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12.31.2007
 

आडम्बरपूर्ण धर्माचार के विरोध में रचा गया अपनी तरह का पहला उपन्यास-हिडिम्ब

श्रीनिवास श्रीकान्त

एस. आर. हरनोट

पुस्तकः हिडिम्ब (उपन्यास)

लेखकः एस.आर.हरनोट

प्रकाशक- आधार प्रकाशन प्रा०लि०, पंचकूला-हरियाणा। 

इन दिनों गल्प की दुनिया में जो उपन्यास अलग अस्मिता कायम कर पाया है, वह है उत्तर-पश्चिमी हिमालय के ठेठ देहाती परिवेश को लेकर लिखा गया शावणू नड़ और उसके परिवार का करुण आख्यान हिडिम्ब। यह है महाभारत की सामरिक महागाथा में वर्णित एक असुर चरित्र जिससे हिन्दी साहित्य का पाठक पूर्व परिचित होगा। अतः इसकी पार्श्व कथा में जाना प्रासंगिक नहीं है, इसलिए भी कि उपन्यास के वृत्त में हिडिम्ब एक मिथक प्रतीक के रूप में ही परोक्षतः प्रयुक्त हुआ है। उपन्यास की कथा में इस पात्र का प्रयोग राक्षसी वृत्ति के रूप में हैं जो आज के मनुष्य के भीतर प्रवेश कर गयी है। उपन्यास में यह सामाजिक, आर्थिक व संस्कृतिक विघटन के रूप में रेखांकित है। कहानी के दौरान असुर ही की बहन भीत पत्नी हिडिम्बा जिसमें घाटी के लोग विशेष आस्था रखते हैं, एक अलग प्रकार के मायावी संसार का सृजन करती है। पर्वतीय भूदृश्य और घटना क्रम सहित इस उपन्यास में हिडिम्बा एक अद्‌भुत फन्तासी बन कर कथा के मध्य प्रक्षेपित है। हिडिम्ब पूरी कहानी में एक अप्रस्तुत प्रेताथ बनकर ही आया है, एक आर्किटाइप छवि है जो सम्भवतः घाटी के लोगों के सामूहिक अवचेतन को भी व्यक्त करती है। हिडिम्ब की भाषा सरल और गैर-अलंकारिक है। अत्याधुनिक समकालीन उपन्यासों की तरह इसमें आरोपित शैली और तामझाम वाला संसार निर्मित करने का प्रयास नहीं किया गया। इसका यथार्थ कंकरीट वास्तविकता के साथ-साथ पहाड़ी देहात के ठेठ आदमी की सरल और निष्पाप भावनाओं का प्रतिनिधितत्व करता है। आंचलिकता भाषा/बोली की संरचना के स्तर पर उतनी स्थानीय न भी हो, अपनी विषयवस्तु के स्तर पर वह जातीय स्तर पर विशिष्ट है।

अकुलीन वर्ग के ग्रामजनों और उनके परिवारों का साधन-सम्पन्न वर्ग के लोगों द्वारा पैदा किया गया त्रास हिडिम्ब की कथा को वर्ग संघर्ष का पक्षधर बनाती है। गाँवों की ओर से आने वाले समय लिए यह एक कटु है जो हमें वहाँ के समाज के निहित खतरों से आगाह करता है। आडम्बरपूर्ण पूरा धर्माचार के विरोध में रचा गया यह हिन्दी का अपनी तरह का पहला उपन्यास है जिसे हरनोट ने अपने भोग्य और स्मृत्य अनुभवों के आधार पर बुना है। पर्वतांचल की जमीन को स्पर्श करती हुई इस कथा को उपन्यासकार ने एक समुचित फ्रेम में बाँधा है पर इस में न अनावश्यक उकसाहट अथवा व्यग्रता है और न ज्यादा दबाव अथवा मंद स्वर। उदासी का निर्वेदभाव पूरी कथा पर छाया हुआ है जो पात्रगत परिताप के क्षणों में कहीं कहीं व्यष्टिगत दायरे में भी उपन्यासकार ने कथा को कृत्रिम मेहराबों पर खड़ा करने की कोशिश नहीं की। कल्पना, स्वैरकल्पना और यथार्थ एक दूसरे के इतने करीब हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। वे सब मिलजुल कर पहाड़ के प्रताड़ित आदमी की हैसियत, उसकी मनोसामाजिक अवस्थिति और धारणात्मक भावबोध का प्रतिनिधित्व करते हैं।

