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08.10.2007
 
कालिख
एस. आर. हरनोट
भाग

 

अपनी छोटी सी ज़िन्दगी में शामा ने शायद ही कभी सुख देखे हों। ब्याह क्या हुआ पूरा जीवन ही अभिशाप बन गया। माँ-बाप ने पाँच भी नहीं पढ़ने दी। जैसे ही स्कूल से हटी, सिर पर ब्याह थोंप दिया। उम्र भी ज्यादा नहीं। सोलह से एक-दो महीना कम ही रही होगी। हँसना-खेलना जाता रहा। चंचलता छिन गई। मासूमियत खो गई। माँ-बाप की जिद के आगे एक न चली। चुपचाप उनके फैसले को एक ही घूँट में कड़वी दवा की तरह पी गई। जिसके साथ शामा का ब्याह हुआ था, वह उम्र में कोई दस साल बड़ा होगा। बचपन से ही खुराफती दिमाग माँ-बाप स्कूल भेजते, पर वह खेत-जंगल में छिप कर दिन पूरा करता। कामकाज में बिल्कुल निठ्ठला। मुँह से दूध की बास भी नहीं गई थी कि दारू-सुल्फे की लत लग गई। बुरे काम। उल्टी संगत। झूठ बोलना तो उसकी रग-रग में बैठ गया था। बीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते कद तो खूब बढ़ा पर सूख कर काँटा रह गया। न कभी बाल बनाता। न नहाता। बढ़ी हुई दाढ़ी। गन्दे नाखून। न ढंग के कपड़े। वह माँ-बाप के लिए एक अच्छी-खासी मुसीबत बन गया था।

कोई कहता कि लड़का मानसिक रूप से बीमार है। कुछ उस पर भूत-प्रेतों का असर बताता। उसकी बातें समझ से परे होती। कभी पाताल की बातें करता तो कभी आसमान की। कभी परियों की तो कभी भूत-प्रेतों की। सोने के कमरे में तो किसी को नहीं मानता था। घंटो दरवाज़ा बन्द करके कुछ बड़बड़ाता रहता। धूप का धुआँ कई बार दरवाज़े-खिड़कियों से बाहर निकलता तो लगता कि भीतर आग लगी हो। एक दो बार उसके बाप ने डाँटना चाहा पर उसकी लाल-डरावनी आँखें देखकर घबरा गया। जैसे उल्टा उसे ही मार देगा। एक दिन तो उसने किसी बात पर पहले बाप को बुरी तरह पीटा और फिर अपनी माँ का सिर फोड़ कर घर से भाग गया। एक अजीब सा भय उस घर में पसर गया था।

किसी ने सलाह दी थी कि यदि उसकी शादी कर दी जाए तो उस विक्षिप्तता से छुटकारा मिल सकता है। कई दिनों बाद घर लौटा तो बाप ने प्यार से समझा-बुझा कर शादी के लिए राजी कर लिया। जहाँ रिश्ता हुआ, उनसे सब कुछ छुपाए रखा। और शामा जैसी मासूम और भोली लड़की के गले जैसे साँप पड़ गया हो।

शादी के बाद कुछ समय तक वह ठीक रहा। शामा का मन नई-नई दुल्हन के सपनों से भरता-सींचता चला गया। मायके का बिछोह भी भूलने लगी थी। लेकिन धीरे-धीरे कुछ दिनों बाद उसके फिर के भीतर का जानवर बाहर निकलने लगा। उसकी ऊल-जलूल हरकतों से शामा परिचित होने लगी थी। उसे बहुत तंग करने लगा। बिन वजह मारता-पीटता। कई बार शामा के कपड़े तक फाड़ देता। ब्याह के जो गहने उसने चाव से रखे थे उन में से हर सप्ताह एक गहना गुम होता जाता। पहले बालियाँ फिर गोजरू उसके बाद चाँदी की छाप और पायलें। फिर सोने का चाक, सुहाग की चूड़ियाँ और कुछ दिनों बाद उसके पहनने का एक-एक कपड़ा। शामा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करे। एक दिन हिम्मत जुटा कर सास को सारी बातें बता दी। और सास ने अपने पति के पास। सब कुछ जानते हुए भी दोष बहू पर ही मढ़ना शुरु कर दिया। उल्टे आरोप लगाए गए कि वह कपड़े-गहने मायके ले गई है।

