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ISSN 2292-9754

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01.07.2016


लव एंड शादी.कॉम

"हेलो, गुड इवनिंग सर!"

"गुड इवनिंग!"

"चिंटू शर्माजी बात कर रहे हैं सर?"

"यस.."

"सर, मैं चिंकी बोल रही हूँ, शादी.कॉम से। सर अभी सही टाइम है कॉल करने का?"

"अरे बिलकुल है, मुझे कौन सा स्वेटर बुनना हैं जाकर।"

"सर, आपने शादी.कॉम पर प्रोफ़ाइल बनाई है, तो चिंटू जी कैसे रिस्पांस आ रहे हैं उस पर..?"

फ़ोन से आती हुई मधुर, मगर अधीर आवाज़ अच्छी लग रही थी उसे। आज ऑफ़िस में ज़्यादा काम नहीं था, खाली था वह, नहीं तो अब तक फ़ोन काट चुका होता।

"अच्छे आ रहे हैं, बढ़िया," शून्य में ताकते हुए, पेंसिल नाचते हुए बोला वो।

"वो तो आयेंगे न सर, आपका प्रोफ़ाइल बहुत बढ़िया है। तो सर, बात कर पा रहे हैं उन लोगों से," बहुत ही नपे तुले, रटे-रटाये शब्द मशीन की तरह आ रहे थे फ़ोन के दूसरे छोर से।

"नहीं," यही उम्मीद करती है, किसी भी मैट्रीमोनी वेबसाइट की कर्मचारी, अपने नॉन-पेड कस्टमर से। अगले कुछ मिनट्स पेड-कस्टमर के फ़ायदों और ‘सिर्फ आप’ को दिए जाने वाले बहुत ही सीमित समयावधि के स्पेशल ऑफ़र पे केन्द्रित होते हैं। पर चिंटू थोड़ा होशियार था। वो पहले फोटो और प्रोफ़ाइल पढ़ने के बाद फ़ेसबुक और गूगल के अनंत महासागर से उस प्रोफ़ाइल से रिलेटेड जानकारी ढूँढ निकालता था और फ़ोन नंबर, ईमेल-आईडी, या फ़ेसबुक पे मेसेज ही कर देता था, ऐसा कई बार कर चुका था वह और देख चुका था शादी.कॉम पे और प्रोफ़ाइल में "फोटोशॉप" की हुई पिक्चर और टैग की हुई फोटोज़ में अंतर।

"हाँ, हो जाती है," मन ही मन मुस्कुराते हुए बोला वो।

"हो जाती है, कैसे सर? चौंकने की बारी चिंकी की थी...

"बस, ऐसे ही, अपने सीक्रेट हैं, आप को बता दूँगा तो आप फ़्री अकाउंट से वो फ़ैसिलिटी भी बंद कर देंगी।"

"नहीं सर, पर अगर आप पेड सर्विस लेते हैं तो और अच्छे से बात हो पायेगी आपकी, हम रिक्मैंड करेंगे आपकी प्रोफ़ाइल, हमारे एक्सपर्ट्स की टीम आपको बेस्ट मैच प्रोवाइड कराएगी और प्रोफ़ाइल हाईलाइट भी की जाएगी," बिना रुके अपना पूरा वाक्य ‘यूअर काल मे बी रिकॉर्डेड फ़ॉर फ़र्दर ट्रेनिंग’ के डर से, खीझ को दबाते हुए बोली होगी वो।

"नो थैंक यू, अगर मुझे लगेगा, तो बता दूँगा आपको…..," और इसके साथ ही उसने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया।

काफ़ी दिनों तक झक(?) मराने के बाद चिंटू ने शादी.कॉम पे प्रोफ़ाइल बनाई थी...। ज़िन्दगी के हर साल एक ख़ास दिन वो अब तक 27 बार मोमबत्तियाँ फूँक चुका है, और कॉलेज से लेकर अब तक कम से कम 8 बार लातें खा चुका है, जिसे दोस्त लोग मोहब्बत से जीपीएल कहते हैं। घर वालों को, दोस्तों को और अब ख़ुद उसको लगता है उसकी शादी की उम्र की एक्सपायरी डेट नज़दीक आ चुकी है।