हिडिम्ब का ताना-बाना बुनने में उपन्यासकार ने अपनी स्वतंत्रता को समकालीन लेखकीय और आलोचनागत धारणाओं से मुक्त रखा है। इन तथिकथित रिवायतों से उसका कोई लेना देना नहीं हैं उस पर कोई ऐसा ठप्पा नहीं लगाया जा सकता कि वह अमुक शैली अथवा फलसफे का कायल है। उसने अपनी कथा के जैवीविकास को नैसर्गिक क्रम में घटित होते दिखाया है। सत्ता लॉबी द्वारा बलात्‌ उसका यौनाचार के चित्र कहानी में  होते हुए भी पाशविक उत्सुकता जगाने वाले अथवा अभ्रद नहीं लगते। वे सब राजनितिज्ञों और उनके परिकरों के प्रति वितृष्णा और आक्रोश का भाव ही जगाते हैं। अगर आज का साहित्य कुछ ऐसा कर सके तो उसे अपनी नैतिक जिम्मेंदारियों उऋण कहना असंगत नहीं होगा। हिडिम्ब में घटित दिखाकर भी नैतिक बोध यथायोग्य रक्षा की गई है! 

हिडिम्ब हिमाचल के अँचल विशेष की कहानी होते हुए भी व्यापक सरोकार लिए हुए हैं। लेखक ने आरम्भ में ही अपने मुख्य चरित्रों का अलग से रेखांकन कर उन्हें प्रस्तुत किया है ताकि कथा में उनके अस्तित्व का पूर्वाभास कराया जा सके। कहानी ज्यादातर शावणू, उसकी पत्नी सूरमा देई, बेटी सूमा और बेटे कांसी राम के जीवन, परिवेश और परिस्थितियों पर आधारित है। इनक चरित्रांकन, इनकी गृहस्थी, गाँव, घर और परिवेश को आरम्भ में ही चित्रित कर लेखक ने कथा की वेदिका बनायी है। वह काम जिसे नाटककार नाटक में दृश्यांकन के लिए करते हैं उसे उपन्यासकार ने उपयुक्त स्थलों पर पटकथा के रूप में भी प्रयुक्त किया है। पर जहाँ नाटक के मामले मे ऐसी तफसीलें रंगकार को चारित्रिक और दृश्यांकन के स्तर पर सूत्रात्मक आधारभूत जानकारी देते है वही उपन्यास की कथा में वे पाठक के मानसपटल के दृश्यस्थल तक आसानी से ले जाती है। पाठक के लिये न सिर्फ कथा के भौगोलिक  परिवेश में उतरना आवश्यक है बल्कि पात्रों से उसका रिश्ता जानना भी जरूरी है। वर्ना ऐसे उपाख्यान मानसिक दायरे से बाहर आकर अपने आपको अन्तर्बाह्य दोनों में साथ-साथ स्थापित नहीं कर पाते। लेखक ने इस बात का ध्यान रखा है और जिनके लिये वह लिखा गया है उनके आस्वाद को भी उसने अपनी रचना में टटोला है। उपन्यास के मुख्य पात्रों के अतिरिक्त कहानी में शोभा लोहार की प्रविष्टि और विलोप अर्थमय है। वह एक चरित्रनायक है जो बेशक कहानी में बहुत थोड़ी देर के लिये आता है फिर भी अपनी एक ऐसी छाप छोड़ जाता है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। वह शावणू की दास्तान वैचारिक और रचनात्मक सम्बल प्रदान करता है। वह एक ऐसा पात्र भी है जो गत पीढ़ी का होते हुए भी अपने समय की विसिंगतियों और आ रहे बदलावों को एक सही परिप्रेक्ष्य में समझना है और उपन्यास के नायक को समर्थन भी देता है। शोभा लोहार की ही वजह से यह कहानी विघटनात्मक स्थिति में भी कुछ हद तक सन्तुलित और हमवार बनी रहती है। यद्यपि ऐसी स्थितियाँ परिव्याप्त अवसाद को कुछ देर के लिए स्थगित करने के इलावा वह आश्वासन नहीं दे पाती जो परितप्त  लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव की सम्भावाना पैदा कर सके।

