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ISSN 2292-9754
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05.26.2014

अप्रकाशित उपन्यास ’नीरदा’ का एक अंश

बाज़ार


फरवरी के अंतिम सप्ताह का रविवार। ठंड ने पाँव समेटने भले ही शुरू कर दिए थे लेकिन पश्चिम से आती हवाओं में जनवरी जैसा अहसास बरकरार था। रात वह देर से सोया था। प्रत्येक आखिरी शनिवार मित्र उसके यहाँ आ जुटते थे। वे हर शनिवार किसी न किसी के घर देर तक बैठते थे। वैश्विक घटनाओं, राजनीति, साहित्य और विश्वविद्यालय में घटित घटनाओं पर गर्मागर्म चर्चा करते और देर रात तक खाने-पीने का दौर चलता रहता था।

वे सभी कॉलेजों में हिन्दी प्राध्यापक हैं - नन्द अरोड़ा को छोड़कर। कमल गुप्त करोड़ीमल कॉलेज, भूपिन्दर सिंह खालसा, रामकृपाल तिवारी, जिन्हें वे आर.के. पुकारते, मोतीलाल नेहरू, पुनीत बग्गा राजधानी कॉलेज, और हरभजन दयाल डी.ए.वी. कॉलेज में थे। रामकृपाल तिवारी इनमें वरिष्ठ थे और प्रोफेसर पद पा चुके थे। शेष रीडर थे और उन सभी को रीडर बने भी अधिक समय नहीं हुआ था। दरअसल सभी ने एक-दो वर्ष के अंतर से उसी विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया था और अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए विश्वविद्यालय के तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ. नीलोत्पल राय के बंगले की साफ-सफाई से लेकर बर्तन माँजने तक से गुरेज नहीं किया था। स्नातकोत्तर के पश्चात ही एक-दो वर्ष के अंतराल में वे अपने लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रहे थे और अपने कनिष्ठों के लिए नीलोत्पल राय की सेवा के अवसर देते हुए कॉलेजों में पढ़ाने लगे थे। नौकरी की बेफिक्री उन सबको हर शनिवार जश्न के अवसर लेने के लिए उत्साहित करती और उन्हें उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहता।

कल भी माह का आखिरी शनिवार था। वे सभी शाम सात बजे ही उसके यहाँ आ जुटे थे। डिनर तैयार करने के लिए उसने अपनी बड़ी बेटी, जो उसके साथ रहती थी, से कहा। बेटी ने हर बार की भाँति कहा था, "पापा...आप जानते हैं...आप ढाबे को आर्डर कर दें.. मुझे अपनी फ्रेण्ड के यहाँ जाना है।"

वह जानता था कि इतने लोगों के लिए बेटी स्मृति के लिए खाना बनाना आसान नहीं था। सच तो यह था कि वह स्मृति को कभी ही खाना बनाने के लिए कहता...उसने उसे नाज़-नखरों में पाला था और उसके लिए वह स्वयं नाश्ता-खाना तैयार किया करता था। स्मृति को चिढ़ाने के लिए ही वह उसे डिनर बनाने के लिए कहता था और हर बार कहता था।

उसने घर से दो गली छोड़ ढब्बू के ढाबे को आर्डर कर दिया था। स्मृति अपनी मित्र के घर चली गई थी। उसने कभी भी बेटी के आवागमन में हस्तक्षेप नहीं किया। जब कभी पत्नी, जब वह साथ रहती थी, उसे टोकती, वह उसे डपट देता, "बच्चे छोटे नहीं...समझदार हैं...उन्हें अपने ढंग से जीने दो।"

पत्नी चुप रह जाती, लेकिन कुढ़ती रहती स्मृति के लौटने तक। छोटी बेटी इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए अमेरिका जा चुकी थी इसलिए पत्नी उसके विषय में अधिक नहीं सोचती थी। जो साथ थी उसे उसकी चिन्ता रहती। जब पत्नी अलग हुई, बड़ी बेटी ने उसके साथ जाने से इंकार कर दिया था, "तुम बोर हो...मैं पापा के साथ रहूँगी.।"

