अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
12.09.2007
 

"हाँ ! मैं तन बेचती हूँ, तो क्या ?"
ऋषिकेश खोड़के 'रूह'


"हाँ ! मैं तन बेचती हूँ, तो क्या ?"

मैं तन बेचती हूँ !
हाँ ! मैं तन बेचती हूँ, तो क्या ?

इस मंडी मे डाल गया था कोई अपना ही,
कच्ची कली ही थी तब मै,
मुझे तो था कुछ भी पता नहीं।

उम्रभर का ग्रहण,
मेरे जीवन पर लगा गया,
रातों को किसी की करने रोशन।

कई दिन और रातें भुखी ही काटी थी,
बेल्ट,लात और मुक्कों से थर्थराई थी,
आखिरकार जोर-जबरदस्ती से नथ किसी ने उतरवाई थी।

अब रोज़ कोई ना कोई जानवर,
नोचता है, खसोटता है जिस्म मेरा,
मर्द साले सब आदमखोर।

क्यो नहीं पूछते इनसे,
जिन्होंने अपन ज़मीर बेच डाला,
मैं तन बेचती हूँ, तो क्या?


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें