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08.11.2007
 
पौराणिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और वर्तमान सन्दर्भ में किन्नर जिन्हें नपुंसकता के सन्दर्भ में जोड़ना किन्नौर और किन्नर समुदाय का अपमान है। 
--  संकलन आलेख एस. आर. हरनोट

 

हम हिजड़ा समुदाय का सम्मान करते हैं। समाज में उनका वही स्थान है जो हमारा है। लेकिन उन्हें किन्नर कहना बिल्कुल भी उचित नहीं है क्योंकि हिमाचल के जनजातीय जिला किन्नौर के निवासी किन्नौरा व किन्नर से जाने जाते हैं।

हिमाचल प्रदेश में वर्तमान किन्नर विवाद उस समय उठा जब मधुर भंडारकर ने अपनी फिल्म ट्रैफिक सिग्नलके रलीज़ होने से पहले कई हिन्दी के न्यूज़ चैनलों में साक्षात्कार देते हुए यह कहा कि उन्होंने फिल्म में किन्नरोंसे भी अभिनय करवाया है। किन्नरों से उनका तात्पर्य हिजड़ोंसे था। न्यूज चैनलों के दर्शक लाखों-करोड़ों में होते हैं इसलिए जो इस बात से अपरिचित थे उन्हें भी यही लगा कि किन्नर हिजड़ों को ही कहा जाता होगा।

हिमाचल में सर्वप्रथम यह विवाद वर्ष २००० में तब शुरू हुआ जब मध्य प्रदेश में शबनम मौसी नाम का एक हिजड़ा चुनाव जीता और उसे किन्नर से सम्बोधित किया गया। इसके बाद कुछ और हिजड़े राजनीति में आए। प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया में किन्नर शब्द हिजड़ों के लिए प्रयुक्त होने लगा और इसका विरोध हिमाचल विशेषकर किन्नौर में स्वभाविक था। मैंने दिसम्बर २००० में इसका विरोध करते हुए एक प्रैस विज्ञप्ति जारी की थी जिसे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं ने प्रमुखता से छापा और इस बात का समर्थन किया कि हिजड़ों के लिए किन्नर शब्द का प्रयोग किसी अल्पज्ञान का नतीजा है। अमर उजाला ने तो अपने तमाम ब्यूरो को एक पत्र भी लिखा जिसमें किन्नर शब्द को इस अर्थ में प्रयोग न करने के निर्देश दिए गए थे। हिमाचल प्रदेश के तमाम बुद्धिजीवियों और लेखकों तथा किन्नौर की अनेक संस्थाओं ने इसका पुरज़ोर विरोध किया। अप्रैल २००१ में जब हिमाचल विधान सभा शुरू हुई तो यह विवाद वहाँ भी गया तथा विधान सभा में इस पर परिचर्चा हुई तथा किन्नर शब्द का हिजड़ों के लिए हो रहे प्रयोग को अनुचित ठहराया गया। हालाँकि तत्कालीन सरकार का यह उत्तरदायित्व बनता था कि विधान सभा में विचार-विमर्श के बाद इस पर ठोस कार्यवाही होती और मामला राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा में तथा अन्य सम्बन्धित विभागों से उठाया जाता लेकिन ऐसा न हुआ और छुट-पुट रूप में इस शब्द का गलत इस्तेमाल होता रहा। पिछले दिनों अचानक जब मधुर भंडारकर ने अपने साक्षात्कारों में हिजड़ों के लिए यह शब्द प्रयोग किया गया तो हिमाचल में इस पर बवाल मचा तथा प्रदेश सरकार ने मधुर भंडारकर की फिल्म को आंशकि रूप से प्रतिबंधित कर दिया।

मधुर भंडारकर से कई बार हमारी बात हुई। यहाँ के मीडिया विशेषकर अमर उजाला ने उनसे इस मुद्दे पर बात की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि हिजड़ों को किन्नर न कहा जाए तो क्या कहें। इस शब्द का प्रयोग तो मीडिया पहले से कर रहा है। मधुर भंडारकर को यह समझाने का प्रयास किया गया कि इस बात का पहले से विरोध हो रहा है लेकिन अब जबकि उन्होंने अपनी फिल्म रलीज़ होने से पहले न्यूज़ चैनलों पर बार-बार इसका प्रयोग हिजड़ों को किया है इसलिए उससे हिमाचल में बवाल मच गया है। किन्नौर निवासी इससे खासे नाराज़ है और अपमानित महसूस कर रहे हैं।