कल रात स्मृति साढ़े दस बजे जब लौटी उसके मित्रों के पीने के साथ साहित्य चर्चा का दौर जारी था। वे सारिका में प्रकाशित एक कहानी पर बहस कर रहे थे। उसने कहानी पढ़ी नहीं थी, इसलिए वह चर्चा का हिस्सा होकर भी उसमें भागीदारी नहीं निभा पा रहा था। उसने लेखिका का नाम भी पहली बार सुना था।

"विक्रांत, तुमने अपनी राय नहीं दी।"

"कहानी पढ़ी नहीं है," वह बोला।

"इस लेखिका की कोई कहानी तो पढ़ी होगी," कमल गुप्त ने पूछा।

"नाम ही आज पहली बार सुना," अपने पतले होंठ गिलास से छुआते हुए वह बोला, "किसी के पास पत्रिका है तो छोड़ दो...अगले शनिवार लौटा दूँगा।"

"रख लो...मैंने सभी कहानियाँ और समीक्षाएँ पढ़ ली हैं," सारिका थैले से निकालकर उसकी ओर बढ़ाते हुए हरभजन दयाल ने कहा।

विक्रांत ने पत्रिका एक ओर रख दी और नया पेग तैयार करने लगा।

"यार ढाबे वाला सो गया क्या?" नंद अरोड़ा को तेज़ भूख लग रही थी।

"बग्गा—तुम्हें पता है न ढाबा?" विक्रांत ने पूछा।

"मैं नहीं जाऊँगा.." पुनीत बग्गा ने भी नया पेग बना लिया था, "तुमने कहा भी था उसे?"

उसने बग्गा को घूर कर देखा और एक घूँट में गिलास खाली कर कुर्ते की बाँह से मुँह पोंछ उठ खड़ा हुआ। वह पाँच फीट दस इंच लंबा, छरहरे बदन, चपटे गाल, हड्डियाँ उभरी नाक...लंबोतरे चेहरे पर जो अलग से जोड़ दी गई प्रतीत होती थी, छोटा माथा और गुल्मयुक्त सिर वाला व्यक्ति था। उसके सिर पर बाल कम थे, फिर भी वह जतन से कंघी करता था। उसकी उम्र लगभग अड़तालीस वर्ष थी। वह तेजी से सीढ़ियों की ओर लपका।

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विक्रांत पहली मंज़िल में रहता था, जिसमें दो कमरे और सात बाई आठ की बैठक थी। कमरों में उस बैठक से होकर गुज़रना होता। दूसरे कमरे की खिड़की सड़क की ओर खुलती थी। सड़क भीड़-भाड़ वाली बाज़ार की ओर जाती थी और पहला कमरा बैठक और दूसरे कमरे के बीच था।

वह एक पुराना मकान था जिसमें वह किराएदार था। मकान बड़ा था और जिस भाग में वह रहता था वह मकान के पीछे का भाग था। मकान मालिक ने उसे दो भागों में बाँट दिया था। बड़े भाग में वह स्वयं रहता था, जिसका दरवाज़ा पूरब की ओर था। विक्रांत की ओर उसने ऊँची दीवार खड़ी करके उस भाग को बिल्कुल अलग कर दिया था। दक्षिण की ओर उसने चार दुकानें निकाली थीं। उन चार दुकानों से ही उस ओर के बाज़ार की शुरूआत मानी जा सकती थी। उन चारों के ऊपर बारह बाई तीस फीट के हिस्से पर मकान मालिक ने वे दो कमरे, बैठक, किचन, बाथरूम और टॉयलेट बनवाया था। शेष भाग खाली था, जिसमें खरंजा बिछाया गया था। उस हिस्से का प्रवेश पश्चिम की ओर था।

