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01.28.2009
 

पछतावा 
ऋषि कुमार शर्मा 'पंडित'


उसका नाम था सिद्धांत। परिवार के आँखों का तारा। पैदा हुआ था चाँदी का चम्मच मुँह में लेकर। सिद्धांत मगर सिद्धांत से कोसों दूर। न कोई समय था खाने का, न ही सोने का। याद रहता था तो सि‍र्फ़ कार्टून नैट वर्क का समय। दिन भर टी.वी. से चिपका रहता था।

 देखते ही देखते सिद्धांत अब स्कूल जाने लगा था। उसकी दोनों बड़ी बहनें बड़े ही लाड़प्यार से अपने छोटे भैया को स्कूल जाने के लिए तैयार करती थी, मगर छोटे नवाब को स्कूल जाना किसी सजा से कम नहीं लगता था। छुटकी तो यदाकदा उसको दोचार लगा भी देती थी। करेकोई, भरे कोई। छुटकी को भी विद्यालय विलंब से पँहुचने के कारण कक्षाअध्यापक की डाँट तथा यदाकदा दण्ड भी भोगना पड़ता था। घर पहुँच कर वह अपनी खीज अपनी माँ पर उतारती थी। बड़की थी चालाक, वह मौका देखकर पहले ही विद्यालय निकल जाती थी।

 सिद्धांत जिसे सभी परिवार के सदस्य मनु के नाम से पुकारा करते थे, और यह नया नामकरण किया था परिवार के मुखिया यानी सिद्धांत के दादाजी ने। मनु की धमाचौकड़ी से यद्यपि दादाजी भी कम पीड़ित नहीं थे मगर करें भी तो क्या करें। दादापोते दोनों अपने आदत से लाचार। मनु जानबूझकर प्राय: ऐसी शरारतें किया करता जो कि दादाजी को नागवार गुज़रती। मसलन कभी उनकी छड़ी छिपा देता तो कभी उनका चश्मा। मनु का विद्यालय में हालचाल जानने प्राय: दादाजी ही जाया करते है, जो कि उसे हमेशा नागवार गुज़रता। दादा जी से तो कुछ कह नहीं सकता था मगर अपनी माँ से लड़झगड़कर अपने दिल के गुबार निकालता। दादा जी को जब पता चलता तो वे उसे प्यार से समझाने का प्रयास करते। जितना वे उसे समझाने की कोशिश करते उतना ही मनु को अपने दादा जी को खिजाने मे आनंद मिलता।

 ऐसा शायद ही कोई दिन हो जिस दिन दादापोते में नोकझोंक न हो। समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था और अब मनु आ पहुँचा था कक्षा छह में। मगर मनु तो मनु ही था। विद्यालय समय से पहुँचना उसकी शान के ख़िलाफ़ था। जब उसके पापा 15 दिन के लिए अपनी ड्यूटी पर जाते तो वह 15 दिन मनु का स्वर्णिमकाल हुआ करता।

 विद्यालय मे अनुपस्थित प्राय: मनु इन्हीं 15 दिनों में ही रहता। बाबा यानी दादा जी उससे विद्यालय  न जाने का कारण पूछते तो कभी पेट दर्द, या फिर सिर दर्द। कक्षा में मिलने वाले गृहकार्य को पूरा कराना दायित्व था छुटकी का। यद्यपि इसके कारण उसकी अपनी मम्मी से भी तकरार हो जाती थी। क्योंकि छोटे नवाब के कारण उसका अपना गृहकार्य पूरा नहीं हो पाता था।

 विद्यालय मे अनुपस्थित रहने के कारण मनु की कक्षा में उपस्थितदिवसों की संख्या घटती जा रही थी। कक्षाध्यापक भी न सि‍र्फ़ मौखिक रूप से बल्कि लिखित में भी इसकी चेतावनी दे चुके थे। सत्र का अंतिम कार्यदिवस था। एक बार पुन: कक्षाअध्यापक ने सिद्धांत को बुलाकर बड़े प्यार से समझाया,  देखो पूरे साल तो तुमने मेरी बात को अनसुना किया, अब किसी तरह तुम परीक्षा मे बैठने जा रहे हो। परीक्षाकाल मे समय से पहुँचना नहीं तो ................। नहीं तो क्या सिद्धांत  ने पूछा यही कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता और बीता हुआ समय कभी वापिस नहीं आता।

 घर पहुँच मनु ने बस्ता कोने मे रख जा पहुँचा टी. वी. के पास। पिछले कुछ दिनों से एक परिवर्तन छुटकी व बड़की दोनों ही मनु मे देख रही थीं कि अब वह कार्टून की अपक्षा भविष्यवाणी, आपका दिन, आदि इसी तरह के कार्यक्रम बड़े गौर से देख रहा था। रिमोट के पीछे प्राय: भाईबहिनों मे गुत्थमगुत्था हुआ करती।

 आखिर परीक्षा का समय आ ही गया। कल से विद्यालय की वार्षिक परीक्षा प्रारंभ होने वाली थी। छुटकी एवं बड़की दोनों ही परीक्षा से पूर्व की तैयारी में लगी थीं। जहाँ छुटकी कल होने वाली परीक्षा के विषय की पुनरावृत्ति मे लगी थी तो बड़की अपनी साइकिल, राइटिंग पैड, पेन इत्यादि को लेकर चिंतित थी। मगर मनु आज भी व्यस्त था। भविष्यवाणी, राशिफल एवं शुभअशुभ जैसे टी.वी. कार्यक्रम देखने मे उसे कल की कोई चिंता नहीं थीं। आखिर जब छुटकी  से नहीं रहा गया तो उसने टी.वी. बंद कर ही दिया और लगी मनु को हड़काने। चुपचाप कल की तैयारी कर। परीक्षा की याद आते ही न जाने मनु सोते से जागा। दौड़ादौड़ा अपनी मम्मी के पास पहुँचा ––‘‘मुझे आसमानी रंग का नया पैन चाहिए तब ही मैं परीक्षा देने जाऊँगा। नहीं तो देख लो।

