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08.10.2007
 
 कालिख
एस. आर. हरनोट
भाग

 

गाँव में जब भनक लगी कि शामा पेट से हैं तो सभी के कान खड़े हो गए। वह जब बाहर आती। पानी-पनिहार जाती तो छोटे से बड़ों तक उसकी चाल-ढाल देखते रहते। सभी की आँख उसके पेट पर टिक जाती। धीरे-धीरे पेट कोख से बाहर आने लगा। गाँव वालों का शक सच में बदल गया। ससुराल वालों ने तो तूफान खड़ा कर दिया था। गाँव-बेड़ के लोगों के लिए भी वह कुलच्छणी हो गई थी। पर शामा कान मूँदे रहती। आँख बन्द कर लेती। लोगों की खरी-खोटी सुनते-सुनते वह थक गई थी। कई बार मन किया कि पहाड़ी से कूद कर जान दे दे लेकिन हिम्मत नहीं हुई। पेट में पल रहे जीव के साथ-साथ मन का स्नेह भी पलता-बढ़ता गया। एक आस जग गई.........अकेले पन से निस्तार। भविष्य का सहारा।......और शामा की आँखें अपनी ही गोद भराई में बिछ गईं। नौ महीनों बाद जब बच्चा बाहर आया तो लड़का था। गाँव की औरतों ने ही सब कुछ भुला कर उसे संभाला था।

बच्चा बढ़ने-पलने लगा। लोग उसकी शक्ल गाँव के छोकरे-छल्लों से मिलाते रहते। कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। पर सही-सही अनुमान न लगा पाते। शामा के ससुराल वालों के लिए एक नई मुसीबत खड़ी हो गई थी। ससुर जानता था कि यदि बच्चा पंचायत के रजिस्टर में चढ़ गया तो पूरे हिस्से का वारिस बन जोगा। शामा ने इतनी दूर कभी सोचा भी न था।

तीन-चार साल आँखों-आँखों में गुजर गए। शामा को पता ही न चला। साथ-साथ उसके सपने भी जवान होते गए। एक दिन बच्चे को लेकर प्राइमरी स्कूल के हैडमास्टर के पास चली गई। दाखिला दिलवाना था। हैडमास्टर ने सारे कागज पूरे किए। पिता का नाम पूछा तो शामा झेंप गई। लेकिन दूसरे ही पल संभली। पति का नाम लिखवा लिया। बच्चा दाखिल हो गया। लेकिन दूसरे दिन हैडमास्टर ने उसे स्कूल बुला कर बताया कि बच्चे के बाप का नाम गलत लिखवाया है। ससुर ने शिकायत की थी कि बच्चा उसके पति के मरने के कई सालों बाद हुआ है। हैडमास्टर के लिए समस्या खड़ी हो गई थी। शामा खून का घूँट पी कर रह गई। आँखों में बसे सपने उड़ गए। उनमें खोई भागते-दौड़ते कितनी दूर निकल गई थी वह कि अपना अतीत ही
भूल गई। ......अब बेटा पढ़ नहीं सकेगा। जहाँ भी जाएगा सभी बाप का नाम पूछेंगे। वह क्या करे। कहाँ जाए। किस के पास दुखड़ा रोए। छाती पर साँप लौटने लगे। कलेजा दहल गया। अनमने मन से घर चली आई।

बात स्कूल के आँगन तक ही नहीँ रही थी। ससुर ने एक और मुसीबत खड़ी कर दी। पँचायत में दावा कर दिया था कि उस बदचलन औरत ने कुल पर कलंक पोथ दिया है। इतनी हिम्मत कि किसी ऐरे-गैरे की औलाद को उनके वंश पर मढ़ दे। अब न केवल बच्चे का दाखिला रद्द करने का सवाल था परन्तु शामा को गाँव से बेदखल करने की भी अपील की गई थी। मामला प्राईमरी स्कूल से शुरु हुआ था इसीलिए पंचायत वहीं बुलाई गई।

