मन के हाइकु ऋषिकेश खोड़के 'रूह'
सोचा बहुत, निर्विचार ही रहा उदास मन ।
हवा से तेज, दौड़ा मन पखेरु, स्थिर ही रहा ।
अक्षर झरे, विलोपे रूप सारे, रहा तो मन ।
रुके ना मन, जल थल आकाश, सहसा चले ।
सहस्त्रधार, काया एक अनेक, एक ही मन ।