पति अब कई-कई दिनों तक घर भी नहीं आता था। कभी आया भी तो सारी-सारी रात जागता रहता। शामा को अपने कमरे में आना तक न मिलता। सोना भी बाहर पड़ता। वह सारी-सारी रात कुछ बड़बड़ाता जाता। धूप जलाए रखता। उल्टे-सीधे करतब करता उसके झोले में कई बार शराब की बातलें, मरे हुए तीतर, मुर्गे और पशुओं की हड्डियाँ होतीं। सिर के बाल भी उलझे हुए और डरावने हो गए थे। बेतरतीब दाढ़ी तो किसी झंखाड़ से कम न लगती।

शामा को किसी ने बताया था कि उसका पति कोई सिद्धी कर रहा है। दूसरे गाँव में एक डागी के पास जाता रहता है। वही उसका गुरु है। शामा बात की तह तक गई तो मालूम हुआ कि गुरु उनके परिवार का कोई पुराना दुश्मन है। किसी बदले की इच्छा से उसके पति को अपने चुंगल में फंसा रखा है। लेकिन लाख कहने पर भी घरवालों ने कोई परवाह नहीं की।

एक दिन आधी रात को उसका पति हाँफता-हाँफता घर आया। शरीर तप रहा था। माथा सिंदूर से पुता था। सिर और दाढ़ी के बाल बीच-बीच से कटे हुए थे। आकर निढाल सा गिर गया। झोला कंधे से लटक रहा था। शामा घबरा गई थी। सास-ससुर को जगा दिया। आस-पास के लोग भी पहुँच गए। वह अचेत हो गया था। कुछ देर बाद साँसें जाती रही। जब लोगों ने उसका झोला देखा तो हैरान रह गए। उसमें एक बच्चे का कटा सर था। जिसमें सिंदूर लिपटा था। मौलियों की डोरियाँ थीं। धूप था, कुछ सफेद सरसों के दाने थे और कुछ हड्डियों के टुकड़े। उसकी मौत से कहीं ज्यादा उसके कृत्य का भय सभी को सताने लगा था। किसी समझदार बुज़ुर्ग ने सलाह दी थी कि यह सारा समान उसकी लाश के साथ इस सफाई के साथ बाँधा जाए कि किसी को कानों कान खबर तक न हो। ऐसा ही किया गया और सब कुछ लाश के साथ जला दिया गया।

दूसरे दिन पड़ोस के गाँव से खबर आई कि एक घर से छोटा सा बच्चा बाघ उठा कर ले गया है। शामा के हाल देखने वाले थे। उसी के पति ने ही उस मासूम बच्चे को मारा होगा...? उसकी मौत से ज्यादा डर बच्चे की हत्या से लग रहा था। अपने माता-पिता को कोसती, भगवान को भलाबुरा कहती कि उसे किन पापों की सजा दी जा रही है।

उसका मन था कि ससुराल में रहकर सास-ससुर की सेवा करे। लेकिन वह भी उसके नसीब में नहीं था। एक दिन अचानक बीमार पड़ गई। किसी ने बात तक न पूछी। उसी हालत में उसका ससुर उसे मायके छोड़ आया था।

 शामा की हालत बहुत बिगड़ गई थी। माँ-बाप देख र हैरान-परेशान हो गए। फूल सी बच्ची काँटे की तरह सूख गई थी। आँखें भीतर को धंसी हुई। जैसे दो विविरों में किसी ने काँच की गोलियाँ अटा खी हों। ओंठ कई जगह से फटे हुए, जिन से खून टपकने लगा था। चेहरा काली छाईयों से भर कर डरावना हो गया था। जब अस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि उसे टीबी हो गई है। कई महीनों दाखिल रही। लम्बा इलाज चलता रहा। ठीक हुई तो मायके ही रहने लगी।

जब तक माँ-बाप का साया सिर पर रहा, शामा मजे में रही। पर उनके न रहने के बाद बुरे दिन फिर लौट आए। भावजों के ताने असहनीय होने लगे। भाईयों ने भी कोई परवाह न की। मायके में अब परायापन सालने लगा था। वह भीतर तक टूटती चली गई। रात-रात भर न सोती। उठकर या तो आँगन में चली आती या फिर खलिहान की मुंडेर पर बैठी रोती रहती और वहीं सो जाती।

.......