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स्कूल के प्रांगण तक पहुँचते-पहुँचते शामा ने अपनी पूरी जिन्दगी पढ़ ली। कदमों से नाप ली। आज सचमुच अथाह अकेलापन महसूस हो रहा था। मानो किसी बियाबान में फैंक दिया गया हो। जहाँ न कोई पगडंडी है न थांव। न धूप न छांव। न कोई सहारा न आसरा। कोई भी जंगली जानवर झपट कर नोच दें। शरीर के रेशे-रेशे कर दे। लेकिन अब जो कहाँ । क्या पता आज का दिन गाँव में आखरी दिन ही हो?

 मन में कई तरह के ख्याल आते रहे। बिजली की तरह कौंधे। उस कौंध ने भीतर की आग को हवा दे दी। वह अंगारे उसी तरह प्रखर होने लगे जिस तरह चूल्हे में हवा के स्पर्श से प्रचंड हो जाते थे। पसीने की बूंदे माथे से सरकती गालों तक आई तो चादरु से उन्हें इतमिनान से पोंछ दिया।

स्कूल के प्रांगण तक छ: सात सीढ़ियाँ थीं। चढ़ते हुए कानों में एक शोर घुस गया। लोग आपस में बतिया रहे थे। बीच-बीच में कोई ठहाका लगाता तो शामा के कानों में गर्म तेल की बूँदों की मानिंद पड़ जाता। पांव जमीन में धंसने लगे। ऊपर चढ़ने की कोशिश में वह एक-दो बार गिरते-गिरते बची थी।

उल्टे पाँव पीछे उतरी। दीवाल के सहारे खड़ी हो गई। शोर बढ़ता गया। कानों में उँगलियाँ डालीं। लगा कि बाहर से कहीं अधिक वह शोर भीतर पसरा है। उँगलियाँ हटा लीं। चारों तरफ देखा। देखती चली गई। फिर आसमान की ओर। पश्चिम से आते बादलों के काले टोले। उनकी तरह-तरह की बनती डरावनी आकृतियाँ। बीच में दौड़ता-भागता सूरज। बादल राहू बनने लगे। जैसे अभी निगला कि अभी। पल भर यह खेल चलता रहा। लेकिन पकड़ से छूटता चला गया। जहाँ-कहीं आर-पार खेतों, घाटियों में छाया के टुकड़े पसरे हुए थे, वहाँ अब धूप का साम्राज्य था। शामा ने उसे अपने भीतर समेट लिया।एक साँस में सीढ़ियाँ चढ़ गई। उसे देखते ही आंगन में सन्नाटा पसर गया। न कोई बतियाहट, न कोई हरकत। न शोर न ठहाके। जैसे समय ठहर गया हो। शामा ने आँखों-आँखों में मैदान का मुआयना किया। गाँव-बेड़ उमड़ आई थी। ऐसे लोग भी भीड़ में थे जिन्हें कभी देखा न था। औरतें। जवान। बूढे़ और बच्चे। जैसे कोई बड़ा तमाशा होने वाला हो।

प्रधान ने शामा के चेहरे पर नजर डाली। डरावना चेहरा। आँखों में उमड़ता एक तूफान। छातियाँ मैले से कुरते के बीच पेट पर ढुलकती हुई। जैसे कोई जिन्दा लाश हो। हालांकि वह अभी काफी पीछे थी लेकिन उसकी परछाई इतनी लम्बी हो गई थी कि भीड़ को चीरती प्रधान तक पहुँच गई। पता नहीं क्या हुआ। वह किसी अज्ञात भय से सिहरा और खड़ा हो गया। ससुर ने बैठे-बैठे गर्दन टेढ़ी की तो शामा से नजर न मिला सका। वह चलती रही ....। प्रधान बैठ तो गया पर मन की दुरुहता चेहरे पर बैठे आई। उस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।