उपन्यास में नरबलि प्रथा का एक सनसनीखेज वृत्तान्त भी है। यह प्रथा है सावधिक मनाया जाने वाला लोक देवता का धर्माचारी उत्सव काहिका। ऐसा ही एक उत्सव है भुण्डा जिसकी गत दिनों प्रिंट व इलैक्ट्रानिक मीडिया में खूब चर्चा रही। अपनी कहानी जीनकाठी में हरनोट ने इस प्रथा का भी पूरा वृत्तान्त दिया है। पर यहाँ ज़िक्र है नरबलि उत्सव काहिका का। आदमखोर प्रथाएँ असुरी सभ्यता के अवशेष हैं जिन्हें छुटपुट रूप से आज भी उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है। अपने धर्माचर में ये आदिम विधिविधान की परिचायक है जिनमें एक आरक्षित और दुर्लभ जाति के आदमी को बलिपशु की भूमिका अदा करनी पड़ती है। हिडिम्ब में काहिका का सुविस्तृत प्रसंग है जिसे लेखक ने सविस्तार बयान किया है। शावणू जातिदंश का मारा एक नड़ है जिसके पिता को कभी काहिका उत्सव का बाल पुरुष बनाया गया था और वह काहिका महाभिषेक समारोह में मुत्यु को प्राप्त हो गया था।  शावणू तब बच्चा था।

हरनोट ने शावणू की बाल्यस्मृतियों के जरिये काहिका सम्बन्धी पूरी प्रक्रिया को पुनः निर्मित किया है जिससे इस बात का रहस्योघाटन होता है कि हमारा मनुवादी वार्णिक समाज अकुलीन जाति के लोगों को धर्माचार के बहाने क्या क्या यातनाएँ देता रहा है और यही नहीं, वह आज के समय में भी जारी हैं। राजनीतिज्ञ निहित स्वार्थ के लिये ऐसी प्रथाओं को आज भी प्रोत्साहन देते हैं। काहिका में जो व्यवहार कभी शावणू के पिता को दिया गया था उसका दोहराव शावणू के लिये भी किया जाता है। यह सम्भव कोशिश की जाती है कि नड़ परिवार के इस आदमी को फिर फाँसा जाए मगर वह अपनी युक्ति और जतन से उस कूटावपात(ट्रेप) से बाहर आने में कामयाब रहता है। काहिका के सन्दर्भ में शावणू का जातिदंश हिडिंब उपन्यास का एक महत्वपूर्ण मुकाम है जो दलित के अस्तित्वगत संकट रेखांकित करता है। काहिका का उन्मूलन इस प्रसंग का गुह्य सन्देश है जिसे हम जातीय न्याय की गुहार भी कह सकते हैं। कुछ भी कहो, यह हमारे समय में, जबकि हमारा समाज दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र के अन्तर्गत इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है, ऐसे तथाकथित देव-कर्मकाण्ड इन्सानियत के लिये एक आपत्तिजनक और शर्मनाक बात है।

हिडिम्ब के जरिये आसुरी और अमानुषिक काहिका की अन्धी परम्परा को लेखक ने खुली रोशनी में लाने का प्रयास किया है। सामाजिक अन्याय के विरुद्ध बराबर का प्रतिवाद एस आर हरनोट के गल्प का मूलभूत लक्ष्य है जो अनेक पहलुओं से उनकी अन्य कथाओं में भी उभर आया है। बहरहाल, हिडिम्ब एक बहुआयामी देहाती परिवेश का उपन्यास है जो यह दिखाता है कि बाहरी दुनिया से आज भी कटी इन पर्वतीय उपत्यकाओं में अधिवासी समुदायों को बाहर से आयी वर्णाश्रमी जातियों ने किस प्रकार अपने आखेट का लक्ष्य बनाया था और जहाँ यह जातिवाद के रूप में भूमिगत अब भी अपना वुजूद बनाये बनाये हुए है।

आरम्भ में पात्रों का मुख्तसर बयान कथाभूमि में उनके अवतरण को बड़े ही सलीके से असरदार बनाता है। इससे नड़-परिवार और समाज में उसकी हैसियत तो जग-जाहिर होती ही है, उनका चरित्रांकन भी कथारम्भ से पहले ही पाठक में कौतुहल जगाता है विशेषकर ऐसे पाठकों में जो इस तरह की भावभूमि से परिचित नहीं है। हरनोट ने अपने प्रमुख पात्र शावणू और पत्नी सूरमा के पारिवारिक परिवेश की उर्ध्वरेखाओं को उनके बच्चों समेत सुस्पष्ट ढंग से खींचकर उनकी दुनियावी छवियों को स्थिर किया है। बेटी सूमा की युवावस्था का विवरण देते हुए भी लेखक कन्या-हितके नैतिक भाव से परिप्लावित नजर आता है कि कैसे एक अबोध, अल्हड़ किशोरी एक सम्पूर्ण औरत में बदलने लगी है। इस सन्दर्भ में यहाँ एक खूबसूरत अंश उद्धरित करना प्रासंगिक होगाः

