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08.11.2007
 
स्वर्ण देवता दलित देवता
एस. आर. हरनोट
भाग-१

मैं तकरीबन आधी रात को लौट आया। यह लौटना अत्यन्त तकलीफ देह और अप्रत्याशित था। मेरे पास न तो कोई रोशनी का प्रबन्ध था और न ही किसी घर से रोशनी माँगने की होश ही रही। विचलित मन। आक्रोश और भय से मिश्रित। चार-पाँच किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने के बाद सीधे रास्ते में पहुँचा तो पीछे देखा। आश्चर्य हुआ कि इतने गहरे अन्धेरे में पाँव न लगी पगडंडी से मैं कैसे आ गया। कन्धे पर हाथ गया। फिर दाईं तरफ नीचे लटके झोले की डोरों से सरकता हुआ भीतर तक। ऊपर पट्‍टु था। उसके नीचे झोली में शहनाई। इसी का डर था कि कहीं हड़बड़ी और गुस्से में शहनाई को ही तो नहीं भूल आया।

हल्की सी आहट हुई। सचमुच कोई छोटा जानवर मेरे होने के एहसास को परखता या अपने आप में भयाक्रान्त नीचे कूदा था। मेरे दांत बैठ गए। दंदकुशकें बट गई। मुँह खोलने का प्रयास किया पर खुला नहीं। जीभ कहीं तालू में फंसती महसूस हुई। शरीर में ऐसी सिहरन हुई मानो किसी ने सिर पर ठंडे पानी का घड़ा उड़ेल दिया हो। उसके बाद एक अजीब सी गंध नाक में पसर गई। पिता की बात याद आ गई। वे बताया करते कि आधी रात को यदि मर्द कहीं रास्ते में अकेला चल रहा हो तो उसका साथ बाघ देता है। उससे डरना नहीं चाहिए। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ था। पहले तो बाघ की कल्पना मात्रा से पानी-पानी हो गया। लेकिन साथ देने की बात ने मन में एक भरोसा भी पैदा कर दिया। एकदम मुँह से देवता का नाम निकला......। भय ने देवता की अचानक याद दिला दी।

गाँव अब कुछ दूरी पर था। इतनी रात घर पहुँचुंगा तो पिता क्या कहेंगे? माँ और दादी क्या सोचेगी ? इसका ख्याल करते-करते एक जगह विवशत: चट्‍टान पर बैठ गया। जगह खुली थी। तारों की संयुक्त iझलमिलाहट ने आँखों का अंधकार कुछ कम कर दिया था। बैठते ही ठंडी हवा के स्पर्श ने मन को थोड़ा हल्का किया। माथे और मुँह पर सिकुड़न सी हुई। पसीना सूखने की चिपचिपाहट। कुछ इसी तरह पूरे शरीर में भी महसूस हुई। एक ही साँस में इतना रास्ता तय करने के बाद जो गर्माहट और खुलापन शरीर में था वह कम होने लगा। सर्दी से बचने के लिए झोले से पट्‍टु निकालकर ओढ़ लिया।

पिछली शाम लीला दास शर्मा के यहाँ देवता गया था। उसने अपनी किसी मन्नत पूरी होने पर देव जातर मानी थी। उसके यहाँ दो और देवताओं के रथ भी आए थे। यानी तीन देवताओं की जातर थी। मुझे पिता ने पहली बार देवता के साथ भेजा था। उनका अब यह विचार था कि मैं ही देवता की कार निभाता रहूँ। सेवा करता रहूँ। मुझे अब आठवीं के बाद पढ़ाने का भी मन न था। जबकि मैं आगे पढ़ना चाहता था। पिता होश संभालते ही देवता की सेवा में लग गए थे। देवता के साथ रहते हुए हर अच्छे-बुरे को सहा, लेकिन कभी जुबान नहीं खोली। न ही कभी कुछ घर में बताया। उनका काम देवता के बजंतरियों (वादकों) के साथ शहनाई बजाने का था।

वे गाँव-परगने में शहनाई के माहिर थे। उन जैसा शहनाईया हरिजन बिरादरी में कोई दूसरा न था। देवता के साथ ही नहीं बल्कि शादी-ब्याह में भी उन्हें दूर-दूर तक लोग ले जाते थे। पैसे की भी उनकी ज्यादा माँग नहीं रहती। जिसने जो दे दिया सिर-माथे। न कोई लालच न ही किसी चीज की अधिक चाहत। बस लोगों के मुँह से बड़ाई के दो बोल सुन कर ही खुश हो जाते कि वह एक काबिल और बेजोड़ शहनाई मास्टर है। लोग तारीफों के पुल बाँधते तो वह ध्याड़ी तो क्या रोटी खाना भी भूल जाते। सचमुच ईश्वर ने उन्हें इस कला में खूब पारंगत भी बनाया था। वे इसे माँ सरस्वती की कृपा मानते। देवता का आशीर्वाद मानते.....और मन से सेवा में लगे रहते।

