेद घोड़े पर सवार आँगन में खड़ा है। माथे पर बड़ा सा तिलक। लम्बे बाल। बड़ी-बड़ी आँखें। घुटनों तक लटकती बाहें। सिर पर वही मफलर। निर्देश दे रहा है कि उसका मन्दिर उसी जगह बनाए। नहीं तो गाँव का सर्वनाश। वह देवता है। महाभारत काल का देवता। पाँडवों की तरफ से लड़ा था युद्ध में। गाँव में बसना-रहना चाहता है।

पहले भी कई घटनाएँ घट चुकी थी। जहाँ तुरी को पिंडी मिली थी वहाँ सुई हुई गाएँ चली जातीं और खड़ी हो जाया करती। उनके थनों से स्वत: ही दूध चूने-गिरने लगता। गाय खाली थन लिए घर लौटतीं। गावों वाले कई दिनों से परेशान कि आखिर माजरा क्या है?

जब दूसरे दिन तुरी ने गाँव में बताया तो सभी उस तरफ चले गए। लोगों ने देखा कि एक गोल पिंडी काफी बाहर निकल गई है और तुरी का मफलर भी उस पर बंधा है। उसके बाद गाँव के लोगों ने वहाँ मंदिर बनाया। गर्भगृह में वही पिंडी स्थापित की। उस देवता की छाया भी उसी तुरी में आई। कई बरसों तक वह गूर रहा पर उसके मरने के बाद पता नहीं कैसे मन्दिर पर स्वर्णों का कब्जा हो गया..?

आज जिन तुरियों के पुण्य से वह देवता गाँव में प्रकट हुआ था वे उसके मन्दिर तक को नहीं छू सकते। अछूत हो गए और ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व देवता पर भी स्थापित कर लिया। उस तुरी को कोई याद तक न करता। हाँ जब शहनाई, ढोल बजाने या नगाड़ा उठाने की बारी आती है तो पुजारी-पंच उस तुरी की दुहाई अवश्य देते हैं कि देवता को वे कितने प्यारे हैं। उनके बिना देवता एक कदम भी नहीं चल सकता। वे यदि देवता के कामकाज से पीठ फेरेंगे तो देवदोष के भागीदार।.......सचमुच मेरी हँसी निकल गई। मैं जैसे सपनों में ही हँसता रहा।

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