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ISSN 2292-9754

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05.31.2016


उसका दुख

उसका दुख बड़ा था
पर वह छोटी थी।
उसकी अवस्था छोटी थी
पर अनुभव बड़े थे।

उसकी देह छोटी थी
पर उसकी पीड़ा,
उसकी खरोंच बड़ी थी।

वह ओढ़ चुकी थी उदासी
पर रिसता था
मन धीरे-धीरे

लोगों की निगाहें
तलवार थी

पर वह निरपराध थी।
घर बुनने लगा था सन्नाटा
माँ, की बन गयी थी
थी वह परिधि
बार-बार पास आकर
माँ ठिठक जाती
फिर आँखों के
कोरों पर रख उँगली
चुपके-से सरक जाती

पिता अदालत की
करने लगे थे परिक्रमा
माथे पर रख हाथ
जमा लेते दीवार पर
बर्फ-सी दृष्टि

उसका दुख बड़ा था
जो होते-होते और बड़ा
पा गया था विस्तार
माँ की पसीजी आँखों में
पिता की माथे की गहराइयों में।


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