उनकी इच्छा थी कि मुझे अपनी तरह कलाकार बनाएँ। एक अच्छा और बेहतर शहनाई मास्टर। लेकिन मेरा उस तरफ कोई ध्यान नहीं था। मैं अक्सर उन्हें निवेदन करता कि मुझे कम से कम दस तो पढ़वा दें। गाँव में आठवीं तक का ही स्कूल था। दसवीं के लिए बहुत दूर जाना पड़ता था। लेकिन गरीबी के कारण उनकी हैसियत इसका दायित्व लेने की नहीं थी। मन से वे चाहते भी थे कि मुझे खूब पढ़ाएँ-लिखाएँ, लेकिन कई कारणों से वे टालते गए। एक कारण शायद गाँव के स्वर्णों का दबाव भी था। गरीबी का कारण तो समझ आता था जिसे मैं भी मानता था। लेकिन दूसरी बात मेरे गले कभी नहीं उतरी। फिर उस गाँव में शायद मैं पहला दलित लड़का था जिसने आठवीं प्रथम श्रेणी में पास की थी। मैं बोर्ड की परीक्षा में अपने जिले में भी प्रथम आया था। जबकि मेरे साथ स्वर्णों के कई लड़के फेल हो गए थे|

शहनाई बजाने का कोई शौक भी न था। कभी-कभार स्कूलों के कार्यक्रमों में बाँसुरी और शहनाई अवश्य बजाया करता। मुझे कोई खास स्वरज्ञान भी न था। न ही तालों की समझ। फिर भी मैं बहुत अच्छी शहनाई बजा लेता और पिता उस स्कूली शौक में मेरे भीतर अपना कलाकार
तलाशने लगते। कई टुर्नामैंटो में मुझे इनाम भी मिले थे। वे इसमें होनहार बिरवान के होत चिकने पात वाली बात देखने लगे थे।

हालांकि मैं पिता जी का बहुत आदर करता था पर हमारे बीच अक्सर झड़पें हो जाया करतीं। उनका गाँव के ब्राह्मणों और ठाकुरों के प्रति अतिरिक्त आदर इसका मुख्य कारण था। बचपन से होश संभालने तक मेरे साथ कई घटनाएँ ऐसी घटी थीं जिन्होंने मेरे मन में नफरत के बीज रोपित कर दिए थे। एक घटना तो बार-बार आँखों के सामने आ जाती और पिता जब भी मुझ से कोई बात करते तो वह दीवार बन कर हमारे मध्य खड़ी हो जाया करती।

जब मैं पाँचवीं में पढ़ता था एक दिन उनके साथ देवता के मन्दिर चला गया। शायद सक्रान्त का दिन था। उस रोज गाँव-परगने के इलावा दूर-दूर से भी लोग पंची-पंचायत करने पहुँचे होते। उनमें ज्यादातर वे लोग होते जो अपने और अपने परिवार को भूत-प्रेतों द्वारा परेशान किया बताते र देवता से उसे भगाने की फरियाद करते। साथ ही अपनी गाय-भैंसों के लिए भी रक्षा के चावल लेते। कई बार तो लोग अपने सिर और पेट तक की दर्द के निवारण के लिए देवता के पास गुहार लगा देते।

देवता की पंचायत एक विशेष कार्यक्रम के आयोजन से होती। समय दोपहर बाद का रहता। बजंतरी देवता के सारे वाद्‍य बजाते। उनके साथ पिता शहनाई बजाते। जब वाद्‍यों का बजना उत्कर्ष पर होता तो मुख्य गूर (देवता का प्रतिनिधि जिसके द्वारा देवता बोलता है) में हल्की-हल्की कंपन होने लगती। कुछ देर बाद उसका पूरा शरीर काँप जाता। फिर वह झटके से सिर हिला देता। उसकी टोपी गिर जाती और औरतों की तरह रखे लम्बे बाल बिखर जाते। वाद्‍य बजते रहते। गूर का शरीर अब पूरी तरह देवछाया के वश में हो जाता। उसकी आँखों में खून तैरने लगता। चेहरा काला हो जाता। इसके बाद दूसरे सहायक देवताओं के गूरों में भी अलग-अलग देवता प्रवेश करते और वे भी पूरी तरह काँपने लग जाते। उनके हाथों में लोहे के विशेष शंगल होते। वे उन्हें काँपते हाथों में पकड़ते, हिलाते रहते और अपनी पीठ पर मारते रहते। यह क्रिया तीन या पाँच बार की होती। जमीन पर मुँह लगाकर जोर से किलकें देतें, लम्बी हू की आवाज करते।

