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ISSN 2292-9754

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05.15.2016


लव ऐट सिक्स्टी नाईन आईएनआर
(लव@69INR)

पूरे आधे घंटे तक स्टेशन के दो चक्कर लगाने के बाद यह तय हो गया कि ट्रेन का 2 घंटे के सफ़र आँखों को श्रृंगार रस की कोई प्रतिमा की बजाय वीभत्स रस की केमिकल इंजीनियरिंग की बोरिंग इक्युएशन्ज़ देखनी पड़ेंगी। ट्रेन आने के बाद अक्कड़-बक्कड़ कर के एक डिब्बे में चढ़ गया.....आह! ट्रेन में "जेंडर रेशो" देख के फ़ील हुआ कि देश को "कन्या बचाओ" पे और अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है, "टाइगर" तो हम बाद में भी बचा सकते हैं। फ़ाइनली एक लड़की दिखी। यार कहीं देखा है इसे पहले भी…! वैसे तो मुझे हमेशा ही ये फ़ीलिंग होती थी, पर आज कुछ ज़्यादा थी। कहाँ की हो सकती है? कोचिंग, कॉलेज, स्कूल या ऐसे ही अड़ोस-पड़ोस के गली-मोहल्ले की? कुछ भी हो, पर मन में गिटार बजने शुरू हो गये थे। पर ट्रेन को कैसे पता हो कि आज मेरा स्पेशल डे है, वो तो उतनी ही भरी थी, हमेशा की तरह, लबालब ऊपर तक। पर जहाँ चाह वहाँ राह और फिर इच्छा-शक्ति की अद्भुत मिसाल पेश करते हुए मैं उसकी सीट के पास तक पहुँच ही गया। दोनों सीट्स पे क़रीब आठ-आठ लोग बैठे थे, बैठने की कोई गुंजाईश नहीं दिख रही थी। फ़ाइनली काफ़ी कैलकुलेशन के बाद सम्भावना ने कॉलेज के नाम पे चांस लेने को "सजेस्ट" किया। चेहरे के "एक्सप्रेशन्ज़" सड़क छाप से "स्कॉलर मोड" में सेट किये और भारी आवाज़ में पूछा, "एचबीटीआई?"

"हाँ!"

"फ़र्स्ट ईयर?"

"यस… यस सर.."

"ब्राँच?"

"सर...बायोकेमिकल इंजीनियरिंग।"

ओह.. तभी जानी-पहचानी लग रही है। पर ये मुझे सीनियर समझ रही है। अच्छा है। फिर मौक़े का फ़ायदा लेते हुए नाम, पता भी पूछ डाला...। ट्रेन में सभी खड़े होने की जगह के लिए जद्दोजहद में लगे थे और कुछ लक्की लोग जो बैठे थे, ऊँघ रहे थे। पर एक बुढ्ढा बार-बार हमारी बातों में इंटरेस्ट लेने की कोशिश कर रहा था। ...साले खूसट बुढ्ढे तुम्हारे दिन गये.... अडवाणी मत बनो... और फिर "एक्सक्यूज़ मी" कहते हुए, मैं भी उस लड़की और बुड्ढे के बीच में एडजस्ट हो गया।
"और तुम्हारी हॉबीज़ क्या हैं?"

किसी भी जूनियर के लिए सबसे ख़तरनाक सवाल यही होता है, बड़े-बड़े गायक, वादक, डांसर, खिलाडी भी सीनियर के इस सवाल पर अपनी हॉबी बदल कर सोना, कंचे खेलना, पतंग उड़ाना इत्यादि कर लेते हैं, और बहुतों की हॉबी सीनियर्स को ही बनानी पड़ती है। वो घबरा रही थी, और नर्वस हो रही थी। ..तभी पास बैठे बुढ्डे ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, "क्या बात है बेटा? कोई प्रॉब्लम है?"

"कुछ नहीं अंकल, आप अपने काम से काम रखो।"

पर तभी उसे अहसास हुआ कि सवाल मेरे लिए नहीं था।

"कुछ नहीं पापा, बस कॉलेज के सीनियर सर हैं, " जवाब उस लड़की ने दिया था।

शिट!! अबे ये तो इसका बाप है। और अचानक "ज़ॉम्बी" जैसे बैठी हुई जनता एक रैगिंग करने वाले घृणित प्राणी, "सीनियर" पर अपनी अपनी निजी "फ़र्स्टरेशन" मिटाने के लिए उतावली हो उठी।

"ओह्ह! ये तुम्हारे पापा हैं, नमस्ते अंकल... अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था, मैं भी फर्स्ट ईयर में हूँ...ये देखो मेरा आईडी कार्ड।"