भीड़ के बीच पहुँचते-पहुँचते शामा के मन का रहा-सहा भय विलुप्त हो गया। पुन: नजर चारों तरफ घुमाई। लोग दूर-दूर तक बैठे थ। स्कूल के बरामदे में। पेड़ों और झाड़ियों की छाया में। जैसे यहाँ किसी देव जातर का आयोजन हो। या विधायक, मंत्री आने वाला हो। अचानक मैदान के पूर्व से हवा का तेज अंधड़ आया। बीच में पहुँचा। एक वर्तुल बनाया। ढेरों मिट्टी और घास-पत्ते अपने साथ समेटे घराट की तरह घूमा और भीड़ पर बिछ गया। प्रधान के साथ कई जाने-माने लोगों के मुँह मिट्टी से पुत गए। घास के तिनके बालों से लेकर कपड़ों पर चिपक गए। शामा ने देखा तो हँसी निकल आई। चादरु से मुँह ओट लिया। वर्तुल इतना तेज था कि लोगों के आस-पास सोए कुत्ते भी डर कर भौंकने लगे थे।

कौवों का एक दल कहीं से आया और स्कूल के छत पर बैठे गया। एक-आध ने काँव-काँव की फिर चुप हो गए। कई कुत्ते इधर-उधर दौड़ते दिखे। शायद सभी ने यह भ्रम पाल लिया था कि आज यहाँ कोई धाम या देवता का भंडारा हो रहा होगा।

शामा पंचों के सामने आकर खड़ी हो गई। इधर-उधर देखा। एक जगह खाली थी। वहाँ उसका ससुर बैठा था। दाएँ बैठे गई। उठने को हुआ तो बाजू पकड़ कर बिठा दिया। दराट बिल्कुल सामने रखा। उसकी तो जैसे साँस ही बन्द हो गई। प्राणों पर बीतती नजर आई। कभी दराट देखता तो कभी कुर्सी पर बैठे प्रधान का मुँह। वह सिकुड़ने लगा था। जैसे बाहें टाँगो से चिपक गई हो। ओंठ-मुँह सूखने लगे। कई पल चुप्पी रही। किसी ने कोई बात नहीं की।

 शामा ने मन को बाँधा। पटका किया। बोलने की पहल भी खुद ही कर दी,

"मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?"

सभी एक दूसरे का मुँह ताकते रहे।

प्रधान ने भीतर की क्षुब्धता मुश्किल से रोकी। खीज कर बोला,

"तेरा ससुर बोलता है तैने अपने बच्चे के बाप का नाम गलत लिखाया है?"

वह फिर से हँस दी। हँसती चली गई। जोर से ठहाका लगाया तो स्कूल की छत पर बैठे कौवों का दल उड़ गया। हँसी के मायने किसी को समझ नहीं आए। परन्तु प्रधान झुंझला गया। जैसे कोई झंझावत सिर पर बैठे गया हो।

"तो आप मेरे ससुर को ही पूछ लेते कि बाप का नाम क्या लिखाणा चाहिए?"

कनखियों से ससुर को देखा। वह थोड़ा आगे सरका और खड़ा हो गया। काँपती जबान से बोलने लगा,

"प्रधान जी मेरा लड़का तो कभी का मर गया। ये रौंडा तो कई साल बाद पैदा हुआ। "
"मेरे बच्चे को गाली मत देणा रामदत.......।"

शामा ने ससुर की लिहाज छोड़ कर सीधे नाम लेकर चेतावनी दी। एक जोर का तमाचा जैसे मुँह पर पड़ गया हो। वह सकपका गया।

कहते-कहते शामा की आँखों में खून उतर आया। हाथ दराट पर चला गया। खड़े-खड़े उसके ससुर की टाँगे काँपे जा रही थी।

प्रधान ने बात संभाली।

"रामदत्त यह तेरा आँगन-द्वार नहीं है। सलीके से बोल जो बोलना है।"