वह कॉलोनी डी.एल.एफ. ने उन्नीस सौ चौवन में बसायी थी। वह मकान उन्नीस सौ अट्ठावन में बनकर तैयार हुआ था और तब पाँच सौ वर्ग गज के उस मकान के पीछे के डेढ़ सौ वर्ग गज के उस भाग को मकान मालिक ने बागवानी के लिए छोड़ दिया था, लेकिन जब उसने दूसरे मकान मालिकों को दुकानें निकालते देखा, उस भाग में उसने भी दुकानें निकलवा दीं और उनके ऊपर वह हिस्सा बना दिया जिसमें विक्रांत अपने दो साथियों के साथ किराएदार के रूप में रहने आ गया था। उन दिनों कॉलोनी में तेज़ी से मकान बन रहे थे और व्यावसायिक दृष्टिकोण रखने वाले सभी मकान मालिक सड़क की ओर दुकानें या बड़े शो रूम बनवा रहे थे। उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि कॉलोनी में ज़मीनें खरीदने वाले लोगों में अधिकांश व्यवसायी थे या पार्टीशन में आए पंजाबी शरणार्थी जो मुआवज़े के रूप में मिली राशि उसमें खर्च कर रहे थे। चार-पाँच वर्षों में जो दुकानें या शो रूम खुले उन्हें खोलने वाले भी वे लोग ही थे और रेज़ीडेंट वेलफेयर एशोसिएशन में उन्हीं लोगों ने उस कॉलोनी को व्यावसायिक स्वरूप प्रदान करने का प्रस्ताव दिया था।

विक्रांत के उस किराए वाले हिस्से का मुख्य दरवाज़ा पुराना था और जब वह वहाँ किराएदार के रूप में रहने आया था तब भी वह वैसा ही था। तीनों साथी आपस में बातें करते कि मकान मालिक ने किसी टूटे मकान का पुराना दरवाज़ा औने-पौने में खरीदकर लगा दिया था। यही नहीं उसके कमरों के दरवाज़े और खिड़कियाँ भी पुरानी थीं।

उसके टॉयलेट, बाथरूम और किचन एक पंक्ति में बैठक से पहले सीढ़ियों के साथ बने हुए थे। खरंजा बिछे आँगन से ऊपर आने के लिए संकरी सीढ़ियाँ थीं, जिनमें एक ही व्यक्ति आ-जा सकता था। ऊपर चढ़ते ही दक्षिण की ओर पहले टॉयलेट, फिर बाथरूम और उसके बाद किचन थे। ये इतने छोटे थे कि बाथरूम में बमुश्किल बैठकर स्नान किया जा सकता था और किचन में कठिनाई से ही खड़ा हुआ जा सकता था।

जिन दिनों विक्रांत ने उस हिस्से को किरए पर लिया मकान मालिक को कोई किराएदार नहीं मिल रहा था। मकान मालिक उसे खाली नहीं रखना चाहता था। वह अग्रवाल था, रामनाथ अग्रवाल, जो जन्मतः व्यवसायी था। चाँदनी चौक में उसका कपड़े का थोक व्यवसाय था। उसे विक्रांत और उसके साथियों को किराएदार रखने में कोई परेशानी न थी, क्योंकि उसने अनुमान लगाया था कि वे लोग पढ़ाई समाप्त होने और नौकरी लगने के पश्चात स्वयं मकान खाली कर जाएँगे। लेकिन रामनाथ अग्रवाल ने जो सोचा था वह हुआ नहीं। विक्रांत के दोनों साथी नौकरी लगते ही चले गए थे । एक दिल्ली से बाहर और दूसरा विवाह कर दिल्ली में ही। नौकरी विक्रांत की भी लग गयी थी। डॉ. नीलोत्पल राय की कृपा थी उस पर और वह शिवाजी कॉलेज में स्थायी नियुक्ति पा गया था। डॉ. नीलोत्पल राय विश्वविद्यालय के पहले और अंतिम हिन्दी विभागाध्यक्ष थे, जो अवकाश ग्रहण करने तक उस पद पर बने रहे थे। तीन वर्ष का नियम उनके हटने के बाद बना था।

उस मकान के विश्वविद्याल से निकट की कॉलोनी में होने और कॉलोनी के दिल्ली की मुख्य बाज़ार में तब्दील होते जाने के कारण उसने उसे न छोड़ने का निर्णय किया था और लाला रामनाथ अग्रवाल ने भी खाली करने के लिए उसे नहीं कहा। उन्हें प्रतिमाह मिलने वाले किराए से मतलब था, जो विक्रांत उन्हें दे रहा था। लेकिन जब वह कॉलोनी पूरी तरह बाज़ार में तब्दील हो गयी, बाज़ार जहाँ दूर कॉलोनियों से भी लोग खरीदारी करने आने लगे तब लाला रामनाथ अग्रवाल ने अपने उस हिस्से का मूल्यांकन किया और उन्हें लगा कि यदि वह उस हिस्से को तोड़वाकर नये सिरे से दुकानें और शोरूम बनवाएँ तो दो बड़े शोरूम के साथ आठ दुकानें बन सकती थीं। व्यवस्था से हाथ मिलाकर उस हिस्से को तोड़कर दुकानों और शोरूम के ऊपर वह दो मंज़िलें भी खड़ी कर सकते थे। दुकानों और शोरूम की अग्रिम पगड़ी ही उन्हें इतनी मिलने वाली थी कि निर्माण कार्य के बाद भी खासी राशि उन्हें बचती दिख रही थी।

एक रविवार सुबह लाला रामनाथ अग्रवाल ने मकान खाली करवाने के विषय में विक्रांत से बात करने का मन बनाया। लाला को पता नहीं था कि विक्रांत हर शनिवार मित्रो के साथ देर तक रहने के कारण देर से सोता था और सुबह देर से, प्रायः ग्यारह तो कभी बारह बजे सोकर उठता था। उस शनिवार वह रात बारह बजे के बाद लौटा था और पत्नी से झगड़ने के बाद सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की वाले कमरे में जाकर सो रहा था। पत्नी दोनों बेटियों के साथ पहले कमरे में कुड़मुड़ाती हुई सो गयी थी।

रविवार सुबह सात बजे लाला रामनाथ अग्रवाल ने जब लगातार नीचे दरवाज़े की जंज़ीर खड़काई, वह जंज़ीरवाला पुरानी चाल का दरवाज़ा था, तब विक्रांत की पत्नी विनीता अग्रवाल की नींद खुली और उसने विक्रांत के कमरे की खिड़की से झाँककर जब लाला रामनाथ को देखा तब गाऊन में ही बाल सँवारती हुई नीचे उतरकर दरवाज़ा खोल दिया।

"जी भाई साहब!" विनीता ने धीमी आवाज़ में पूछा।

रामनाथ अग्रवाल बिना कुछ बोले खरंजा वाली फर्श पर चहल-कदमी करने लगे थे और ऊपर विक्रांत के किराए वाले हिस्से को देखने लगे थे। खरंजे पर टेढ़ा हुआ पुराना बजाज चेतक दीवार के सहारे खड़ा हुआ था। लेकिन लाला ने देखकर भी उसे अनदेखा किया। उन दिनों बजाज चेतक स्कूटर पर चलने वाले की भी ख़ास हैसियत मानी जाती थी। वर्षों की बुकिंग के बाद वह लोगों को मिलता था।
विनीता लाला रामनाथ अग्रवाल को टहलता देख अंदर ही अंदर भुनभुना रही थी। दो कारण थे—एक यह कि देर से सोने के कारण उसकी नींद पूरी नहीं हुई थी...उसकी आँखें कड़वा रही थीं और दूसरा यह कि प्रेशर बढ़ रहा था।

"भाई साहब, आपके लिए चाय बनाऊँ?"

"नहीं," मकान मालिक वाली अकड़ के साथ लाला रामनाथ अग्रवाल ने पुनः सीढ़ियों से लेकर दरवाज़े तक की जगह नापी, फिर बोले, "विक्रांत जी हैं?"