और इस तरह से कहानी शुरू हुई। उसका नाम पिंकी था। हमने इधर-उधर की बकवास की। सीनियर्स और टीचर्स की बुराई की। अपनी-अपनी जन्मकुंडली बाँची। स्टेशन पे उतरते समय उसने कहा था, "मैं अगले सोमवार को सुबह छह वाली गाडी से वापस जाऊँगी, " और इसके साथ ही मेरे वापस जाने का टाइम और ट्रेन फिक्स हो गयी। सोमवार का सफ़र भी वैसा ही बीता, पर वापस कॉलेज पहुँचने पे जुड़ाव उतना ही था, जितना सास-बहू टाईप नाटक के दो एपिसोड लगातार देखने के बाद होता है, कहानी कुछ-कुछ समझ आने लगती है।

दो महीने पहले कॉलेज के पहले दिन से मेरे कुछ सपने थे। जैसा कॉलेज देखा था, आमिर खान या सैफ़ अली खान की फ़िल्मों में। जहाँ पढ़ाई छोड़ के सब कुछ होता है। नवोदय के संकुचित विचार वाले माहौल में जहाँ बड़े होने पर भी सोच छोटी रह जाती है, शायद पर फैलाने का मौक़ा नहीं मिला था। इसके बाद जब दो साल की कड़ी तपस्या, जब सारे सपने और सारे अरमान होल्ड पे डाल दिए थे, के बाद भी आईआईटी नसीब नहीं हुआ तो लगा अब मौक़ा है उन्हें पूरे करने का। इसलिए चार साल के लिए "टू-डू लिस्ट" कुछ इस प्रकार बनी थी -

1. एक गर्लफ्रेंड बनाना (कम से कम)

2.कुछ भी बाक़ी न छोड़ना, सब कुछ कर के देख लेना अच्छा और बुरा

3. और थोड़ा बहुत पढ़ाई करना (अगर समय मिला तो)

दूसरे और तीसरे पॉइंट्स के लिए तो अभी बहुत टाइम बाक़ी था, पर लगा कि सिंगल होने का कलंक मिटने का वक़्त अब आ गया था। कॉलेज में और फ़ोन पे कई दिन तक वक़्त और पैसा बर्बाद करने के बाद उसने कहीं घूमने चलने के लिए कहा तो जवाब के लिए सोचना पड़ा। कॉलेज में तो चलो मैक्स। चाय, समोसे, कोल्ड ड्रिंक में निपट जाते हैं और कोई टेंशन भी नहीं....मगर बाहर!! कहाँ? ....जेब खर्च अभी घर से ही मिलता था और वो भी कोई ज़रूरत बताने पे.. एक डायरी बनी हुई थी, जिसमें चाय, समोसे, कॉपी, किताब, पेन-पेंसिल का खर्चा लिखा जाता था। .....आख़िर प्रेम के एक घनघोर पुराने आशिक़ मित्र मनीष से सलाह के बाद पुराने ज़माने की तरह मंदिर में ही शरण लेने की सूझी।

सिंघानिया साहब ने आज से 53 साल पहले जब जेके टैम्पाल बनवाया होगा तो सोचा भी नहीं होगा कि राधा-कृष्ण के इतने भक्त और अनुयायी इसे लवर"स पॉइंट बना लेंगे। मगर ये पूर्ण समर्पण से प्रेम में रमने वाले कृष्ण नहीं हैं, ये वो हैं, जो सिर्फ गोपियों से रासलीला में और उनके कपड़े ग़ायब करने में आनंद पाते हैं। लोग यहाँ पे कई कारणों से आते हैं, बड़े-बूढ़े जॉगिंग करने और पार्क की घास में खोई हुई जवानी ढूँढने, परिवार शादी के लिए लड़का-लड़की ढूँढने, स्कूल-कॉलेज, गली-मोहल्ले के नवजात प्यार ज़माने से दूर एक पनाह ढूँढने, नक़ली प्यार कोना ढूँढने, शातिर लोग पर्स, पैसे और जूते-चप्पल ढूँढने और कुछ भटके हुए लोग पत्थरों में ईश्वर ढूँढने।

कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल के बाहर हमेशा एक गॉर्ड रहती थी, जो साइकिल ख़राब हो जाने पे भी गेट के सामने नहीं रुकने देती थी। मैं उसके लड़कियों की सुरक्षा के अपने कर्तव्य-निर्वाह के समर्पण का कायल था, पर फिर भी एक सवाल रह जाता था, "हू विल गॉर्ड द गॉर्ड।" इसलिए संशोधित योजना के अनुसार हमें कॉलेज के कंपनी बाग़ एंड वाले गेट से रावतपुर और फिर वहाँ से टेम्पल के लिए निकलना था। बाईक चलानी अभी सीखी नहीं थी और डेट का मतलब अभी "दिनांक" और "खजूर" तक ही था।

