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ISSN 2292-9754

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08.04.2014


काश तुम फिर आती

काश! तुम फिर आती....।
सर्दियों की धूप सी छिपती छुपाती झिलमिलाती
काश! तुम फिर आती....।

आ रही है देखो फिर आहट तुम्हारी
पर्वतों की तल्खियों से सरसराती
दरख्तों की शाख से कुछ गुनगुनाती
काश! तुम फिर आती....।

पहली बारिश की बूँदें
गीली मिट्टी की सौंध
और तुम्हारे हाथों से
ताज़ी मेंहदी की ख़ुशबू
साथ तुम्हारे फिर से आती
कोयल फिर से गाती
काश! तुम फिर आती....।

जाड़े की ठण्डी रातें
कोहरे की चादर ओढ़े
बूढ़ी गण्डक की कल-कल
दूर कहीं से छन कर आती
हरसिंगार के पेड़ों पर बुलबुल फिर से गीत सुनाती
काश! तुम फिर आती....।

तुम नहीं हो साथ लेकिन शेष है
स्मृति तम्हारी वादियों में
मुस्कुराना, खिलखिलाना, गुनगुनाना
और मेरे साथ हैं बातें तुम्हारी
कुछ हॅंसाती कुछ रुलाती
काश! तुम फिर आती....।


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