बजाए इसके कि मधुर भंडारकर हिमाचल और किन्नौरवासियों की भावना की कद्र करते और इस भूल के लिए क्षमा याचना मांगते उन्होंने मुम्बई में अपने साथी फिल्म निर्माताओं के साथ एक प्रैस-संगोष्ठी का आयोजन किया जिसमें जानेमाने फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट, अशोक पंडित, सुधीर मिश्रा के साथ कई फिल्मी हस्तियाँ शामिल थीं। उन्होंने हिमाचल में फिल्म के प्रतिबंध को लेकर प्रदेश सरकार पर अपना गुस्सा उड़ेला तथा इस विरोध को हल्के-फुलके ढंग से लेते हुए मधुर भंडारकर की बात का समर्थन किया कि हिजड़ों को किन्नर न कहें तो क्या कहें। इसको लेकर उन्होंने हिमाचल सरकार, हिमाचल प्रदेश व किन्नौर वासियों के साथ हमारी संस्कृति का भी अपमान किया। इस बात का प्रमाण दैनिक भास्कर में दिनांक १४ फरवरी, २००७ को प्रकाशित फिल्म निर्देशक अशोक पंडित का लेख है।

प्रश्न यह नहीं है कि मधुर भंडारकर ने अपनी फिल्म ट्रैफिक सिग्नल में किन्नर शब्द का इस्तेमाल कितनी बार किया, किया भी है या नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि जिन हिजड़ों ने फिल्म में अभिनय किया है उन्हें, उन्होंने अपने सक्षात्कारों में किन्नर कहा है जिसका व्यापक प्रचार हुआ और किन्नर वासी बार-बार उनके द्वारा अपमानित होते रहे। यह अपमान न केवल किन्नर का था बल्कि हिमाचल की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर और इतिहास के साथ उन पौराणिक ग्रन्थों, वेदो और पुराणों और साथ उन साहित्यकारों का भी था जिन्होंने किन्नरों को लेकर शोध ग्रन्थ लिखें हैं।

पौराणिक ग्रन्थों और साहित्य में किन्नरः 

पौराणिक ग्रन्थों, वेदों-पुराणों और साहित्य तक में किन्नर हिमालय क्षेत्र में बसने वाली अति प्रतिष्ठित व महत्वपूर्ण आदिम जाति है जिसके वंशज वर्तमान जनजातीय जिला किन्नौर के निवासी माने जाते हैं। संविधान में भी इन्हें किन्नौरा और किन्नर से संबोधित किया गया है। किन्नौर वासियों को जब जनजाति का प्रमाण पत्र दिया जाता है तो उसमें स्पष्ट लिखा होता है – ‘the people of Kinnaur District belongs to Kinnaura or Kinnar Tribe which is recognized as Scheduled Tribe under the Scheduled Tribes List(modification) order 1956 and the State of Himachal Pradesh Act, 1970’.

नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा १२ खण्डों में प्रकाशित हिन्दी विश्वकोश(१९६३) के तीसरे खण्ड पृष्ठ-८ पर किन्नर की जो व्याख्या दी गई है वह इस प्रकार है-

१:  किन्नर हिमालय में आधुनिक कन्नौर प्रदेश के पहाड़ी, जिनकी भाषा कन्नौरी, गलचा, लाहौली आदि बोतियों के परिवार की है।

२:  किन्नर हिमाचल के क्षेत्र में बसने वाली एक मनुष्य जाति का नाम है, जिसके प्रधान केन्द्र हिमवत् और हेमकूट थे। पुराणों और महाभारत की कथाओं एवं आख्यानों में तो उनकी चर्चाएँ प्राप्त होती ही हैं, कांदबरी जैसे कुछ साहित्यिक ग्रन्थों में भी उनके स्वरूप, निवासक्षेत्र और क्रियाकलापों के वर्णन मिलते हैं। किन्नरों की उत्पत्ति में दो प्रवाद हैं। --एक तो यह कि वे ब्रह्मा  की छाया अथवा उनके पैर के अंगूठे से उत्पन्न हुए हैं और दूसरा यह कि अरिष्ठा और कश्यप उनके आदिजनक थे। हिमाचल का पवित्र शिखर कैलाश किन्नरों का प्रधान निवास-स्थान था, जहाँ वे शंकर की सेवा किया करते थे। उन्हें देवताओं का गायक और भक्त माना जाता था और वे यक्षों और गंधर्वों की तरह नृत्य और गायन में प्रवीण होते थे। उनके सैंकडों गण थे और चित्ररथ उनका प्रधान अधिपति था।