जब वो कंपनी बाग़ गेट पे पहुँची, तो मुझे अहसास हुआ कि हमने दो ग़लतियाँ कर दी हैं, मैंने साइकिल ला के और उसने अपनी ख़ूबसूरत फ्रेंड ला के। साइकिल पे आगे बिठा के "नायक" के अनिल कपूर बनने का सपना तो वहीँ ख़त्म हो गया। मेरी हीरो-रेंजर, मेरी सबसे बेहतरीन साथी थी, संघर्ष वाले दो सालों से अभी तक और फिर बाद में बीटेक ख़त्म होने तक भी हमारे बीच कोई नहीं आ सका। इसलिए उसके साइकिल की तरफ़ मुँह बिदका देखने से मुझे बड़ी ठेस पहुँची...और मैं साइकिल से ही रावतपुर जाने पे डट गया। मेरा ये निर्णय ग़ुस्से में लिया गया एक इकॉनोमिकल फैसला था, देर से पहुँच कर मैंने छह रूपए बचा लिए थे। आगे का रास्ता रिक्शे से तय करना था, इसलिए ठरकता ने कंजूसी पे विजय पाई। साइकिल स्टेशन के स्टैंड पे लगा के रिक्शे पे बैठ गया। वो दोनों ही मेरे अगल-बगल बैठी थीं, इसलिए 1 किमी. का सफ़र भी जल्दी ख़त्म हो गया और पंद्रह रुपये ज़्यादा नहीं जान पड़े।

मौसम ख़ुशनुमा हो रहा था, मंदिर से आरती की सुरम्य तान सुनाई दे रही थी। मंदिर के बाहर समोसे, आइसक्रीम वाले रंगीन खोमचे सजा रहे थे, एक बेचारा अपंग आदमी भी मेहनत की कमाई खाने के लिए ज़मीन पे स्टाल लगाये बैठा था। छोटे-छोटे बच्चे जोड़ों को आशीर्वाद देते घूम रहे थे।

मंदिर में काफ़ी देर तक इधर-उधर की गपशप की, मंदिर देखा, घूमा और थक के एक जगह बैठ गये। पिंकी की मित्र ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ समझदार भी थी और हमें अकेले के लिए समय देना चाहती थी, पर इस मौसम बेईमान में ये "दिल माँगे मोर" हो रहा था। कॉलेज की, घर की, पढ़ाई की, प्रोफेसर की, फ्रेंड्स की बोरिंग-बोरिंग बातें हँस-हँस के करने के बाद हाथ पकड़ के बैठने के रोमांटिक अहसास के लिए मन व्याकुल हो रहा था। और मेरा हाथ… हमारे हाथों के बीच के एक फुट के सफ़र को इंच-दर-इंच तय कर रहा था।

मैंने ईश्वर से हिम्मत पाने के लिए और अपने इस कृत्य के लिए एडवांस में क्षमा माँगने के लिए मदिर की तरफ़ नज़र उठा के देखा और मुझे तुरन्त सिग्नल मिल गया। मनीष, जिसने मुझे यहाँ आने का सुझाव दिया था, हमारे ही बैच के 4-5 दोस्तों के साथ खड़ा हमारी ही ओर देख रहा था। मेरी वही हालत हो गयी, क्या कहते हैं उसे - हाँ, "काटो तो एनीमिया"। लग रहा था जैसे किसी ने चोरी करते पकड लिया हो रंगे हाथ, चोरी के "माल" के साथ। इससे पहले की वो मुझे देख पाते, मैं तुरंत लपक कर उनके पास पहुँचा।

"और पाण्डेय जी, यहाँ कहाँ?"

"बस ऐसे ही तिवारी भाई, ऐसे ही आ गया था मंदिर घूमने।"

"किसके साथ?"

"बस यार एक फ्रेंड आया था, वो अभी अन्दर गया हुआ है दर्शन करने, उसी के साथ।"

"समझ रहे हैं भाई हम भी, साथ में होता तो उसके साथ न जाते अन्दर।"

"नहीं भाई, मैं उसकी चप्पलों की रखवाली कर रहा हूँ।"

मनीष इस बीच मन ही मन मुस्कुरा रहा था। मैंने उसकी तरफ़ उसी याचना वाली नज़र से देखा जैसे द्रौपदी ने चीरहरण के समय श्री कृष्ण की तरफ़ देखा होगा। उसने कुटिल मुस्कान से साथ फ़िलहाल इस वक़्त के लिए अभयदान दे दिया था, पर कल ये चर्चा का विषय होगा, इसमें कोई शक नहीं था।

"अबे, ये अपनी क्लास की लड़कियाँ हैं न, सही है बे, इन्हीं के साथ आया है क्या?"

