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03.02.2008
 

समुद्र मंथन
रोली त्रिपाठी


एक दिन हृदय में आया
समुद्र मंथन का खयाल
तो मैं गयी सागर के पास
पूछने उसका हालचाल
शांत, गंभीर मौन था सागर
समेटे बहुत कुछ भीतर
मेरी जिज्ञासा देख
सागर थोड़ा मुस्काया
अपने भीतर चल रहे
अंतर्द्वन्द्व से अवगत कराया

यादों की परत खोलते
सागर बोला
कभी सोचता हूँ
पुराने समय को
तो कलेजा
मुँह तक आ जाता है
और मेरा उत्साह
ठण्डा हो जाता है
मंथन के समय की पीड़ा
नहीं अपना एहसास जता पाती है
जब वर्तमान दौर के भ्रष्टाचार
और राजनीति की बात आती है
कभी कभी मैं अपने मन को
आशावान बना लेता हूँ
निराशा से तब मैं अपने दामन
को बचा लेता हूँ
उन्मुक्त हो उत्साह से
लेता हूँ ऊँची हिलोरें
जगा देना चाहता हूँ
सभी के जमीर को
एक एक गरीब को
हजारों अमीर को
तब सब मुझे तूफान मान लेते हैं
मेरे उत्साह की हिलोरों को
बर्बादी का कारण
जान लेते हैं
यह सब देख
पुन: हो जाता हूँ मौन
अब समझ नहीं आता
कितना दोषी कौन
मैं जो सोये हुए को
जगा नहीं पा रहा
या वो जो जागकर भी
जागना नहीं चाह रहा


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