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09.20.2008
 

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना 
डॉ. ऋतु पल्लवी


कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है।

पावस के पीले पत्तों को स्वर्ण रंग दे
हार बना निज स्वप्न वर्ण दे
वासंती सा मोह जगाना, मन को भाता है।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है।

व्यर्थ जूही-दल, मिथ्य वृन्द-कमल
केवल भरमाने को प्रस्तुत रंग-परिमल
इससे तो सुदूर विपिन में गिरे पलाश का मान बढ़ाना, मन को भाता है।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है।

गर्मी के आतप से जलती जेठ-दुपहर में
एक-एक कर तिनका चुनते, नन्हें से पंछी के संग में
छोटा सा एक नीड़ बनाना, मन को भाता है।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है।

हैं असीम आशाएँ सबकी, सतरंगी सुख-स्वप्न सभी के
मनुज चाहता स्वार्थ सिद्धि हित, सारे मुक्तक भाग्य निधि के
इससे तो निस्पृह बच्चे की निश्छल इच्छा बन जाना, मन को भाता है।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है।

जुड़े कई निश्चित से बंधन इस जीवन में
कई हैं अपने रिश्ता-नाते, जग प्रांगण में
किन्तु किसी अंजान पथिक को अपना कहकर स्वयं मिट जाना, मन को भाता है।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है।


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