"कहाँ, हाँ यार, ये भी आई हैं....पर अपनी ऐसी क़िस्मत कहाँ?"

"हाँ तेरी शक्ल देख के तो तेरी बात पे यक़ीन करना ही पड़ेगा। आईं होंगी कोई मुर्गा फाँस के।"

मुझे अपनी तुषार कपूर जैसी शकल पर पहली बार गर्व हुआ, चेहरा चेरी-ब्लॉसम से पोलिश होने के बाद जैसा चमक उठा। आत्मविश्वास लौट आया। पर अभी भी अपने नए-नए अंकुरित प्यार के बीज को मैं कीड़े लगा मानने को तैयार नहीं था।

"नहीं बे, ये तो सीधी-साधी हैं यार, ये तो क्लास में ज़्यादा बोलती भी नहीं।"

"अबे इससे कुछ नहीं होता। ये जो लम्बी वाली है न, तुम्हारी भाभी हो सकती थी, पर क्या करें, इसका तो पहले ही से चल रहा है, दुबे के साथ, तो हम छोड़ दिए ट्राई मारना। और ये जो दूसरी है, पिंकी, उसको तो मैंने पहले कई बार देखा है, चौबे के साथ मूवी देखते हुए, कमर में हाथ डाले रेव-3 में टहलते हुए.....।"

"अबे नहीं यार, ऐसा नहीं हो सकता, ये तो सबसे सीधी लड़की होगी पूरे बैच में।"

"बेटा, ये देख, 3.2 मेगापिक्सेल का कैमरा है मेरे फ़ोन का, सही है न फ़ोटो। चौबे इसके लिए बहुत सीरियस है, दिल से। पर ये? भगवान जाने...उसका क्या होगा। छोड़ो, तुम अभी बच्चे हो बच्चे..धीरे-धीरे सीख जाओगे, गाँव के स्कूल और शहर के कॉलेज में अंतर!"

"चलो बे, जाने दो, हम लोग मंदिर देख लेते हैं, लेट हो जायेगा नहीं तो,"मनीष बोला।

और वो सब मेरी शांति भंग कर के अपनी शांति पाने मंदिर की तरफ़ चल दिए। मन खट्टा हो चुका था। उनके सुरक्षित दूरी तक जाते ही मैंने पिंकी के पास पहुँच कर अपने अभी अचानक याद आये एक ज़रूरी काम के बारे में बताया और वापस चलने की पेशकश की। और हम मंदिर से बाहर निकल आये।

मौसम में आर्द्रता बढ़ गयी थी, मंदिर के घंटे का कर्कश स्वर परेशान कर रहा था। खोमचे वाले, आइसक्रीम वाले, गोलगप्पे वाले मुस्करा-मुस्कुरा के लोगों को लूट रहे थे। एक अपंग आदमी स्टाल लगा के गुटखा बेच रहा था। छोटे-छोटे बच्चे पैंट खींच के जोड़ी सलामत रहने की दुआ कर-कर के तंग कर रहे थे। इससे पहले कि मैं रिक्शे को रोकता, पिंकी ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा, "आइसक्रीम नहीं खिलाओगे?"

"हाँ, हाँ क्यों नहीं....बिलकुल बिलकुल...ले लो जो भी पसंद हो।"

"तुम अपनी पसंद की कोई भी ले लो..।"

बस यहीं पे प्रॉब्लम आ जाती है, मेरी कोई पसंद नहीं बनी आज तक। गाँव में बरफ़ वाला पों-पों बजाता हुआ आता था और उसके पास सिर्फ़ दो टाइप की आइसक्रीम होती थी, गर्री वाली एक रुपए की और बिना गर्री वाली दो रुपए की सिंपल। चुस्की वाले का भी फंडा सिंपल था। बरफ़ घिस के एक मिट्टी के कुल्हड़ में भरना और फिर बोतलों का रंग-बिरंगा पानी डाल देना। वहाँ तो 10 रुपए में मोहल्ले भर के बच्चों के अच्छे भैया बन जाते हैं। पर यहाँ तो कई सारी वैरायटी थी और यह भी नहीं पता था कि सस्ती वाली कौन सी होती है और अच्छी वाली कौन सी? पर अनुमानतः महँगी वाली अच्छी वाली समझी जाती है और ख़ासकर जब पैसे दूसरे को देने हों।

"तुम बताओ न, तुम्हे क्या पसंद है।"

"भैया, कोई चॉकलेट वाली है?"