"सो रहे हैं," विनीता को सदैव यह भ्रम रहा था कि लाला जी उसी की जाति के हैं तो उसके प्रति उनके मन में पुत्री भाव अवश्य होगा। लेकिन रामनाथ अग्रवाल का इस सब में किंचित भी विश्वास नहीं था। जीवन में एक ही बात को महत्व देते थे...व्यवसाय और व्यवसाय में कोई जाति-बिरादरी नहीं।

लंबी चुप्पी के बाद रामनाथ अग्रवाल बोले, "ठीक है...जागने पर उन्हें कहें कि अगले महीने की आखिरी तारीख को मकान खाली कर देंगे।"

विनीता लाला रामनाथ अग्रवाल के चेहरे की ओर देखती रही, बोली नहीं।

"आप कह देंगी न!" लाला को लगा कि विनीता ने उनकी बात सुनी नहीं थी।

"जी, भाई साहब!"

लाला रामनाथ उलटे पाँव लौट गए।

विनीता ने लाला की बात विक्रांत को बतायी, लेकिन विक्रांत ने सुनकर भी नहीं सुना। वह अखबार पढ़ता रहा था।

विक्रांत लाला रामनाथ से मिलने भी नहीं गया। वह अगले महीने तक का अग्रिम किराया दे चुका था। लेकिन जब उसके बाद किराया देने वह पहुँचा, लाला का पारा गर्म था। पहली बार विक्रांत ने किराए के लिए उन्हें चेक दिया। लाला ने चेक हवा में उछाल दिया और लाल-पीला होते हुए कहा, "आपको आज मकान खाली करना था?"

विक्रांत ने सधे स्वर में कहा, "लाला जी मैं मकान खाली नहीं करूँगा। आज के बाद किराया कोर्ट में जमा करूँगा।"

"हुँह—देखता हूँ।"

और दोनों के मध्य मकान खाली करवाने और न करने का मुकदमा प्रारंभ हो गया था।

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जैसे ही विक्रांत सीढ़ियों के पास पहुँचा ढब्बू के ढाबे के दो लड़के डिनर थामें ऊपर चढ़ रहे थे।
"वापस लौटा ले जाओ खाना — नहीं चाहिए," विक्रांत चीखा।

"सर, देर हो गयी।"

"यह कोई समय है लाने का...? दो घण्टा पहले आर्डर किया था।"

"जी सर! गैस खत्म हो गयी थी...बिल्कुल गर्म है…," बड़ा लड़का जिसके हाथ में सब्जी-दाल थी, बोला। दोनों सीढ़ियाँ चढ़ते रहे। उनके लिए यह हर माह की बात थी।

"हुँह," विक्रांत पीछे मुड़ा, "भई—डिनर आ गया। खत्म करो पीना-पिलाना—डिनर छको...और भागो। स्साला, सुबह से ही सिर दर्द कर रहा है।"

"तू लेट जा— दबा देता हूँ," कमल गुप्त बोला।

"चढ़ गयी होगी," अरोड़ा था।

"इसीलिए कहता था कि भाभी से झगड़ा मत करो...होतीं तो कितनी राहत मिलती," पुनीत बग्गा सदैव उसकी दुखती रग पर उंगली रख देता था।

"नाम मत लो बग्गा उसका...मेरी....सुलगने लगती है।"

बग्गा ही नहीं दूसरे भी सहम गए।

"सॉरी विक्रांत।" बग्गा ने उठकर उसे छाती से लगा लिया।

"छोड़...चल डिनर ले— ये जल्लाद स्साले इतनी देर से लेकर आए हैं...चलो—शुरू करें," और उसने स्मृति को आवाज़ दी, "बेटा स्मृति...किचन से प्लेटें लेकर तू भी आ जा खाने के लिए।"

"मैं फ्रेण्ड के साथ खाकर आयी हूँ पापा…। आप खुद ही प्लेटें ले लें।"

भुनभुनाता हुआ वह प्लेटें लेने के लिए किचन में घुस गया था।

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