अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.08.2016


शिक्षा

बचपन में मैं हमेशा सोचता था, कि इन बड़े लोगों और अंकल लोगों के पास, "बेटा क्या नाम है तुम्हारा? कौन सी क्लास में पढ़ते हो? कौन से स्कूल में पढ़ते हो? पोएम सुनाओ अंकल को" के अलावा कोई सवाल नहीं होते क्या? और तो और, फिर वो सवाल भी पूछने लगते थे, पता नहीं मेरा ज्ञान चेक करते थे या अपना कन्फ्यूज़न दूर करना चाहते थे। अरे भाई, टाइमपास के और भी तरीक़े हैं, ये नहीं कि बेचारे बच्चे की क्लास ही ले ली। मन ही मन हज़ार गाली देने का मन करता था सबको। पर वक़्त के साथ पता ही नहीं चला कि कब हम दूसरी साइड आ गये।

ये एक कन्फ्यूज़्ड उम्र है, जब पता नहीं होता कि रिश्तेदारों के घर से वापस आते वक़्त पैसे लेने हैं या देने हैं? न बचपन बचा, न बड़े हुए। पर एक दिन जब ट्रेन में सामने वाली सीट पे अपनी माँ के साथ बैठे हुए आठ साल के बच्चे से वही घटिया सवाल पूछने लगे, तो पता चला कि सीधे बूढ़े ही हो गये और वो भी खूसट वाले बुढ्ढे। मैंने ख़ुद को कहते हुए सुना, "और बेटा, कौन सी क्लास में पढ़ते हो?"

"क्लास तीन में।"

"गुड, अच्छा पाँ एनिमल्स के नाम बताओ," उस वक़्त उस बच्चे के लिए सबसे खूंखार एनिमल मैं ही रहा होऊँगा। पर उसने बोला, "टाइगर, शीप, एलीफैंट, कैमल, रैबिट..."

उसके सारे जवाब ताबड़तोड़ अंग्रेज़ी में थे, वो भी धड़ाधड़ तेज़ी से। सुन के कुछ सा बुरा लगा, ख़ुद की इंग्लिश उससे भी बुरी थी। और तो और वो हिंदी, इंग्लिश, तेलगु तीन भाषाएँ बोल और समझ सकता था, और हम दो से ही जूझ रहे थे।

तुरन्त अगला सवाल दाग़ दिया, "अच्छा बेटा, पाँच बर्ड्स के नाम बताओ।"

"वल्चर, ऑस्ट्रिच, पेंगुइन, पीकॉक...एंड...," और एक पे वो अटक गया।

वल्चर सुन के झटका सा लगा। वल्चर तो हमारी पीढ़ी, उस बच्चे के जन्म से पहले ही ख़त्म कर चुके थे। मुझे याद है कि बचपन में, गाँव में, किसी जानवर के मरने पे उसे एक जगह फेंक दिया जाता था, जहाँ गिद्धों के झुण्ड के झुण्ड मँडराते रहते थे और हम सब उस रास्ते से गुज़रने से डरते थे। फिर कुछ सालों बाद, करीब 10-15 साल पहले से जानवरों की लाशें लावारिस पड़ी नज़र आने लगीं। गिद्ध गायब हो चुके थे।

मैंने पूछा, "तुम ने इनमें से किसी जानवर या बर्ड को देखा है?"

उसने सोचा...थोड़ा और सोचा.... फिर उसकी मम्मी ने उसे याद दिलाया कि उन्होंने एलीफैंट देखा था ज़ू में। उसकी आँखे चमक उठीं। फिर उसकी गर्वित माँ ने बताया कि वो हमेशा क्लास में फर्स्ट आता है, पिछली क्लास में उसके 96% मार्क्स थे। और उसके इंग्लिश मीडियम स्कूल में सब अंग्रेज़ी में ही बात करते हैं।

अगले स्टेशन पे वो लोग उतर गए थे, पर मुझे छोड़ गये थे, कई सवालों के साथ। सवाल ये है कि आजकल के एजुकेशन सिस्टम और असल ज़िंदगी में कितना समन्वय है? क्या ये पढ़ाई वाकई सार्थक है? क्या नंबरों से आगे कुछ भी नहीं है, असल ज़िंदगी भी नहीं? अपने बचपन में मैं जानवरों के नाम पे, हिंदी में ही, कुत्ता, बिल्ली, बकरी, भैंस, गाय, सूअर ही बताया करता था और चिड़ियों में भी कबूतर, कौवा, गौरया, नीलकंठ, तोता, मैना तक ही हमारी पहुँच थी।

हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या पढ़ा रहे हैं? क्या बनाना चाह रहे हैं? कोई अजीब बात नहीं होगी, अगर कुछ वर्षों बाद, कोई बच्चा जानवरों में यूनिकॉर्न, यती, मरमेड भी बोलने लगे, क्योंकि असल ज़िंदगी में उन्हें न टाइगर से मतलब है, न पीकॉक से और ना ही यूनिकॉर्न से। उनके लिए सभी स्ट्रिंग थ्योरी की तरह सिर्फ किताबी और थ्योरी ही हैं, जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा।

नम्बरों, डिग्री, कॉलेज, जॉब, बड़ी सैलरी की चमक-दमक की इस भागमभाग और अंधी दौड़ में कहीं हम ख़ुद से ही तो पीछे नहीं छूट जा रहे हैं, और ये दौड़ कहीं ख़त्म भी होगी या यूँ ही निरंतर चलती रहेगी, और हम इंसान से सिर्फ रटे-रटाये, किताबी रोबोट ही बनते रहेंगे।

 जोक याद गया, पहले सुना था कभी। एक गाँव में उच्च-शिक्षित, फॉरेन-रिटर्न, पीएचडी वाले कृषि-वैज्ञानिकों का एक दल गाँववालों को कृषि एवं पेड़-पौधों के बारे में जागरूक करने के लिए पहुँचता है। सारे गाँव वाले उनके आस-पास घेरा लगा लेते हैं और उनके पीछे-पीछे चलने लगते हैं, मुखिया एकदम हाथ जोड़े हर हुक्म बजाने को तैयार। एक पेड़ के पास जाके वैज्ञानिक-प्रमुख बोलता है, "इस पेड़ को देख रहे हो न, अगर इस का वैज्ञानिक ढंग से रख रखाव करो, समय पे खाद-पानी दो, तकनीकी का इस्तेमाल करो, तो इसमें इससे जितने आम आते हैं, उससे दो-गुने आम आ सकते हैं।" ऐसा कह के वो गर्व से सभी की और देखता है, सभी वैज्ञानिक सहमति प्रकट करते हैं, गाँव वाले मूक हो के अचरज से सुनते हैं। एक किसान काफ़ी परेशान सा इधर-उधर, सबकी तरफ़ देख के सर खुजाने लगता है। वैज्ञानिक-प्रमुख उससे पूछता है, "कोई डाउट है, कुछ समझ नहीं आया क्या?" तो वो किसान हाथ जोड़ के बोलता है, "थोड़ा बहुत समझे साहब, छोटी बुद्धि, बस एक प्रश्न है कि ये नीम के पेड़ में आम कैसे आयेंगे?"


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें