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03.08.2007
 

वसंतोत्सव की निराली छटा
रंजना सोनी, सिक्किम


तरह-तरह के पुष्पों से गूँथा एक हार है भारत। यहाँ के सभी क्षेत्रों मे अलग-अलग तरह से पर्व-त्योहार मनाये जाते हैं, उनमें होली एक है। खासतौर से यह त्योहार उत्तरी भारत में ज्यादा मनाया जाता है। जब गुलाबी सरदी के बाद गुनगुनी धूप आने लगती है, किसान अपने-अपने खेतों से नयी फसल काट कर रख रहे होते हैं और उनके हाथों में पैसा होता है इसके साथ हवाओं मे वासंती महक घुली होती है जो किसानों के साथ- साथ सभी लोगों को इस फागुनी फुहार मे भींगने को मजबूर कर देती है।

संस्कृत शब्द होलक्का से होली शब्द का जन्म हुआ है। वैदिक युग में (होलक्का) को ऐसा अन्न माना जाता था, जो देवों का मुख्य रूप से खाद्य-पदार्थ था। होली रंगों का ऐसा त्योहार है, जिसमे रंगकर लोग बैर-भाव भूल जाते हैं। होली के कई दिन पहले से ही दुकाने रंग-गुलाल, पिचकारियों और मिठाईयों से इस तरह सज जाती हैं जैसे कतारों में रंग -बिरंगी दीप-मालिकाएँ झिलमिला रहीं हों। बच्चे रंग-गुलाल, पिचकारियाँ खरीद कर आनन्द-विभोर हो जाते हैं और उमंग में आकर पहले से ही लोगों पर रंग डालने लगते हैं। ठंढाई और भाँग खाने का भी रिवाज है। होली के एक सप्ताह पहले से लोग लोकगीत गाने लगते हैं। बंगाल मे होली को डोल यात्रा या झूलन पर्व, दक्षिण भारत में कामथनम, मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़् में गोल बढ़ेदो नाम से उत्सव मनाया जाता है और उत्तरांचल में लोक संगीत व शास्त्रीय संगीत की प्रधानता है।

 होली के दिन समान्यतया स्त्रियाँ सफेद साड़ी या सलवार- कुर्ता पहनती हैं। पुरुष और बच्चे कुर्ता-पायजामा पहनना पसंद करते हैं। लोग एक दुसरे पर पिचकारियों से रंग डालने के साथ रंग भरी बालिटयाँ भी उड़ेलते हैं और गुलाल लगाते हैं। इस दिन आने-जाने वाले किसी को नहीं छोड़ते - कहते हैं बुरा नहीं मानो होली है। लोग एक दूसरे के घर जाते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं और रंग-गुलाल के साथ -साथ गुझिया और मालपुआ जैसे विभिन्न प्रकार के पकवान व मिठाईयों का आनन्द उठाते हैं और गाते हैं -

छूटे ना रंग ऐसी रंग दो चुनरिया
धोबन धोए चाहे सारी उमरिया
मन को रंग देगा साँवरिया
तोरे कारन घर से आए हूँ निकल के
सुना दे जरा बाँसुरी

होली आया रे आया रे होली आया रे...

