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03.02.2008
 

विद्यार्थी व्यथा
रोली त्रिपाठी


चैन से रहते
खाते पीते
न किताबें होतीं
न एग्जाम होते

शिक्षकों की फटकार
प्रधानाचार्य का दुलार
भुला कर सोते
न किताबें होतीं
न एग्जाम होते

फूलों के साथ
काँटे रहेंगे
ये एग्जाम हमें
यूँ ही सताते रहेंगे

हम हमेशा हँसते
कभी न रोते
न किताबें होतीं
न एग्जाम होते


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