३:  मानव और पशु अथवा पक्षी संयुक्त भारतीय कला का एक अभिप्राय इसकी कल्पना अति प्राचीन है। शतपथ ब्राह्मण(७.५.२.३२) में अश्वमुखी मानव शरीर वाले किन्नर का उल्लेख है। बौद्ध साहित्य में किन्नर की कल्पना मानवमुखी पक्षी के रूप में की गई है। मानसार में किन्नर के गरूड़मुखी, मानवशरीरी और पशुपदी रूप का वर्णन है।

४:  संस्कृत ग्रन्थों में किन्नरी वीणा का उल्लेख हुआ है।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने किन्नौर जिसे वे प्रमाण के साथ प्राचीन किन्नर देश मानते हैं, इस क्षेत्र की अनेक यात्राएँ की हैं और कई पुस्तकें लिखी हैं। किन्नर देश और किन्नर जाति का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व समझने के लिए उनकी बहुचर्चित पुस्तकें किन्नर देशऔर हिमाचल है। उनके अनुसार यह किन्नर देश है। किन्नर के लिए किंपुरुष शब्द भी संस्कृत में प्रयुक्त होता है, अतः इसी का नाम किंपुरुष या किंपुरुषवर्ष भी है। किन्नर या किंपुरुष देवताओं की एक योनि मानी जाती थी। किन्नर देशियों को आजकल किन्नौर में किन्नौरा कहते है। पहले किन्नौर या किन्नर क्षेत्र बहुत विस्तृत था। कश्मीर से पूर्व नेपाल तक प्रायः सारा ही पश्चिमी हिमालय तो निश्चित ही किन्नर जाति का निवास था। चन्द्रभागा(चनाव) नदी के तट पर आज भी किन्नौरी-भाषा बोली जाती है। सुत्तपटिक के विमानवत्थु (ईसापूर्व द्वितीय तृतीय सदी) में लिखा है- चन्द्रभागानदी तीरे अहोसिं किन्नर तदा” -जिससे स्पष्ट है कि पर्वतीय भाग के चनाव के तट  पर उस समय भी किन्नर रहा करते थे। ड़ा० बंशी राम शर्मा ने  किन्नर लोक साहित्य पुस्तक लिखी है जो किन्नर पर पहला शोध ग्रन्थ है। इस पुस्तक में अनेक प्रमाण देकर यह सिद्ध किया गया है कि वर्तमान किन्नौर में रहने वाले निवासी किन्नर जाति से सम्बन्धित हैं। महाकवि भारवि ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ किरातार्जुनीय महाकाव्य के हिमालय वर्णन खण्ड (पांचवा सर्ग, श्लोक १७) में किन्नर, गन्धर्व, यक्ष तथा अप्सराओं आदि देव-योनियों के किन्नर देश में निवास होने का वर्णन किया है। वायुपुराण में महानील पर्वत पर किन्नरों का निवास बताया गया है। डी.सी.सरकार (Cultural History from the Vayu Purana, 1946, Page 81) के अनुसार किंपुरुष-किन्नर भी आदिम जातियाँ थीं जो हेमकूट में निवास करती  थी। मत्स्य पुराण के अनुसार किन्नर हिमवान पर्वत के निवासी हैं। डॉ० कन्हैया लाल माणिक लाल मुन्शी के अनुसार किन्नर हिमाचल पदेश के एक क्षेत्र में रहते हैं। महिलाओं को किन्नरियाँ कहा जाता है जो बहुत सुन्दर होती हैं। उन्हें किन्नर कंठी भी कहा गया है। हरिवंश पुराण में किन्नरियों को फूलों तथा पत्तों से श्रृंगार करते हुए बताया गया है जो गायन और नृत्यकला में अति दक्ष होती है। भीम ने शांतिपर्व में वर्णन किया है कि किन्नर बहुत सदाचारी होते हैं उन्हें अन्तःपुर में भृत्य के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। कार्तिकेय नगर हमेशा किन्नरों के मधुरगान से गुंजायमान रहता है।

