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09.20.2008
 

बंध
डॉ. ऋतु पल्लवी


बंधन बाँधते नहीं और बिखेरते ही हैं
अपनी हर कड़ी में व्यथा को और उकेरते ही हैं।
तुम हाथ से हाथ को बाँधते हो
उसमें छिपी सृजनता को नहीं सींचते
निर्निमेष दृष्टि के अथाह होना चाहते हो
पर अन्धकार से भय है,
यह हृदय पर कैसी विजय है?

मन का मान कहाँ है ?
कभी मही पर, कभी मेघ में
निर्विवेक -कोई स्थान कहाँ है ?
जो बाहर की स्थिरता में सध गया
संधान गति की तरलता का पा गया
पर अतलता की उसे कहाँ कुछ टोह
जड़ का इतना मोह, चेतना से बिछोह !

बाँध लाए थे तुम एक फूलों का गुच्छा
तब से नित्य देखती हूँ-
गुलदान की ऊँची प्राचीरों में
काँच की दीवारों में,
गलते-सूखते-घुटते गुलाब को
और चकित होती हूँ !
किसी की व्यथा से पगे उद्‌गार
कैसे हो सकते हैं मुझे उपहार ?

नेह बंधन कब हैं ?
वह तो मेह है-कूल है
जो केवल किनारे पर खड़ा रहता है
और अपनी लहर को तड़ाग नहीं
विपथगा होने देना चाहता है- होने देता है।

दुष्कर - एक क्षण को ही सही
मैं सहज स्फूर्ति वरदान होना चाहती हूँ
नित्य का अभिशाप नहीं
मैं बंध कर क्या कह सकूँगी
स्वत्व को खोकर कितनी सत्व रहूँगी ?

कभी देखा है ग्रीष्म से उतप्त पवन को
बंध किवाड़ों में, झरोखों में ढकेलकर
उमस होकर क्लेद बन जाते -बह जाते हुए
जो निःसंग, निर्वाक, निर्विरोध
संध्या तक बहती तो संभवतः
प्रशांत हो भी जाती !


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