वैसे तो कहने को चिंटू को लगभग सभी कुछ मिला है, और कभी अहसास ही नहीं हुआ कि वो गाँव के गरीब किसान का बेटा है। 90 के दशक में जब विकास की रोशनी सिर्फ कस्बों तक ही पहुँच पाई थी और गाँव अभी भी 10वीं पास और 12वीं पास लोगों के ज्ञान के प्रकाश से ही संसार देखता था, उसके माँ बाप ने उसे एक इंजिनियर बनाने की ठानी थी। शायद वो अपने सपने अपने बच्चों के माध्यम से साकार करना चाहते थे, चिंटू बचपन से ज़हीन था और घर वालों को निराश नहीं किया। आईआईटी से बी.टेक. करने के बाद जब एक बड़ी कंपनी में गुड़गाँव में उसकी नौकरी लगी थी तो पड़ोस के कई घरों में चूल्हा नहीं जला था और रोटियाँ सुलगते कलेजों पर ही सिंक गयी थी। कई ने तो आईआईटी और आईटीआई को एक ही तराजू में तौल कर बराबर भी कर दिया था। दो साल के बाद जब वो आईआईएम में एमबीए के लिय सेलेक्ट हो गया तो फिर से एक बार पास के तालाब के साँप सभी के सीनों पर लोट के लौट गये थे।

जब वो आईआईटी के बाद जॉब पर गया था, घर वालों की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा, और साथ ही खुश हुए वो जान-पहचान वाले जिनकी बेटियाँ थीं। माँ ने भी सोच लिया की अब अपनी पसंद से शादी करेगी अपने चिंटू की धूम-धाम से, तगड़ा दहेज़ लेकर। फिर आईआईएम के बाद लड़की वालों ने किनारा कर लिया, लड़का अब उनके बजट से बाहर निकल गया था। आमिर और सलमान की नब्बे के दशक की फिल्मों में कॉलेज में जहाँ पढ़ाई के अलावा सब कुछ होता है, देख-देख के घर वालों ने भी सोच लिया की अब चिंटू वहीँ कहीं इलू इलू करेगा और एक दिन सीधे आशीर्वाद माँगने आएगा।
पर चिंटू ने ध्यान सिर्फ पढ़ाई पे ही लगाया था, कभी प्यार नाम की चिड़िया उससे फँसी ही नहीं...। शकल सूरत से सामान्य था पर स्वभाव से एकदम खिलंदड़, हँसमुख और मिलनसार। कॉलेज में एक दो लड़कियों से बात भी बढ़ी थी इस दिशा में, पर वो प्यार को ज़्यादा ही सीरियसली लेता था । गाँव का था ना! ईट, ड्रिंक एँड बी मैरी के ज़माने में वो "बी मैरी" की बात कर बैठता था, जिससे "रात गयी बात गयी" को आत्मसात करने वाली मॉडर्न लड़कियाँ उसे लल्लू समझ के किनारा कर लेती थीं। ऐसे ही एक-दो एकतरफ़ा ट्रू लव पे धोखा खाने के बाद और एक-दो साल तन्हाई और अकेलेपन के कोपभवन में बिताने के बाद अब वो भी "स्टड" हो गया था, जैसे चेचक होने के बाद दोबारा नहीं होता, वैसे ही अब वो भी प्यार की इस बीमारी के प्रति "इम्यून" हो गया था। घंटों किसी से रात-रात भर बात करके भी वो इंफ़ैच्युएशन और एफ़ेक्शन को दोस्ती के दायरे में बाँधना सीख गया था।

हर माँ-बाप के कुछ सपने होते है, आशाएँ होती है, पर उनमें सबसे बड़ी होती है अपने बेटे/बेटी की धूमधाम से शादी की। यही उनके ढलते जीवन में ख़ुशी का अवलम्ब होता है। पर अब असली समस्या यहीं शुरू हुई। घर वाले जो अपनी पसंद का रिश्ता देखते, वो चिंटू के लेवल का नहीं होता और चिंटू जो देखता, वो न घर वालों के लेवल का होता और न बिरादरी का। शिक्षा और वैश्वीकरण का हवाला देके घर वालों को तो ग़ैर-बिरादरी में शादी के लिए मनाया तो जा सकता है, पर एक गॉड-फ़ीयरिंग (नॉट गॉड लविंग) और रिवाज़ों को कानून समझने वाले समाज के ढकोसलों, पड़ोसिनों के हाथ नचा-नचा के, मुँह बिदका के टेढ़ी नज़र से देखने का डर बेटे की ख़ुशी पर हावी हो जाता था। और इस तरह से दिन निकलते रहे, बात टलती रही।

अब ऑफ़िस में अपनी सहकर्मियों पर कभी उसका मन आसक्त हो भी जाता था तो भी वो विश्वास के उस टूट गये धागे से आतंकित जीवन भर किसी से बँधने से पहले कई सारी प्रैक्टिकल बातों पर विचार करना चाहता, और जहाँ दिमाग़ इक्यूएशन में आ जाता है, तो प्यार डोमेन से बाहर हो जाता है। कभी "टू स्मार्ट टू हैंडल", कभी "देसी गर्ल, टू शोर्ट, टू शोर्ट टेम्पर्ड" और कभी-कभी ख़ूबी सी लगने वाली अदाएँ आइडियल वाइफ़ की इमेज से कॉन्ट्राडिक्ट करने लगतीं। कभी ख़ुद का मन राज़ी नहीं होता, तो कभी घर वालों का।

आख़िर उसने पारंपरिक तरीकों से लड़की ढूँढने के तरीके को तिलांजलि देके, उस के हवाले कर दिया जिसका वह एक्सपर्ट था- टेक्नोलॉजी। जोड़ियाँ आसमां में बनती हैं, तब बनती हैं जब "शिष्टा"(?) होती है, पर इसके लिए रजिस्ट्रेशन करना होता है- मैरिज ऑफ़िस में या शादी.कॉम पे(या ऐसी ही कई सारी चिरकुट साइट्स पे)। उसने अपना प्रोफ़ाइल बना के डाल दिया, एक चमकदार फोटो के साथ, जिसमे सूट पहन के खड़ा था वो किसी इंटरव्यू के लिए। सोचा चलो कोई सही मिलता है तो ठीक है, नहीं तो फिर टाइम पास ही होगा। पर टाइम पास के लिए भी पास में टाइम होना चाहिए, वक़्त के साथ ऑफ़िस में रिस्पॉन्सेबिलिटी बढ़ती गयी और टाइम घटता गया। शुरू के कुछ दिन तो जोश के साथ जो भी ख़ूबसूरत फोटो दिखती, उसकी जन्मपत्री पढ़ डालता और इंटरेस्ट भेज देता, पर यह इंटरेस्ट भी अपोज़िट टू फाइनेंशियल इंट्रेस्ट, टाइम के साथ कम होता गया। साईट के भेजे मैक्सिमम मैचेज़ आईपीएल के मैच से भी ज़्यादा बसर्ड और इररेलेवेंट होते थे और बीच-बीच में आने वाले ‘पेड सर्विस’ के कॉल से उकता गया था वो....।

फिर एक दिन अचानक एक कॉल आता है, जो उसे शादी और प्यार के दोराहे पे खड़ा कर देती।.....

"हेलो सर, चिंटू जी बात कर रहे हैं न सर?"

"यस," फिर वही मधुर आवाज़, ऐसी ख़ूबसूरत आवाज़ में तो सिर्फ लोन के या इंश्योरेंस के फ़ोन आते हैं। .... पर इस बार आवाज़ कुछ जानी पहचानी लग रही थी।....

"सर, मैं चिंकी बात कर रही हूँ, शादी.कॉम से।"

अचानक कुहासा छँट गया..।

"हाँ याद आया चिंकी, आपसे बात हुई थी मेरी पिछले हफ्ते।... यार अभी इस बारे में सोचा नहीं है,... आज सोचूँगा, फिर देखो, शाम तक बताता हूँ.....,"

फिर अचानक उसके सामने तस्वीर एक उभरी, एक सीधी सी लड़की, दिल्ली के किसी कोने में एक सस्ते(?) से फ्लैट में रहने वाली, रोज़ मेट्रो से 15 किमी दूर ऑफ़िस आने वाली, धक्के खाती, दिन भर गन्दी नज़रों को झेलती, फब्तियाँ सुनती, ख़ुद को "रेप" होने से बचाती...। अपने गाँव/शहर से, घर से अलग, अकेले रहने वाली, अपनी 20000 की पगार में हर महीने पैसे बचा के घर भेजती एक लड़की का, जो अपनी सारी चिंता और परेशानियों को भुलाकर, मुस्कुराकर सबसे दिन भर फ़ोन पे "हेल्लो सर" बोलती, और मौज लेने वालों और टाइमपास वाले कस्टमर्स की गंदगी झेलती। .... उसका मन भारी हो गया, ख़ुद से थोड़ी कोफ़्त हुई।.....

"यार सच बताऊँ तो मैं पेड अकाउंट नहीं बनवाना चाहता, और मैं नहीं चाहता कि आप फालतू में अपना टाइम ख़राब करें।.... सॉरी,"....आवाज़ थोड़ी दब गयी थी उसकी।.... अपने ही ग्लानि भाव से।

"नहीं सर, कोई बात नहीं। एक्चुअली हमारे एक पेड कस्टमर ने आपकी प्रोफ़ाइल पे इंटरेस्ट भेजा है। मैं आपको आईडी मैसेज कर रही हूँ आप प्रोफ़ाइल देख लीजिये फिर रिस्पांस बता दीजिये। ....मैं आपको परेशान नहीं करूँगी, आप प्रोफ़ाइल चेक कर लीजिये, मैं आपसे कल फ़ोन कर के पूछ लूँगी।"

उसे दया सी आई इस चिंकी पे। । ...खैर कुछ आधा घंटे में उसके पास एक मैसेज भी आ गया आईडी वाला। उसने पीसी ऑन किया और प्रोफ़ाइल देखी, लड़की का नाम निधि था, कानपुर से, दिल्ली में जॉब, सैलरी 2-3 लाख, 1 भाई छोटा, पेरेंट्स गाँव में, पिताजी किसी प्राइमरी स्कूल के टीचर, लड़की सुन्दर लग रही थी एक सादे सलवार-सूट में, बड़ी-बड़ी मासूम आँखे, लम्बा चेहरा, हाथ को एक ख़ास कोने में मुड़ाये खड़ी थी कहीं, जिसके पीछे झरने, सूरज, कुँए, पेड़ और फूल वाला एक पर्दा टंगा हुआ था। प्रोफ़ाइल अच्छी थी, पढ़ाई भी ओके, उसे अगर कुछ विशेष नहीं लगा, तो कुछ ग़लत भी नहीं ढूँढ पाया उसमें। मगर शादी की फोटो में तो कोई भी शरीफ़ लग सकता है, उसने गूगल बाबा की शरण ली और की-वर्ड्स की हेल्प से एफ़वी प्रोफ़ाइल भी निकाल ली।

एफ़वी पे भी वही था, फोटोज़ में कोई ख़ास अंतर नहीं था, शायद फोटोशाप आता नहीं होगा, पर सादग़ी भरी उन तस्वीरों में एक कमिटमेंट था ख़ुद से, दृढ़ता थी, विश्वास था ख़ुद पर।.. पसंद में कुछ ख़ास नहीं - टीवी देखना, नॉर्मल हिंदी इंग्लिश मूवीज़ और बुक्स प्ढ़ना। ...दोस्त सीमित थे, ज़्यादातर हँसी मज़ाक वाले पेज उसकी लाइक्स थे। इस आपाधापी भरी ज़िन्दगी में, ऑफ़िस में, कॉलोनी में, नकली चेहरों, मुखौटों वाली, अल्ट्रा-मॉडर्न लड़कियों के बीच उसे इस कंप्यूटर स्क्रीन से उस की ओर निहारते हुए इस चेहरे से सुकून मिला। उसने सोच लिया अगर दोबारा फ़ोन आता है तो वो हाँ बोल देगा।

अगले दिन वादे के अनुसार फ़ोन आ गया था -

"हाँ सर, कैसी लगी आपको प्रोफ़ाइल?"

"बढ़िया है, मुझे तो अच्छी लगी, आप बताओ आप को कैसी लगी?"
"सर, मुझे तो बढ़िया लगेगी ही, सर, तो बताइए उनके पिताजी को नम्बर दे देती हूँ आपका, वो आपको कॉल कर लेंगे।"

"ठीक है, दे दीजिये, पर आप बहुत ख़ुश लग रही हैं, ओह शायद आपका परफ़ॉरमेंस रिकॉर्ड थोड़ा और चमक जायेगा एक सफल क्लाइंट से...!"

"आँ!! हाँ हाँ। ...सही कह रहे हैं आप...ठीक है फिर, आपको कॉल आएगा उनके पिताजी का, थैंक यू सर!"