’........(वह) जब चलती या दौड़ती है तो उरोज कुछ ज्यादा ही उछल जाते। इसलिये माँ हमेशा संभलकर चलने की हिदायतें देती रहती। सूमा खुद भी छाती पर अच्छी तरह दुपट्टा ओढ़े रखती है। पर समय से पहले जवान हो रही सूमा छातियों की सुदृढ़ता कैसे रोकती...अब बेटियाँ तो आँगन की डाली की तरह बढ़ती हैं’...इत्यादि।

पितृत्व का यह भाव निर्धनों, दुर्बलों और असुरक्षितों में भी सहज जीवित नैतिक भावना का उद्‌घाटन करता है और ाहिर करता है कि वे लोग जिनका रूढ़ हुई वर्ण परम्परा में कोई स्थान नहीं है, भौतिक खुशहाली से ज्यादा नैतिक सौरव्य की कितनी चिन्ता करते हैं। ऐसे छोटे छोटे किन्तु अनेक लाक्षणिक उदाहरणों से यह उपन्यास भरा पड़ा है जो पूरे आख्यान को मूल्यगर्भित बनाता है, बिना कोई अतिरिक्त परामर्श अथवा उपदेश दिए।

इस पर्वतांचलीय आख्यान को हम प्रेमचन्द परम्परा की पुनः बहुलाहट भी कह सकते हैं जिसे फणीश्वरनाथ रेणु, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी आदि के बाद बहुत कम लोगों ने सुना होगा। हिन्दी में ऐसी कथाओं का बाहुल्य है जो मूलतः नगराधारित हैं जबकि बहुत से अभावग्रस्त धूसर क्षेत्र देहातों में पीछे छूट गए हैं। पर्वतीय परिवेश के हाल के दिनों में सामने आए दो उपन्यासों-एक सुभाष पन्त आ उत्तरांचल की पर्वतीय तराई का पहाड़ चोरऔर दूसरा आसुरी प्रविति से ग्रस्त हरनोट का हिडिम्ब। इन दोनों उपन्यासकारों ने निश्चय ही पूर्व ग्रामाधारित गल्प परम्परा के उत्तरांग को सुदृढ़ किया है। वैसे भी पहाड़ की पक्षधरता कथा साहित्य में कमतर ही हुई है क्योंकि बाहर से आये स्वनामधन्य लेखक पहाड़ों को आजतक महज आगन्तुक की दृष्टि से देखते रहे हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि हिमाचल, उत्तरांचल और अन्य पर्वतांचलों के लेखक हाल ही में इस ओर प्रेरित हुए हैं और कुछ बेहतरीन कथा साहित्य हिन्दी क्षेत्र से अब परिचित होने लगा है।

ग्राम देवता के नाम पर दान के रूप में प्राप्त शावणू की भूमि उपजाऊ होना, उसके पास से एक पौराणिक नदी का बहना, चरांद व ग्वाल परिवार की वस्तुस्थिति और आसपास के पर्वतीय भू-दृश्य सब मिलजुल कर कथा-स्थल के परिदृश्य और उसकी मानवीय वस्तु को आकर्षक बनाते हैं। उपन्यासकार इन सब के बीच से गुजरता हुआ हालात का कई कोणों से जायजा लेता है। उपन्यास में संकटावस्थित नड़ परिवार और उसकी देव दक्षिणा के रूप में प्राप्त जमीन पर मन्त्री की अन्त पर्यन्त गिद्ध दृष्टि कथा का एक विवादास्पद केन्द्र बिन्दु है। लेखक द्वारा इस का विवरण कथा को भौतिक स्तर पर संघर्षमय बनाता है। इसे हम निहित स्वार्थ की राजनीति का एक प्रामाणिक वृत्तान्त कहेंगे जिसमें राजनीतिज्ञों और उनके परिकरों के व्यवहार की कटु समीक्षा की गयी है। यहाँ यह बताना अनिवार्य होगा कि पर्यटन व्यवसाय बढ़ने से पर्वतीय राज्यों में बाहर तथा स्थानीय राजनेताओं और व्यापारियों के बीच होड़ सी लगी है। वे पहाड़ों के सुरम्य स्थलों में जमीनें हथियाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हें न वहाँ की संस्कृति की चिन्ता है और न पर्यावरण और प्रकृति से कुछ लेना-देना है। गरीब लोग तो उनके लिए कुछ भी नहीं हैं।

