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ISSN 2292-9754

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05.31.2016


माँ और बच्चा

सपने मुट्ठी में भरकर
बच्चा
धीमे-से माँ के पास
सरक आया
बंद मुट्ठी को रखकर
सामने वह माँ के बोला

माँ
मैं लेकर आया हूँ
तेरे लिए ढेर-सारे सपने

माँ हँसी, फिर बोली,
इस नन्ही मुट्ठी में
भला कैसे आ सकते हैं?
ढेर-सारे सपने,

बच्चा भरकर विश्वास से बोला
आ नहीं सकते क्यों?
माँ मेरी मुट्ठी में सपने
आप नहीं देखती तो क्या?
मैंने देखे रात में सपने,
और, आज सुबह भरकर
मुट्ठी में अपनी तेरे लिए
ले आया हूँ।

माँ आश्चर्य-से बोली
बता, कौन-से सपने भर
लाया है मुट्ठी में तू अपने

बच्चा धीरे-से बोला
माँ तुझे अक्सर मैं
रोते हुए हूँ देखता
सारा दिन काम करते
दौड़ते-भागते हूँ देखता
पापा नहीं हैं तो क्या?
मैं आज वो सारे सपने
भर मुट्ठी में ले आया हूँ,
जो तू कभी देखती थी
पापा के साथ मिल बैठकर
पापा तो चले गए
सीमा पर लड़ने
वो लौटकर नहीं आए
तो क्या?
माँ, मैं तेरे लिए वही
पुराने सपने ले आया हूँ।


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