महाभारत के दिग्विजय पर्व में अर्जुन का किन्नरों के देश में जाने का वर्णन आता है। पराक्रमी वीर अर्जुन धवलगिरि को लांघ कर द्रुमपुत्र के द्वारा सुरक्षित किम्पुरुष देश में गए जहाँ किन्नरों का वास था। उन्होंने क्षत्रिय का भारी संग्राम के द्वारा विनाश करके उस देश को जीता था। चन्द्र चक्रवती ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लिटरेरी हिस्टरी आफ एन्शियंट इंडिया में लिखा है कि किन्नर कुल्लू घाटी, लाहुल और रामपुर में सतलुज के पश्चिमी किनारे पर तिब्बत की सीमा के साथ रहते हैं। अजन्ता के भित्ति चित्रों में गुहृयकों किरातों तथा किन्नरों के चित्र भी हैं। इन चित्रों का ऐतिहासिक महत्व हैं जो ईसा की तृतीय से अष्टम शताब्दी के मध्य की धार्मिक तथा सामाजिक झाँकी प्रस्तुत करते हैं। किन्नरों के वर्णन बौद्ध ब्रन्थों में भी आते हैं। चन्द किन्नर जातक में बोधिसत्व के हिमालय प्रदेश में किन्नर योनि में जन्म लेने की बात कही गयी है। इस सन्दर्भ में इस ग्रन्थ में किन्नर और किन्नरियों की कई कथाएँ वर्णित है।

महाकवि कालीदास ने अपने अमर ग्रन्थ कुमार सम्भव (प्रथम सर्ग, श्लोक ११, १४) में किन्नरों का मनोहारी वर्णन किया है जिसका हिन्दी अनुवाद है—‘जहाँ अपने नितम्बों और स्तनों के दुर्वह भार से पीड़त किन्नरियाँ अपनी स्वाभाविक मन्दगति को नहीं त्यागतीं यद्यपि मार्ग, जिस पर शिलाकार हिम जम गया है, उनकी अंगुलियों व एड़ियों को कष्ट दे रहा है। पुराणों में किन्नरों को दैवी गायक कहा गया है। वे कश्यप की सन्तान हैं और हिमालय में निवास करते हैं। वायुपुराण के अनुसार किन्नर अश्वमुखों के पुत्र थे। उनके अनेक गण थे और वे गायन और नृत्य में पारंगत थे। हिमालय में स्थित अनेक स्थान पर किन्नरों के लगभग सौ शहर थे। वहाँ की प्रजा बड़ी प्रसन्न तथा समृद्धशाली थी। इन राज्यों के अधिपति राजा द्रुम, सुग्रीव, सैन्य, भगदत आदि थे जो बहुत शक्तिशाली माने जाते थे। किन्नरों का हिमालय के बहुत बड़े क्षेत्रों पर अधिकार था। किन्नौर के गेजेटियर में भी किन्नर का विस्तार से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उल्लेख किया गया है।