फिर मुख्य देवता का गूर जमीन पर जोर से अपना हाथ मारता और कहता......"रख्खे......"। इसका मतलब होता " रक्षा "। ....और इसी के साथ दूसरे गूर भी वैसा ही करते। देवता के इस आयोजन को नियंत्रिात करने के लिए पाँच पंच आसपास बैठे होते। अब बारी-बारी लोग आते और अपनी पंची-पंचायत करवाते। अपनी समस्या बताते। मुख्य गूर उनका दु:ख-दर्द सुनता और उपाय बताने लगता। समस्याओं के निवारण के समाधान देवता कम और पंच कुछ ज्यादा ही बता देते। इनमें देवता की जातर और मन्दिर के पास बकरे की चढ़त और उसकी देवता के लिए बलि देने जैसे उपाय मुख्य रहते।

उस दिन जब पंची-पंचायत समाप्त हुई तो पता नहीं मुझे क्या सूझी। जाने-अनजाने मन्दिर की एक सीढ़ी पर बैठ गया। पुजारी की नजर पड़ी तो आग-बबूला हो गया। भागता हुआ आया और मेरे गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया। फिर बाँह से पकड़ा। घसीटते हुए मुझे पिता के पास फेंक दिया। पिता द्वारा बजाए इसका विरोध करने के एक और तमाचा मेरे मुँह पर जड़ दिया। मैं रोता हुआ चला आया, पर वे तमाचे मेरे मन पर स्थायी रूप से घर कर गए। यह बात भी गाँव-बेड़ में फैल गई थी कि शहनाईए का लड़का बड़ा कमजात है। इस घटना का प्रभाव कुछ ऐसा हुआ कि मैं अब ब्राह्मणों के बच्चों तक से स्कूल में नफरत करता और गाहे-बगाए उन्हें तंग भी करता। उनके बच्चे तो मुझे जाति के नाम से पुकारते और भद्दी गालियाँ भी देते रहते।

एक दिन पुजारी की दूसरी पत्नी, जो जवान और देखने में सुन्दर थी बावड़ी से पानी लेकर आ रही थी। मैं भी घड़ा उठा कर पानी भरने जा रहा था। हमारा पगडंडी में एक जगह टाकरा हो गया। नीचे-ऊपर होने को कोई जगह नहीं थी। अब मुझे बहुत पीछ लौटना पड़ता। उसके बार-बार कहने पर भी मैं रास्ते में डटा रहा। उल्टा उसे ही पीछे जाने को कहता रहा। जब वह अड़ी रही तो मैं किनारे से आगे निकल गया। फिर क्या था उसने सिर पर उठाई पानी की योकणी नीचे पटक दी और चिल्लाना शुरू कर दिया। मुझ से रहा नहीं गया। उसके पास आया और प्यार से पूछ लिया,"छोटी पंडताणी पहले तू एक बात तो बता? मैं तो तेरे में छूआ तक नहीं और तैने इतनी गाली-गलौज शुरु कर दी। उस दिन जो तू अपनी गौशाला के पिछवाड़े जगढ लुहार के लड़के की टाँगों के बीच नंगी पड़ी थी, उससे तो तेरे को छोत लगी ही नहीं..?"

ढोल की पोल खुल गई। चेहरा तमतमा गया था उसका। इतनी बड़ी बात वह सहती भी कैसे। गाँव में फैल गई तो क्या मुँह दिखाएगी। जैसे-कैसे बचाव जरूरी था। उसने रास्ते में गिराई टोकणी अब खेतों से नीचे फैंक दी थी और चिल्लाती घर चली गई। पुजारी से शिकायत लगा दी कि शहनाईए के लड़के ने उसका पानी तो छूआ ही पर हाथापाई भी कर दी। बात पिता तक पहुँची। उस दिन तो मेरी जो धुनाई हुई उसकी दर्दें आज भी महसूस होती हैं।

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