शामा बेहद परेशान और निराश हो गई। जीने का कोई मकसद नजर नहीं आया। जीवन को समाप्त करने की ठान ली। लेकिन ससुराल वालों का अन्याय आँखों में तैरता रहा। थोड़ी हिम्मत बाँधी। अपना मन पत्थर का कर लिया। पास जो दो-चार कपड़े थे, उन्हें समेटा और बिना किसी को बताए-कहे ससुराल चली आई।

उसका अचानक लौटना ससुराल वालों के लिए किसी आफत से कम नहीं था। सभी को जैसे साँप सूँघ गया। किसी ने सीधे मुँह बात तक न की। लेकिन वे इतना समझते थे कि कानूनन उसे घर से निकालना आसान नहीं है। उसे तरह-तरह की यातनाएँ देनी शुरु कर दीं। वहा उनकी बेअदबी सहन करती गई। हिम्मत नहीं हारी। डटी रही। मजबूरन उन्हें शामा को एक-दो खेत देने पड़े। घर से बला टले इसीलिए एक कमरा गौशाला में दे दिया। उसने कोई विरोध नहीं किया। सर ढापने की जगह तो मिली। रात-दिन मेहनत की। कमरे को रहने लायक बना दिया।

समस्या दो जून रोटी की थी। गाँव की शर्म से कभी-कभार सास कुछ आटा-चावल दे जाती। लेकिन कितना गुजारा होता। शामा रात-दिन मेहनत-मजदूरी करने लगी। रोड़ी-पत्थर कूटती। उसी से रोटी-कपड़े जुटा लेती। कभी पैसे नहीं होते तो उधार के लिए दुकान में जाती। गाँव में एक ही दूकान थी।

लाला धारी सिंह बड़ी पहुँच वाला साहूकार था। गाँव में जो भी नेता या अफसर आते, उसी के घर जमे रहते। प्रधान, पटवारी और मास्टरों का डेरा वहीं लगा रहता। वह बिना स्वार्थ के किसी को उधार न देता। शामा को देखते ही कुछ ज्यादा ही बघारने लग जाता। बेतहजीब बन जाता। अश्‍लील हरकतों पर उतर आता। मजबूरन सब कुछ सहन कर रह जाती।

एक दिन लाला ने शामा को सुझाया था कि वहा परधान से कह कर विधवा पैंशन लगवा देगा। साथ घर बनाने के लिए भी कुछ सहायता मिल जाएगी। राशनकार्ड बन जाएगा। सस्ता और मुफ्‍़त राशन भी ले सकेगी। इस आस में अब रोज परधान के घर को चक्कर काटने लगी थी।

कुछ दिनों बाद उसकी पैंशन लग गई थी। राशन कार्ड भी बन गया। घर बनाने के लिए भी पन्द्रह हजार स्वीकार हो गया था। ससुर को पता चला तो कान खड़े हो गए। कुछ ज्यादा ही स्नेह जताने लगा। आते-जाते हाल पूछ लेता। कभी दारू पीकर वहीं पड़ा रहता। कभी-कभार देवर भी चक्कर काट जाता।

घर बनाने का जिम्मा भी परधान ने ही लिया था। हालांकि उसकी धूर्तता से भली-प्रकार वाकिफ़ थी लेकिन क्या करती। किसी से काम तो करवाना ही था। उसका ससुर भी यही चाहता था। दो कमरों का घर तो बन गया, पर जो सामान लगाया इतना घटिया था कि मुश्किल से सात-आठ हज़ार लगे होंगे। बाकि सारा पैसा शामा के घर के नाम उड़ गया।

एक दिन प्रधान के साथ मन्दिर का पुजारी भी उसके घर आया था। हैरान रह गई थी वह। आते-जाते किसी बाहर की जाति से छू जाए तो दो बार नहा ले। शामा जैसी दलित विधवा के यहाँ?

वह समझने लगी थी कि कहीं कुछ साफ नहीं है। सभी के मन खोट से भरे हैं। न कोई नेता न प्रधान। न पंडित, न ठाकुर। न मास्टर और न पटवारी। अपनों की तो बात दूर। रिश्ते भी महज छलावा-दिखावा। कोई किसी का नहीं। अपने-अपने स्वार्थ। अपने-अपने काम। इनके धंधे चलते ही गरीबों का गला काट कर हैं। औरत मिल जाए तो न देवता का डर न धर्म की परवाहा। न जाति न कोई छू-छेड़। आठ-आठ बहू-बेटियों वाले खूसट भी साले भांग-दारू पीकर कहीं भी कुत्ते की तरह मुँह मारते फिरें।

जैसे-कैसे नए घर की लिपाई की। रहने योग्य बनाया। लेकिन पहली ही बरसात में उसकी दीवार गिर गई। मदद के लिए सभी से गुहार लगाई पर किसी ने साथ नहीं दिया। कई बरसातें उस पर पड़ीं और घर कई जगह से गिर गया था। ससुराल वालों ने शामा को गौशाला से निकालने के भी बहुत प्रयत्न किए पर उसने हिम्मत बांधे रखी और वहाँ से नहीं गई।

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