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08.11.2007
 
स्वर्ण देवता दलित देवता
एस. आर. हरनोट
भाग - २

अब तो आठवीं तक पहुँचते-पहुँचते मैं कई बार पिता को भी सीख देने लगा था कि वे इनकी इतनी आव-भगत न किया करें। बस पिता इसी बात से चिढ़ जाते। उनको मेरी यही एक बात पसन्द नहीं थी। मैंने अपने आप को पिता की खातिर काफी बदल दिया था परन्तु मन के घाव कभी नहीं भरे।

पिता कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। इसी बीच गाँव के देवता की जातर का कार्यक्रम बन गया। पिता को बीमारी ने कमजोर भी बना दिया था। उनका साँस भी फूल जाता। इसलिए शहनाई बजाने में उन्हें काफी तकलीफ होती थी। लेकिन देवता के साथ जाने की कार तोड़ना भी मुमकिन न था। जातराओं के लिए तो देवता के साथ तकरीबन हर घर से एक आदमी का जाना जरूरी होता। उसे कोई न कोई काम पहले से ही सौंपा हुआ होता। इस तरह के काम दलित परिवारों के लिए ज्यादा होते।

 .........और देवता के नाम से कार निभाने के लिए बलि का बकरा आज मैं बन गया था। मुझे न चाहते हुए भी जाना पड़ा।

देवता की कोठी के पास जब मैं पहुँचा तो पुजारी ने पिता के न आने का कारण पूछा। मेरे बताने पर वह कुछ परेशान हो गया। लेकिन जब मैंने बताया कि आज मैं शहनाई बजाने के काम के लिए आया हूँ तो वह विस्मित होकर मुझे देखने लगा। मेरी बिरादरी के कुछ लोगों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि लड़का अच्छी शहनाई बजाता है तो वह कुछ न बोला। मैं यह बखूबी समझता था कि मेरा आना उसे अखर रहा था। शायद कहीं उसके मन में यह बात भी उठी होगी कि अच्छा ही है आगे पढ़ने के बजाए मैं शहनाई बजाने का ही काम करूँ। इसीलिए कुछ देर के बाद बोलचाल में परिवर्तन हो गया और वह अच्छी बातें करने लगा। पुजारी और देवता के अन्य कारदार अब मुझे एक छोटे शहनाई मास्टर के रूप में देखने लगे थे। कईयों ने तो मुँह पर ही तारीफों के पुल बाँध दिए। इनमें पुजारी से लेकर देवता के पंचों तक थे। उनके चेहरे पर शायद इस बात की अब कुछ ज्यादा खुशी थी कि पढ़ने के बजाए मैं उन्हीं के बजंतरियों के बीच शहनाई फूँका करूँगा।

पिता ने मुझे शहनाई बजाने के कुछ गुर भी बता दिए। मसलन जब देवता का रथ मन्दिर से बाहर निकले तो शहनाई में यह गाना बजाना चाहिए। देवता चलने लगे तो वह गीत। देवता की जातर होने लगे और देवता नाचे तो वह धुन तथा जब देवता का हिंगर-हिंगराव यानी पंची-पंचायत हो तो फलां गाना बचाना चाहिए। मेरे लिए यह कोई मुश्किल का काम नहीं था।

 उस घने अंधेरे में बैठे-बैठे मैं वर्तमान से लेकर अतीत की परतों को कुरेदने में उलझ गया था। आज देवता की कार निभाने का पहला दिन और इस तरह का हंगामा? सोच कर ही मैं परेशान हो रहा था। सचमुच देवता की पंचायत जो सजा दे वह तो माननी ही पड़ेगी पर पिता की डांट को सहना मेरे लिए असंभव जान पड़ता। उन्होनंे कितनी उम्मीद और विश्वास से मुझे देवता के साथ भेजा था। पर जब उन्हें पता चलेगा कि उनका बेटा पहली बार में ही अपनी करतूत के झण्डे इस तरह गाड़ कर लौटा है तो वह न केवल भीतर तक आहत और अपमानित होंगे बल्कि अब उनका यह विश्वास भी पक्का हो जाएगा कि मैं कभी नहीं सुधर सकता। .....और उनकी बनी-बनाई इज्जत-परतीत को निश्चित तौर से खाई में डाल दूँगा।

पता नहीं क्यों लीला दास शर्मा के घर देवता पहुँचने के बाद से ही मेरा मन उखड़ा-उखड़ा सा था। हमारे बैठने के लिए आँगन के नीचे खेतों में जहाँ जगह दी गई वहाँ कोई अच्छा इंतजाम नहीं था। हालांकि खेत बड़ा था। उसमें पीछे की तरफ छोटा सा तरपाल बाँस के डंडों पर लटका दिया था। देवता के रथ रखने और पुजारी, गूर तथा पंचो इत्यादि के लिए अच्छी जगह बनाई थी। उनके लिए बेहतर प्रबन्ध था। हमारी बिरादरी के लोगों के लिए प्राल( पुआल) बिछाई गई थी लेकिन ऊपर कुछ भी नहीं था। न आग ही का कोई इंतजाम था। नवम्बर का महीना था। हमारे पास सर्दी के बचाव के लिए पर्याप्त कपड़े भी न थे। रात भर की ठंड, ऊपर गिरती ओस और पाला, सोच कर ही मैं सिहरने लगा था।