घाटी की यथास्थिति में कथा का आरोपण यहीं से शुरू होता है। देहात के दौरे पर आया मन्त्री प्रकट रूप से आता तो जनहित के लिए है पर उसकी अन्तर्दृष्टि महज अपने ही स्वाथ बिन्दुओं का जायजा लेती रहती है। उसके लिए शावणू नड़ की नदी तट की जमीन जिस्मानी हवस की तरह है। इस विलासी, पियक्कड़ और दुष्टवृत्ति जीव के मन में यह तीव्र इच्छा पैदा होती है। वैसे ही जैसे कभी वह किसी पहाड़ी यौवना को देख लेता और मन उसे भोगने के लिए व्याकुल हो उठता।वह उस सुन्दर घाटी में शावणू की जमीन पनदी के किनारे एक आलीशान कोठी, एक सौ कमरे वाला पाँच सितारा होटल और एक फार्म हाउस बनाना चाहता है जिसमें सौ गायें पालकर वह खुद को धनाढ्य बना सके। इस कार्य में उसका साथ दिया मुख्यतः जिलाधीश, ठेकेदार और एक पटवारी ने जिसकी एक और इच्छापूर्ति के लिए अब तक एक गरीब की कुर्बानी स्थानीय प्रशासन पहले ही दे चुका था और इसी क्रम में अब बारी थी शावणू नड़ की। मंत्री चरित्रांकन में उपान्यासकार ने विकृत और गैरमानुषी यौनाचार के कुछ और वृत्त भी जोड़े हैं जो कथा के कटु-यथार्थ को और गाढ़ा करते हैं। मंत्री से सम्बन्ध रखने वाले किस्सों में लेखक ने आज की भ्रष्ट राजनीतिक वस्तुस्थिति और उससे उत्पन्न त्रासदिक वातावरण का निर्माण किया है जो कटूक्त तो है ही, सही स्थिति की गम्भीरता का भी दिग्दर्शन करता है।

कथा में सूमा का अंग्रेज से अनुबन्धित विवाह उपन्यास का एक ऐसा उपसाध्य है जिसे अनजान पाठक, आलोचक और लेखक फिल्मी अन्दाज का एपिसोड कह सकते हैं। मगर ऐसा बताना भ्रामक होगा क्योंकि न केवल हिमाचल बल्कि अन्य पहाड़ों में भी देशान्तर विवाह हुए हैं। हिमाचल की कुल्लू घाटी में आज से लगभग शताब्दी वर्ष पूर्व राजके समय जब आयरलैण्ड, अमेरिका और विलायत से फौजी अफसर और विदेशी नागरिक यहाँ आये थे और यहीं के स्थायी बाशिंदे भी बन गये थे, उनमें से कुछेक ने पहाड़ी स्त्रियों से विवाह रचा कर यहीं अपना परिवार बसा लिया था। आज भी ऐसे विजातीय संयुक्त परिवारों के वंशज पहाड़ के घाटी क्षेत्रों में कहीं-कहीं देखे जा सकते हैं। आज भी ऐसे विवाहों का चलन पर्वतीय क्षेत्रों में प्रवर्तित है इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसे विवाहों को फिल्मी कल्पना नहीं कहा जा सकता। बहिष्कृत जाति की बेटियों के सामने ऐसे विकल्प यद्यपि हमारे समाज के लिए एक निंद्य बात है फिर भी उपन्यासकार हरनोट ने इस ऐसी एक घटना का चयन एक समन्वयात्मक दृष्टिकोण से दिया है। अनुबन्धित दाम्पत्य व्यवस्था होते हुए भी हिडिम्ब में समाजशास्त्रीय स्तर पर हम इस कल्पित घटना को  यथार्थ की एक सदाशययुक्त बनागी ही कहेंगे। स्वजातीय वर्णवादी व्यवस्था के लिए अन्तर्जातीय और देशान्तर विवाह का यह विकल्प एक करारा जवाब है।

संक्षेप में हिडिम्ब की कथा को हरनोट के उपन्यासकार ने रचनात्मक और सकारात्मक व्यवहार दिया है। कहानी के अन्त में प्रकृति का प्रकोप और उससे उत्पन्न आपात स्थिति जहाँ परोक्षतः पर्यावरण के असंतुलन और भग्न हुई सुव्यवस्था के परिणामों को सकेन्द्रित करती है वहीं भ्रष्ट राजनीति के स्वप्नलोक को भी चूरचूर करती है। इन सभी दृश्यों में शावणू एक तटस्थ पर्यवेक्षक की तरह है जो कथा के इस अन्तिम और प्रतीकात्मक विसर्जन का एक मात्र गवाह है। हिडिम्बका उपाख्यान सृजन, वहन और समापन सहज-असहज तथा विषम-अविषम प्रक्रियाओं से गुजर कर अन्त में एक पश्नाकुल किन्तु निर्णायक बिन्दु पर चेतनात्मक विस्फोट के साथ समाप्त हो जाती है जिसकी आवाज महज बाहर ही नहीं अन्दर भी प्रतिध्वनित होती है।


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