"हाँ मैडम, ये देखिये एक तो ये है, 10 रुपए वाली, ये उतनी बढ़िया नहीं होती और… और एक ये है स्पेशल क्रीम वाली।"

"हाँ तो यही दे दीजिये।"

"सना, तुम कौन सी लोगी?" पिंकी ने अपनी फ्रेंड से पूछा।

"नहीं, मैं नहीं खाऊँगी, मुझे ज़ुकाम है।"

"भैया, 2 दे दीजिये, कितना हुआ, 54 रूपये!! अच्छा, ये लीजिये," इससे पहले सना अपना फ़ैसला बदल सके, मैं आइसक्रीम लेके रिक्शे में बैठ चुका था।

"यार कैसी है आइसक्रीम?" थोड़ी देर बाद सना सकुचाते हुए बोली।

"अच्छी है, लो तुम भी लो थोड़ी सी।"

फिर हम सबने 2/3 आइसक्रीम खायी। कैसा लगता है, जब आपके और एक ख़ूबसूरत लड़की के होठों के बीच सिर्फ़ एक आइसक्रीम की दूरी हो!!! रोमांटिक, एक्ज़ॉटिक? पता नहीं, क्योंकि मेरा पूरा दिल और दिमाग़ अपने 54 रुपए के लिए, उस ठेलेवाले को, आइसक्रीम बनाने वाली विदेशी कंपनी को और ख़ुद को गाली दे रहा था। पर कई सालों तक मेरे "सीवी" में "ऐक्स्ट्रा-करिकुलर" में लिखने लायक़ यही एकमात्र उपलब्धि थी। रावतपुर आ के मैंने साइकिल उठाई और उनको उसी रिक्शे पे रवाना कर दिया।

अगले दिन सुबह फिर उसका फ़ोन आया, उसको और उसकी दोस्त को कल साथ अच्छा लगा था और वो सोच रही थी कि मूवी देखने चलते हैं तीनों रेव-3 में। आज? नहीं, आज तो वो थोड़ा बिज़ी है, एक दोस्त के साथ जाना है कहीं। कल चलते हैं, शाम को। नेकी और पूछ-पूछ.मैं तुरंत राज़ी हो गया। मन में गुणा–भाग किया। 3 टिकट- 300/-, रिक्शा 30/-, बस....नहीं-नहीं अगर कुछ खाने का मन किया, लगभग 450/- मान लिया जाए। आरओआई (रिटर्न ऑन इंवेस्टमेंट) तो कुछ ख़ास नहीं था, पर बुरा भी नहीं लग रहा था।

अगला सवाल था, पैसों का, 600 रुपए मिले थे घर से इस बार, बुक ख़रीदने के लिए। 69 रुपए तो कल ही चले गए। घर पे और पैसों के लिए फ़ोन करना था, कोई बहाना सोचना था।

"हेलो, हाँ मम्मी नमस्ते!"

"हाँ बेटा, बोलो कैसे हो?"

"बढ़िया हूँ मम्मी, पैसे चाहिए थे क़रीब 500 रुपए।"

उधर से कुछ देर थोड़ी शांति हो गयी। फिर थोड़ी सी खाँसी की आवाज़। इसी बीच कोई एक मैसेज आया था मेरे मोबाइल पे।

"मम्मी, क्या हुआ? खाँसी हो गयी क्या?"

"नहीं बेटा, बस अभी अरौल से आ रहे हैं, थोड़ा थक गये, गर्मी से आये फिर तुरंत पानी पी लिया, ऐसे ही आ गयी थोड़ी।"

"तो टेम्पो से आना चाहिए न, पैदल आई होगी?"

"अरे दो ही किलोमीटर तो है, और फिर दो रुपए भी बच गए। हाँ, तो कब तक चाहियें तुम्हें पैसे, परसों तक इंतज़ाम हो पायेगा कि और जल्दी तो नहीं चाहियें, बताओ?"

"नहीं इतनी जल्दी नहीं है, "और मैंने फ़ोन काट दिया। मन आत्मग्लानि से भारी हो रहा था। मोबाइल पे मैसेज पड़ा था, चौबे का, "भाई, आज का डिनर रख लेना मेरा, जा रहा हूँ, तेरी भाभी के साथ डेट पे।"

अब नशा धीरे-धीरे उतर रहा था और डायरी में कल के 69/- का हिसाब देना अभी भी बाक़ी था।


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