होली के संदर्भ में कुछ कथाएँ प्रचलित हैं -

मुख्य रूप से यह धारणा अधिक प्रचलित है। प्राचीन काल में, एक अत्याचारी राक्षसराज हिरण्यकशिपु था जिसे आकाश-पाताल, सुबह-शाम, मनुष्य-जानवर किसी से कभी भी नहीं मरने का वरदान मिला हुआ था। उसका एक पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का परम भक्त था और उस पर भगवान विष्णु की कृपा-दृष्टि थी। यह राक्षसराज को कतई पसंद नहीं था। खुद को वह तीनों लोकों का स्वामी समझता था। उसने अपने पुत्र को कई बार डरा-धमका कर विष्णु की अराधना से रोकना चाहा लेकिन वह फिर भी नहीं माना और अराधना लीन रहा। उसने प्रह्लाद को मार डालने की योजना बनायी राक्षसराज ने उसे पहाड़ से गिराया और तरह-तरह का षडयंत्र किये। लकिन उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ। फिर उसने अपनी बहन होलिका की सहायता ली। उसे (होलिका) एक ऐसी चादर वरदान में मिली थी जो आग में नहीं जल सकती थी। अग्नि की तेज लपटों के बीचों-बीच होलिका को चादर ओढ़ा कर प्रह्लाद को गोद में बैठा दिया। लेकिन आश्चर्य, होलिका ही जल गई प्रभु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सही-सलामत बाहर आ गया। आज भी हम बुराई पर अच्छाई के जीत के रूप मे होलिकादहन करते हैं। उसके अगले दिन होली मनाई जाती है। अन्ततः नरंसंहा अवतार में भगवान विष्णु ने खंभे से निकल कर गोधूली वेला में अत्याचारी हिरण्यकश्यप को मार डाला और लोगों को अत्याचार से मुक्त किया। फिर प्रह्लाद को राजा बना दिया गया।

रंगो का यह त्योहार होली, श्रीकृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम के प्रतीक रूप में मथुरा और रासलीला स्थली वृन्दावन के अलावा नंदगाँव, बरसाना, गोकुल, लोहबन और बलदेव जैसे गाँव में भी होली एक सप्ताह पहले से शुरू हो जाती है।

यहाँ की लठमार होली प्रसिद्ध है। उनके संग खेलनेवाली राधारानी का जन्मस्थली नंदगाँव से बरसाने की दूरी बमुश्किल तीन से चार किलोमीटर है। इन दिनों नंदगाँव के गोप राधारानी के गाँव बरसाने के गोपियों से और बरसाने के लोग नंदगाँव में होली खेलने जाते हैं। इन पुरुषों को होरियारे कहा जाता है। रंग-बिरंगी लहँगा-चुन्नी पहने स्त्रियाँ, हाथों मे मोटे-लंबे लट्ठ थामे हुए फागुनी रंग मे रंगे हुए छैला के मन को मर्यादित करने के लिए तैयार रहती है। फिर भी निडर ब्रजवासी चुहल कर ही बैठते हैं, इस चुहल का जवाब भाभियाँ लाठियों के प्रहार (स्वागत सत्कार) से देती है। जिससे रसिक मिजाज देवर भागने को विवश हो जाते हैं। परंतु वे भी इस लाठी के स्वागत सत्कार से बचने के लिए सिर मे विशेष प्रकार की कसी हुयी पगड़ी बाँधे हाथ में ढाल लिए तैयार होकर आते हैं। ढाल से भाभी से मिले लाठी के तीव्र प्रहार से तो खुद को बचा लेते हैं लेकिन भाभी की सलज्ज मधुर मुस्कान के आगे नतमस्तक हो जाते है। महानायक श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली ब्रजभूमी के गाँव की गलियों में होली से पहले ही सफाई कर, मिट्टी बिछा दी जाती है। नंदगाँव में फागुनी रंग में रंगे देवर-भाभी के बीच चुहल के नज़ारे मनोरंजक होते हैं। श्रीकृष्ण के नंदगाँव और राधा के बरसाने के बीच फैले स्नेह भाव के स्मृतियों को अमिट रखने के प्रयास(लठमार होली) के रूप में सकार हो उठना हमारी धार्मिक इतिहास के सुनहरे पन्नों को त्योहार के रूप में संजोना अनूठा है।

माघ पूर्णिमा से ही ब्रजवासी शीत ऋतु के बाद गुलाबी उष्मा से उद्वेलित होकर फागुनी रंग में रंगने लगते हैं। इस दिन का चढ़ा नशा चालीस दिन बाद जाकर रंगपंचमी (फागुन कृष्णपंचमी) को उतरता है। ब्रजभूमी के अलावा देश भर मे फैले ब्रज परंपरा के राधा-कृष्ण मंदिरों मे वसंत पंचमी से ही गुलाल चढ़ने लगता है। इसके साथ-साथ रसिया गायन भी शुरू हो जाता है, जवान से लेकर अधेड़ ही नहीं बूढ़े भी इसकी रसीली धुन से नहीं बच पाते। रसिया गायन में भक्ति और अध्यात्म की  चर्चा होती  है लेकिन मूलतः श्रृंगार रस की ही प्रधानता होती है। होली के दिन तो नंदगाँव संगीत की सुमधुर स्वर लहरियों से भींगने लगता है। महिलाऐं गाने लगती हैं रसीया-

