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11.19.2007
 

मन के हाइकु
ऋषिकेश खोड़के 'रूह'


सोचा बहुत,
निर्विचार ही रहा
उदास मन ।

हवा से तेज,
दौड़ा मन पखेरु,
स्थिर ही रहा ।

अक्षर झरे,
विलोपे रूप सारे,
रहा तो मन ।

रुके ना मन,
जल थल आकाश,
सहसा चले ।

सहस्त्रधार,
काया एक अनेक,
एक ही मन ।


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