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ISSN 2292-9754

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05.31.2016


वीरगति

अभिमन्यु की तरह
चक्रव्यूह में घुस तो
सकती है औरत
पर निकल नहीं सकती।
वह परिस्थितियों से
लड़ती है जी-जान से
फिर उस गोल से व्यूह में
तोड़ देती है दम
उसे अस्त्र-शस्त्रों से
नहीं रोका जाता
और न ही
वह बनाती है इन्हें
लड़ने का औजार
बस मूक शस्त्रों की
होती है लड़ाई
और
एक मूक सी गति
जिसे कहा नहीं जाता
वीरगति


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