 इसके अतिरिक्त अनेक विद्वानों और साहित्यकारों ने अपने शोधग्रन्थों, यात्रा-पुस्तकों, आलेखों और कविताओं में किन्नर देश और किन्नौर में रहने वाली किन्नर जनजाति का उल्लेख किया है। इनमें न केवल हिमाचल के विद्वान-लेखक शामिल है बल्कि देश-विदेश के लेखक भी हैं। पिछले दिनों किन्नौर निवासी शोधकर्ता व लेखक टेसी छेरिंग नेगी की दो पुस्तकें उल्लेखनीय है। पहली पुस्तक किन्नरी सभ्यता और साहित्य दिल्ली साहित्य अकादमी ने प्रकाशित की है। हाल ही में उनकी दूसरी पुस्तक भी प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है किन्नर देश का इतिहास। इसका विमोचन मुख्यमन्त्री महोदय श्री वीरभद्र सिंह ने ठीक उसी दौरान किया जब मधुर भंडारकर की फिल्म पर प्रतिबंध लगा था। श्री शरभ नेगी की पुस्तक हिमालय पुत्र किन्नरों की लोक गाथाएं किन्नर लोक गाथाओं पर पहली प्रमाणिक पुस्तक है।  एस आर हरनोट ने भी अपनी पुस्तकों यात्रा-किन्नौर, स्पिति और लाहुल तथा हिमाचल के मन्दिर और लोक कथाओं में किन्नौर और किन्नर इतिहास तथा संस्कृति का विस्तार से उल्लेख किया है। हिमाचल के प्रसिद्ध लेखक मियाँ गोवर्धन सिंह द्वारा लिखित पुस्तक हिमाचल प्रदेश का इतिहासभी इस सन्दर्भ में एक प्रमाणिक ग्रन्थ है। वर्तमान में न केवल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय बल्कि प्रदेश के बाहर स्थित जे०एन०यू स्थित कई दूसरे विश्वविद्यालयों में कई शोध छात्र किन्नर लोक गीतों, इतिहास और किन्नर लोक साहित्य पर शोध कर रहे हैं।

गलत सन्दर्भ और अर्थ में जाने-अनजाने जो लोग किन्नर शब्द का प्रयोग हिजड़ों के लिए कर रहे हैं उससे न केवल हिमाचल का विशेषकर किन्नौर और किन्नर जनजाति का अपमान हुआ है बल्कि उपरोक्त उल्लेखित पौराणिक ग्रन्थ और साहित्य भी कटघरे में आ गया है। मधुर भंडारकर की अज्ञानता ने नए सिरे से इस विवाद को जन्म दिया है। इतना ही नहीं जो छात्र किन्नर को लेकर किसी भी सन्दर्भ में शोध कर रहे हैं उन्हें इसके दंश से अपने मित्रों और लोगों के बीच अपमानित भी होना पड़ता है। जो इसके अतिहास से अनजान है वे उनसे पूछ ही लेते हैं कि क्या यह शोध हिजड़ों पर हो रहा है?” मधुर भंडारकर ही इस विवाद में शामिल नहीं है बल्कि अब तो हिमाचल में भी कुछ तथा कथित लेखक और समाजशास्त्री उनके साथ चलते दीख रहे हैं। पिछले दिनों एक अखबार में इसी तरह के एक समाजशास्त्री ने प्रदेश सरकार तथा तमाम उन लोगों पर जो इसका विरोध कर रहे हैं अच्छा खासा अपमानित किया है। उन्होंने इस विवाद के पीछे फिक्सिंग, प्रायोजित, सियासत और पब्लिस्टिी स्टंग जेसे आरोप भी मढ़ दिए हैं जो न केवल उपरोक्त ग्रन्थों और साहित्य का अपमान है बल्कि किन्नौर वासियों के साथ हिमाचल प्रदेश विधान सभा को भी गाली है।  

मधुर भंडारकर की फिल्म के बहाने उनके कई न्यूज़ चैनलों को दिए साक्षात्कारों और मुम्बई भी की गई प्रैस कान्फ्रैंस से इस विवाद ने नया रूप लिया है। हिमाचल वासी किसी भी कीमत पर अपने इतिहास और संस्कृति का इस तरह अपमान होते नहीं देख सकते। फिल्म निर्माता यह भूल जाते हैं कि उनकी फिल्में आमजन सबसे अधिक देखते हैं। मधुर भंडारकर को चाहिए तो यह था कि वह हिमाचल और किन्नौरवासियों का सम्मान करते हुए अपनी इस ऐतिहासिक भूल के लिए क्षमा माँगते लेकिन उन्होंने जिस तरह प्रदेश सरकार तथा किन्नोरवासियों का मजाक उड़ाया है उसके दृष्टिगत न केवल उनकी फिल्म हिमाचल में पूर्णतया प्रतिबन्धित होनी चाहिए बल्कि प्रदेश सरकार को भी उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। क्योंकि इस विषय को हम किसी भी तरह हल्के ढंग से नहीं निपटा सकते क्योंकि यदि किन्नर शब्द स्थायी रूप से हिजड़ा समुदाय को मिल गया तो उसके परिणाम क्या होंगे इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता।



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