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09.20.2008
 

क्यों नहीं...
डॉ. ऋतु पल्लवी


नीला आकाश, सुनहरी धूप, हरे खेत
पीले पत्ते ही क्यों उपमान बनते हैं !

कभी बेरंग रेगिस्तान में क्यों
गुलाबी फूलों की बात नहीं होती ?

रूप की रोशनी, तारों की रिमझिम,
फूलों की शबनमी को ही क्यों सराहते हैं लोग!

कभी अनमनी अमावस की रात में क्यों
चाँद की चाँदनी नहीं सजती ?

नेताओं के नारे, पत्रकारों के व्यक्तव्य
कवि के भवितव्य ही क्यों सजते हैं अखबारों में!

कभी आम आदमी की संवेदना का सम्पादन
क्यों नहीं छपता इन प्रसारों में ?

मैं तुम्हें प्रेम भरी पाती, संवेदनशील कविता, सन्देश, आवेश
या आक्रोश कुछ भी न भेजूँ!

फिर भी मुखरित हो जाए मेरी हर बात
कभी क्यों नहीं होता ऐसा शब्दों पर, मौन का आघात..?


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