इतने सारे तेरे पास पेन हैं फिर क्यों नए पेन की जिद कर रहा है।

मैं कुछ नहीं जानता, मुझे आसमानी रंग का पेन चाहिए। क्या तुम नहीं जानती कल कौन सा दिन है! अभी कुछ देर पहले ही टी.वी. में बताया है कि कल मेरी राशि पर आसमानी रंग ही शुभ है, मुझे तो बस ................।

 माँबेटे मे वाक्युद्व बदस्तूर जारी था, तभी इस कोहराम को सुन दादा जी भी वहाँ आ पहुँचे।

क्या बात है बहू ! कैसे कोहराम मचा है!

मनु कल परीक्षा के लिए आसमानी पेन की जिद कर रहा है!

क्यों जिद कर रहा है, क्या तेरे पास पेन नहीं। अच्छा चल मैं तुझे अपना नया पेन देता हूँ।

मुझे नहीं चाहिए, मैं तो आसमानी रंग का पेन लूँगा।

ठीक है, जैसा चाहे तू कर। मै अभी बाजार जाता हूँ । चल अब रात हो गई है। सुबह जल्दी उठकर पढ़ लेना। दादा जी चल दिए पेन की तलाश में।

 

और आखिर वही हुआ जिसका डर था, आज फिर मनु सोकर देरी से उठा। छुटकी एवं बड़की दोनों ने कई बार जगाया मगर उसे तो आदत पड़ चुकी थी देर से उठने की। किसी तरह तैयार होकर बड़ी शान से नया आसमानी पेन शर्ट में लगा, बस स्टाप पर पहुँचा, मगर बस तो जा चुकी थी।

आज फिर वह विद्यालय विलंब से पहुँचा। तब ही उसकी नज़र कक्षाअध्यापक पर पड़ी जो उसे जोरजोर से आवाज़ दे जल्दी कक्षा में पहुँचने को कह रहे थे।

मनु भी दौड़ता हुआ आगे बढ़ा, तभी न जाने कहाँ से एक बिल्ली आकर सामने से रास्ता काट गई। यह देख मनु को तो साँप सूँघ गया। वह जहाँ का तहाँ खड़ा हो गया। उसको इस तरह खड़ा देख, कक्षाअध्यापक उसके पास पहुँचे और उससे कक्षा में न जाने का कारण पूछा ..... सर .. क्या सर लगा रखी है! पूरी  बात मनु से सुन कक्षाध्यापक ने कहा, “ ठीक है, मैं पहले चलता हूँ तुम मेरे पीछे आओ।

किसी तरह गिरतापड़ता मनु अपनी कक्षा मे पहुँचा। मगर इस सब मे वह 45 मिनट लेट हो चुका था। परीक्षा भी आज गणित की थी। पूरा प्रश्नपत्र पढ़कर उसने लिखना प्रारंभ कर दिया था। उसे अपने आसमानी पेन पर पूरा विश्वास था। मगर यह क्या अचानक उसका पेन चलतेचलते रुक गया। उसने भरसक प्रयास किया, मगर लगता था कि आसमानी पेन मनु के साथ विश्वासघात कर चुका था। समय तेजी से आगे बढ़ रहा था। मनु की समझ में नहीं आ रहा था क्या करे क्या न करे !

तभी उसे अपनी नेकर की जेब मे कुछ चुभन का एहसास हुआ। उसने जेब मे हाथ डाला तो उसका पुराना पेन उसके हाथ में आ गया। पेन को बाहर निकाल उसने कार्य प्रारंभ किया। उसे अब अपने दादा जी की बात याद आ रही थी - “Old is Gold. Do not forget my child.”  और फिर परीक्षा समाप्ति की घटी बज चुकी थी। किसी तरह मनु रोपीट कर कुल 60 प्रतिशत प्रश्नपत्र ही कर पाया था। अब सफल होगा या असफल यह तो परीक्षा परिणाम ही बताएगा।

परीक्षापरिणाम के दिन दादा जी के साथ मनु भी परीक्षापरिणाम लेने विद्यालय पहुँचे। आशा के अनुरूप वह गणित मे अनुत्तीर्ण था। मगर अन्य विषयों में उसके अंकों को देख  उसे पूरक परीक्षा के लिए कहा गया।

सिर झुकाए परीक्षापरिणाम लेकर वह घर पहुँचा। समय का महत्व अब उसकी समझ में आ रहा था। आसमानी पेन का विश्वासघात भी वह देख चुका था। तभी छुटकी ने परीक्षापरिणाम देख, मनु को पुकारा-

मनु आज का राशिफल, भविष्यवाणी नहीं देखेगा!

छुटकी की आवाज सुन दादा जी ने उसे डाँटा। मनु सिर झुकाए दादा जी के पास पहुँचा।

बाबा, अब मैं जान गया हूँ कि  “Old is always Gold. ’’ अब मैं कभी विलंब से विद्यालय नहीं जाऊँगा।

अच्छा तो यह बता, पूरी ईमानदारी से मेहनत कर परीक्षा देगा।

हाँ बाबा।

बेटा, अगर सुबह का भूला अगर शाम को घर वापिस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहा जाता। ईश्वर तुझे कामयाबी दे।

और फिर सिद्धांत ने अपना नया सिद्धांत बना, सफलता के चरण छुए।


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