प्रधान तो उसी की तरफदारी में था। दूसरे पंच भी। उन्हें भी सत्य कहाँ दिख रहा था। पेट में गया दारु और जेब में ठूँसे पैसे आज सिर चढ़ कर बोल रहे थे।

ससुर ने हाथे जोड़ दिए।

"मैं क्या बोलूँ प्रधान जी। आप तो खुद जानते हैं। इंसाफ तो आपको ही करना है।"

कह कर शामा से काफी दूर जाकर बैठे गया।

प्रधान कुर्सी पर बैठा हल्का सा आगे को तन गया।

"देख शामा ! पूरा गाँव-परगना जानता है कि तेरा पति कब का मर गया है। उसका नाम कैसे तू लिखवा सकती है। पंचायत में तेरे को सच बोलना पड़ेगा, नहीं तो तेरे को पंचायत बेदखल कर देगी। सोच ले।"

प्रधान बोल तो गया लेकिन इतने भर शब्द बोलते-बोलते माथा और मुँह पसीने से तर हो गया।

"तो आप को इस बच्चे के बाप का सही नाम लिखणा है.....?"

शामा ने अपने परिदाह का निवारण भीतर ही भीतर किया। आँखों और चेहरे पर निरपेक्षता भर आई। दराट उठाया और खड़ी हो गई। पंच हल्के से बिलबिलाए। लोगों ने कान खोल दिए।

"क्यों मास्टर जी?"

हैडमास्टर की तरफ रुख किया था उसने। वह कुर्सी पर सर झुकाए बैठा था। सामने रखी छोटी मेज। उस पर एक हाजरी रजिस्टर। स्याही का दवात और होल्डर । ...जैसे वे चीजें मास्टर का मजाक उड़ा रही हो।

"तो सोचते क्या हो। उठाओ होल्डर और लिखो बच्चे के बाप के नाम।"

"बच्चे के बाप के नाम" शब्द सुन कर कईयों की हवा उड़ गई। वह हैडमास्टर के साथ खड़ी हो गई थी।

शामा की पहली नजर प्रधान पर थी। प्रधान हेकड़ी में कुछ समझ न पाया। बात समझ आई तो चेहरा ऐसे उतरा जैसे सौ जूते पड़ गए हों। शर्म से पानी-पानी। न बैठेते बना न उठते। भीतर से जर्जर। अस्तव्यस्त। मानो किसी सीधी पगडंडी से आते बाड़ में फंस गया हो। अपमान की सिलवटें चेहरे पर उभर आईं। बुरी तरह घबरा गया प्रधान। गंजे सिर पर जो कुछ बाल थे खड़े हो गए। शक्ल ऐसी बनी जैसे अफीमची का नशा टूट गया हो। दो-चार बार बिना हिले-डुले आँख की पुतलियाँ घुमाई। दाँए हाथे से एक-दो बार सिर खुजलाया। माथे-मुँह पर उग आए पसीने को पोंछना चाहा पर हिम्मत नहीं जुटी। कुर्सी के पीछे से अपना बैग सरकाया और बिल्ली के पाँव खिसक लिया। सबकी आँखे पीछा करती रही। लेकिन शामा ने टोक दिया,

"प्रधान जी अपनी मोहर तो लेते जाईए।"

वह रुक गया। हड़बड़ी में सदरी की जेबें टटोली। उल्टे पाँव ऐसे हटा कि कोई अभी सिर पर डंडा जड़ देगा। मेज पर रखी मुहर उठाई और भाग लिया। पंचों की हालत देखने वाली थी।

दूसरी नजर मंदिर के पुजारी पर टिका दी। सभी स्तब्ध रह गए। सिर पर से अचानक टोपी गिर गई। संभाल तो ली पर पहन न पाया। सदरी की जेब में ठूँस दी। हाथ तालू पर गया। चोटी को इस तरह उँगलियों में फंसा कर घुमाता रहा मानो उखाड़ कर फैंक देगा। हवा ने लम्बे बालों को बेतरतीबी से फैला दिया। पल भर में चेहरा पसीने से तर हो गया। माथे पर लगाया सिंदूर का तिलक ऐसे धुला कि गाल, नाक और ओंठ रंग गए। कन्धे पर रखे परने से पसीना पोंछा तो पूरा मुँह लाल हो गया। शामा की आँख अभी तक उसी पर थी। पुजारी की शक्ल देखकर कई लोग हँस दिए। हँसी मन को नश्तर की तरह घोंप गई। धोती पकड़ी औ टेढ़ा-टेढ़ा खिसक लिया। नंगे पाँव। चप्पल पहनने तक की होश भी न रही। भागते-भागते हाथे जनेऊ पर पड़ा। पता नहीं क्यों उसे कान पर लटका दिया।

तीसरी नजर में गाँव का दूकानदार था। उसके मन का चोर पहले ही जाग गया था। सिर झुकाए जमीन में गड़ता गया। ओंठों में बीड़ी फंसी रह गई। बिना कश लिए। ओंठ जले भी होंगे पर जलन से तीखी, मिट्टी में मिलती इज्जत की आग थी जिसने बुरी तरह भीतर तक जला दिया था। साहूकारी की ठीस पल भर में उड़न छू हो गई। जिन्दा लाश की तरह कुर्सी पर लटका रहा।

अब शामा ने पटवारी की तरफ देखा। जमीन का भगवान। हवाईयाँ उड़ गई। सरकारी नौकरी और गाँव-परगने में अफसरी का रोब जाता रहा। जमीन में उगी दूभ के बीच इस तरह नजरें गड़ाई जैसे जमाबन्दी-ततीमा बनाते लट्ठे के नम्बरों को पढ़ रहा हो। लड़खड़ाता हुआ उठा और सिर झुकाए खिसक लिया।

शामा ससुर जमीन मे धंसता जा रहा था। नजरें बचा कर खिसकना चाहा, लेकिन शामा ने रोक दिया।

"ससुर जी अभी नाम पूरे नहीं हुए........।"

एक घृणित नजर ससुर की तरफ दी। हल्की सी सरसराहट हुई। शामा ने देखा कि उसके पाजामें के बीच से पैशाब की बूँदे जमीन पर गिर रही है। सिर झुका हुआ। टोपी खिसक कर माथे पर टंग गई थी।

धीरे-धीरे स्कूल का प्रांगण खाली हो गया। सभी बेजबान होकर जा रहे थे जैसे इज्जत लुट गई हो।

हैडमास्टर ने रजिस्टर खोला। पन्ने पलटे और होल्डर का निब जोर से दवात में ड़ूबो दिया। स्याही झाड़ी और बच्चे के बाप का पहला नाम काट दिया। नया नाम लिखा..............मनु दत पुत्र श्रीमती शामा देवी।

शामा ने आते-आते पीछे देखा। ससुर अभी भी बुत की तरह खड़ा था। जैसे जमीन फटने का इंतजार कर रहा हो। मन में कड़वाहट भर गई। थूकना चाहा, पर ऐसा न कर सकी।.......जब स्कूल के मैदान की सीढ़ियाँ उतरी तो लगा कि वह किसी काजल की कोठरी से बाहर निकल आई है।

लोग बताते हैं कि रामदत अंधेरा होने तक उसी तरह खड़ा था।
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जब तक हैडमास्टर स्कूल में रहा, बच्चे के बाप की जगह उस की माँ का नाम चलता गया। बदलने के बाद दूसरा हैडमास्टर आया। उसने जब रजिस्टर देखा तो एक बच्चे के पिता का नाम ’श्रीमती शामा देवी’ पढ़ कर खूब हँसा। एक दो गाली पहले हैडमास्टर की नालायकी को दी। फिर बड़े सलीके से उस नाम को दुरुस्त कर दिया........ ’श्री शाम देव’।

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