 देवता की पूजा के बाद हम काफी देर तक इस आस में नौबत बजाते रहे कि हमारे लिए कुछ कपड़ों और आग का प्रबन्ध हो जाएगा। पर किसी ने बात तक न पूछी। हमने यह भी सुना था कि यहाँ की पंडित बिरादरी हरिजनों से कुछ ज्यादा ही नफरत करती है। उन्हें आँगन में भी नहीं मानते। हमारे देखते-देखते देवता के साथ आए सभी स्वर्ण बिरादरी के लोगों को रजाईयाँ, कम्बल और अंगेठी में आग दे दी गई और हम सभी मुँह ताकते रह गए। सर्दी बहुत बढ़ रही थी। अब गुस्सा भी आने लगा था। मेरा गुस्सा लीला दास शर्मा पर कम और अपने देवता के कारदारों पर ज्यादा बढ़ता गया।

इधर-उधर देखा। मेरे साथ के वादक अपने-अपने वाद्‍यों की ओट में पट्‍टु की बुक्कल मारे सो गए थे। पहले सोचा कि जैसे-कैसे रात काट ली जाए। पर मन की बेचैनी नहीं गई। मैंने रथ के साथ सोए पुजारी पर डाली दो रजाईयों में से एक खींची। वह हड़बड़ा कर उठ गया। पहले तो एसे कुछ नहीं सूझा। जब रजाई मेरे हाथ में देखी तो पगला गया। जोर-जोर से बकने लगा। उसकी चिल्लाहट सुन कर सभी उठ गए। जैसे उन्हें साँप सूँघ गया हो या किसी ने ठंडे पानी की बाल्टी उन पर उड़ेल दी हो। हंगामा मच गया। उसका रुख मेरी तरफ था,

"ओ छोकरे, तेरा दमाग खराब हो गया। दिखता नहीं तेरे को। यहाँ रथ रखा है। उसे छू दिया तैने। तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की। और रजाई में हाथ लगाने की।"

मैं इस अप्रत्याशित घटना का सामना करने के लिए कतई तैयार नहीं था। डाँट मुझ पर किसी डंडे की तरह पड़ी। मैं कुछ संभलता, लीला दास शर्मा वहाँ टपक पड़ा। उसने आव देखा न ताव मुझ पर कुत्ते की तरह झपटा-

"सालों ने आठ जमात क्या पास कर ली, आसमान में चढ़ने लग गए। तेरे को दिखता नहीं कि ई रजाईयाँ हैं। तेरे छूने के बाद मैं इन्हें कहाँ डालूँगा।"

उसे देवता के रथ की चिन्ता कम और अपनी रजाईयों का फिक्र अधिक था। अब चारों तरफ से गालियों की बौछार होने लगी थी। जितने मुँह उतनी बातें। मेरे साथ जो ढोलिया, नगारची, एक-दो दलित गूर, करनालची इत्यादि थे वे सहमे हुए पीछे खड़े हो गए। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

 देवता का एक पंच पंडित नारायणू पता नहीं कब उठा और सीधा मुझ पर टूट गया। उसने जैसे ही थप्पड़ मारने को हाथ उठाया मैंने वहीं रोक दिया। झटका इतना तेज था कि वह बाँस की कनात से टकराया और ऊपर लगा तरपाल नीचे गिर गया। किसी ने इतना सोचा भी न था कि बात हाथापाई तक आ जाएगी। इससे सारे ब्राह्मण संभल गए। गालियों की जो झड़ी लगी थी वह कुछ थम गई। जो उछलकर मेरी तरफ आ रहे थे वह काफी पीछे चले गए। मेरा चुप रहना मुमकिन नहीं था। मैं कुछ दूर खड़े लीला दास शर्मा के पास गया और उससे सीधे-सीधे पूछा,

"पंडत, जितनी गालियाँ तुमने मेरे को दी वह तो मैंने सहन कर ली। लेकिन मेरी एक बात का जवाब तू देदे। तू ही क्यों देवता के साथ जो ये पुजारी और पंच आए हैं इनसे भी मैं पूछता हूँ कि क्या ठंड बामणों और कनैतों को ही लगती है या कि कोली-चमारों को भी। खुद तो तुम दो-दो रजाईयाँ लेकर खराटे मारने लग गए और हम लोगों को बैठने के लिए पूरा प्राल भी नहीं। हमारे में भी ऐसा ही दिल है, प्राण है जैसे तुम लोगों में हैं। हमारे पुजारी और पंचों को तो शर्म है नहीं लेकिन पंडित तेरे तो बड़ा कारज है। तीन-तीन देवताओं की जातरा है, तेरे को तो समझ चाहिए थी कि देवता के साथ बाहर की बिरादरी के भी लोग हैं। इस सर्दी में उन्हें भी तो रात काटनी है।"

मुझे खुद पता नहीं चला कि मैं इतना कुछ कैसे बोल गया। वहाँ तीनों देवताओं के साथ आए लोग एकत्र हो गए थे। उसका घर दो मंजिला था। उसके साथ दो-तीन और घर थे। शोर सुनकर घरों की औरतें और बच्चे खिड़कियों से झाँक कर नीचे देख रहे थे। मर्द और छोकरे-छल्ले आँगन की मुंडेर पर आकर खड़े हो गए। मैं घबरा भी गया था। कहीं सारे ब्राह्मण-कन्ौत इकट्‍ठे होकर मेरा हुलिया ही न बिगाड़ दे। अब वहाँ रुकना खतरे से खाली न था। क्योंकि मैं जानता था मेरे अपने लोग भी मेरा साथ नहीं देंगे। अपना सामान संभाला। मौका देख कर नीचे की तरफ पगडंडी से भागता हुआ सामने की चढ़ाई में चढ़ गया। कुछ छोकरे मेरे पीछे भागे लेकिन अंधेरे में वे अधिक दूर तक नहीं आ सके। बोलचाल अभी भी जारी था। वहाँ अभी भी हंगामा हो रहा था। जिसके मन में जो आता बकता जाता।

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