आज बिरज में होरी रे रसिया।
कै मन लाल गुलाल मंगायो
,
कै मन केसर घोरी रे रसिया
?
नौ मन लाल गुलाल मंगायो
, दस मन केसर घोरी रे रसीया
काहे में रे गुलाल मंगाई
, काहे में केसर आयी रे रसीया?
नौ दस गाड़ी गुलाल मंगाई
, कारन में केसर आई रे रसीया
कौन गाँम के कुँवर कन्हाई
, बरसाने की गोरी रे रसीया।

एक  अन्य किवंदती भी है राक्षसी पुतना श्रीकृष्ण को मारने के उद्देश्य से विषपूर्ण दुग्धपान कराना शुरू किया लेकिन श्रीकृष्ण ने दूध पीते-पीते उसे ही मार डाला। कहते हैं, उसका शरीर भी लुप्त हो गया तो गाँव वालों ने पुतना का पुतला बना कर दहन किया और खुशियाँ मनायी। तभी से मथुरा मे होली मनाने की परंपरा है।

एक अन्य मुख्य धारणा है कि हिमालय पुत्री पार्वती भगवान शंकर से विवाह करना चाहती थी। चूँकि शंकर जी तपस्या में लीन थे इसलिए कामदेव पार्वती की मदद के लिए आए। कामदेव ने अपना प्रेमवाण चलाया जिससे भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई। शिवशंकर ने क्रोध में आकर अपनी तीसरा नेत्र खोल दिया। जिससे भगवान शिव की क्रोधाग्नि में जलकर कामदेव भस्म हो गए। फिर शंकर जी की नज़र पार्वतीजी पर गई। शिवजी ने पार्वती जी को अपनी पत्नी बना लिया और शिव जी को पति के रूप में पाने की पार्वती जी की अराधना सफल हो गई। होली के अग्नि में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर सच्चे प्रेम के विजय के रूप में यह त्योहार विजयोत्सव के रूप मे मनाया जाता है।

मनुस्मृति में इसी दिन मनु  के जन्म का उल्लेख है। कहा जाता है मनु ही इस पृथ्वी पर आने वाले सर्वप्रथम मानव थे।

इसी दिन नर-नारायणके जन्म का भी वर्णन है जिन्हें भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना जाता है।

सत्ययुग में भविष्योतरापूरन नगर में छोटे से लेकर बड़ों को सरदी-जुकाम जैसी बीमारियाँ लग गई। वहाँ के लोग द्युँधा नाम की राक्षसी का प्रभाव मान रहे थे। इससे रक्षा के लिए वे लोग आग के पास रहते थे। सामान्यतौर पर मौसम परिवर्तन के समय लोगों को इस तरह की बिमारीयाँ हो जाती हैं, जिसमे अग्नि राहत पहुँचाती है। शामी का पेड़ जिसे अग्नि-शक्ति का प्रतीक माना गया था, उसे जलाया गया और अगले दिन सत्ययुगीन राजा रघु ने होली मनायी।

इस तरह देखते हैं कि होली विभिन्न युगों में तरह-तरह से और अनेक  नामों से मनायी गयी और आज भी मनायी जा रही है। इस तरह कह सकते हैं कि असत्य पर सत्य की या बुराई पर अच्छाई पर जीत की खुशी के रूप मे होली मनायी जाती है। इसके रंगो मे रंग कर हम तमाम खुशियों को आत्मसात कर लेते हैं। सच ही कहते हैं -

तन रंगे मन रंगे भूले बैर भाव,
रंग रंगीले गरियारे
, ओसारे और गाँव,
यूँ तो बसे हुए जहाँ में सातों रंग-रंगीले
,
सात सुरों में मिलकर गाएँ
, फागुन जमुना तीरे,
सात रंग और सात सुरों का संगम होली लाई
,
भांग घोंट कर
, पिचकारी भर सभी बन गए कन्हाई।