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| 01.28.2009 |
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पछतावा |
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उसका नाम
था सिद्धांत। परिवार के आँखों का तारा। पैदा हुआ था चाँदी का चम्मच मुँह
में लेकर। सिद्धांत मगर सिद्धांत से कोसों दूर। न कोई समय था खाने का,
न
ही सोने का। याद रहता था तो सिर्फ़ कार्टून नैट वर्क का समय। दिन भर टी.वी.
से चिपका रहता था।
“इतने
सारे तेरे पास पेन हैं फिर क्यों नए पेन की जिद कर रहा है।“
“मैं
कुछ नहीं जानता,
मुझे आसमानी रंग का पेन चाहिए। क्या तुम नहीं जानती कल कौन सा दिन है! अभी
कुछ देर पहले ही टी.वी. में बताया है कि कल मेरी राशि पर आसमानी रंग ही शुभ
है,
मुझे तो बस ................।“
“क्या
बात है बहू ! कैसे कोहराम मचा है!”
“मनु
कल परीक्षा के लिए आसमानी पेन की जिद कर रहा है!”
“क्यों
जिद कर रहा है,
क्या तेरे पास पेन नहीं। अच्छा चल मैं तुझे अपना नया पेन देता हूँ।“
“मुझे
नहीं चाहिए,
मैं तो आसमानी रंग का पेन लूँगा।“
“ठीक
है,
जैसा चाहे तू कर। मै अभी बाजार जाता हूँ । चल अब रात हो गई है। सुबह जल्दी
उठकर पढ़ लेना।“
दादा जी चल दिए पेन की तलाश में।
और आखिर
वही हुआ जिसका डर था,
आज
फिर मनु सोकर देरी से उठा। छुटकी एवं बड़की दोनों ने कई बार जगाया मगर उसे
तो आदत पड़ चुकी थी देर से उठने की। किसी तरह तैयार होकर बड़ी शान से नया
आसमानी पेन शर्ट में लगा,
बस
स्टाप पर पहुँचा,
मगर बस तो जा चुकी थी।
आज फिर वह
विद्यालय विलंब से पहुँचा। तब ही उसकी नज़र कक्षा–अध्यापक
पर पड़ी जो उसे जोर–जोर
से आवाज़ दे जल्दी कक्षा में पहुँचने को कह रहे थे।
मनु भी
दौड़ता हुआ आगे बढ़ा,
तभी न जाने कहाँ से एक बिल्ली आकर सामने से रास्ता काट गई। यह देख मनु को
तो साँप सूँघ गया। वह जहाँ का तहाँ खड़ा हो गया। उसको इस तरह खड़ा देख,
कक्षा–अध्यापक
उसके पास पहुँचे और उससे कक्षा में न जाने का कारण पूछा .....
“सर
.. क्या सर लगा रखी है!”
पूरी बात मनु से सुन
कक्षाध्यापक ने कहा,
“
ठीक है,
मैं पहले चलता हूँ तुम मेरे पीछे आओ।“
किसी तरह
गिरता–पड़ता
मनु अपनी कक्षा मे पहुँचा। मगर इस सब मे वह 45 मिनट लेट हो चुका था।
परीक्षा भी आज गणित की थी। पूरा प्रश्न–पत्र
पढ़कर उसने लिखना प्रारंभ कर दिया था। उसे अपने आसमानी पेन पर पूरा विश्वास
था। मगर यह क्या अचानक उसका पेन चलते–चलते
रुक गया। उसने भरसक प्रयास किया,
मगर लगता था कि आसमानी पेन मनु के साथ विश्वासघात कर चुका था। समय तेजी से
आगे बढ़ रहा था। मनु की समझ में नहीं आ रहा था क्या करे
–
क्या न
करे !
तभी उसे
अपनी नेकर की जेब मे कुछ चुभन का एहसास हुआ। उसने जेब मे हाथ डाला तो उसका
पुराना पेन उसके हाथ में आ गया। पेन को बाहर निकाल उसने कार्य प्रारंभ
किया। उसे अब अपने दादा जी की बात याद आ रही थी -
“Old is
Gold. Do not forget my child.”
और फिर
परीक्षा समाप्ति की घटी बज चुकी थी। किसी तरह मनु रो–पीट
कर कुल 60 प्रतिशत प्रश्न–पत्र
ही कर पाया था। अब सफल होगा या असफल यह तो परीक्षा परिणाम ही बताएगा।
परीक्षा–परिणाम
के दिन दादा जी के साथ मनु भी परीक्षा–परिणाम
लेने विद्यालय पहुँचे। आशा के अनुरूप वह गणित मे अनुत्तीर्ण था। मगर अन्य
विषयों में उसके अंकों को देख
उसे पूरक परीक्षा के लिए कहा गया।
सिर झुकाए
परीक्षा–परिणाम
लेकर वह घर पहुँचा। समय का महत्व अब उसकी समझ में आ रहा था। आसमानी पेन का
विश्वासघात भी वह देख चुका था। तभी छुटकी ने परीक्षा–परिणाम
देख,
मनु को पुकारा-
“मनु
आज का राशिफल,
भविष्यवाणी नहीं देखेगा!”
छुटकी की
आवाज सुन दादा जी ने उसे डाँटा। मनु सिर झुकाए दादा जी के पास पहुँचा।
“बाबा,
अब
मैं जान गया हूँ कि
“Old is
always Gold. ’’
अब मैं
कभी विलंब से विद्यालय नहीं जाऊँगा।“
“अच्छा
तो यह बता,
पूरी ईमानदारी से मेहनत कर परीक्षा देगा।“
“हाँ
बाबा।“
“बेटा,
अगर सुबह का भूला अगर शाम को घर वापिस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहा जाता।
ईश्वर तुझे कामयाबी दे।“ और फिर सिद्धांत ने अपना नया सिद्धांत बना, सफलता के चरण छुए। |
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