शाम को कॉल आई थी उसके पापा की, बातचीत से सज्जन लग रहे थे, वही बातें, अपने परिवार के बारे में बताया, लड़की के गुण बताये, तारीफों के पुल-पुलिया बाँधे; घर के सारे काम जानती है, मॉडर्न आउटलुक रखती है, शहर में रहती है, फिर भी संस्कारी है, बड़ों की इज़्ज़त करती है, पढ़ाई में अव्वल, दिखने में ख़ूबसूरत आदि आदि।... फिर चिंटू के परिवार के बारे में पूछा, फिर घर के लोगों के बारे में, पापा की जॉब, चिंटू की जॉब, सैलरी, ऑफ़िस और फिर बोरिंग बातें...पापा का नंबर माँगा, तो चिंटू ने कहा कि वो बात कर ले घर पे, फिर बता देगा...।

शाम जब वो बैडमिंटन खेल कर लौटा तो उसके मोबाइल पर किसी नए नम्बर से एक मिस कॉल पड़ी थी, कॉल करने पे किसी लड़की ने उठाया था। ।

"कौन?"

"ओह, सर, चिंकी बोल रही हूँ, मैंने मिलाया था, बात हुई आपकी?"

"हाँ हुई थी, सही लग रहे थे, और अभी तो तुम यह सर बोलना छोड़ सकती हो, मैं भी शायद तुम्हारी एज का ही होऊँगा," उसने आवाज़ से अंदाज़ लगते हुए कहा।

"ओह, सॉरी, मैं भूल गयी थी की मैं ऑफ़िस में नहीं हूँ। आदत पड़ गयी है फर्जी मुस्कुराने की, सर बोलने की...," कुछ कुछ रिलैक्स हो रही थी अब वो।

कोई नहीं, होता है मेरे साथ भी...घर पे बात करते समय कभी-कभी "इट्स नाईस टॉकिंग टू यू सर’, और फ्रेंड्स को मैसेज में "विद रिगार्ड्स" लिख के भेज देता हूँ।"

एक मुक्त हँसी बिखर गयी थी, जिसकी महक ने औपचारिकता के कसैलेपन को सोख लिया था लिया था।

"खैर यह बताओ, कितनी शादियाँ करवाई हैं आपने?"

"पता नहीं पर, 10-15 तो हो गयी होंगी अब तक।"

"और ख़ुद की हुई की नहीं, मुझे लगता नहीं की हुई है, सही है न?"

"सही है, पर आपको ऐसा क्यों लगता है?"

"बस पता चल जाता है, तुम्हारी आवाज़ से लग रहा है..."

"और क्या क्या पता लग जाता है, हम्म.....। एक बात पूछनी थी तुम कांटेक्ट कैसे करते थे बिना पेड-अकाउंट के, या ऐसे ही टोपी पहना रहे थे?"

चिंटू के ख़ुराआती तरीकों को सुन कर देर तक हँसी थी वो। एक खनकती हुई सी हँसी, निश्छल, निष्कपट। दोनों में से कोई भी ध्यान भी नहीं दे पाया की कब वो दोनों आप से तुम पर आ गये थे। दूरियाँ मिट रही थी, औपचारिकता का सिलसिला गर्मजोशी में बदल गया था। उसे याद नहीं उसने कितनी देर बात की.... कब सो गया...।

दिन में फिर फ़ोन आया था, निधि के पिताजी का, बोल रहे थे, पापा से बात हुई थी उनकी, अब दोनों परिवार मिलने का प्लान बना रहे थे, और शायद अगले हफ़्ते वो चिंटू के घर भी जा रहे थे...घर देखने...वर के लिए उन्होंने फैसला अपनी बेटी पे छोड़ रखा था और कहा था की वो नंबर दे देंगे अपनी लड़की का और वो दोनों वहीँ मिल लें दिल्ली में। उसने अगले संडे के लिए बोल दिया था...।

हम छोटे से छोटे फैसले पे भी काफी सोच-विचार करते हैं, पर इस मामले में जीवन की बागडोर सौंप देते हैं, एक अनिश्चित भविष्य के हाथों...सिर्फ एक मुलाकात के आधार पे, या ग्रहों की दशा और दिशा पे... शादी एक संभावनाओं से भरे अँधेरी सुरंग जैसी लग रही थी उसे, जिसके छोर पे प्रकाश तो है पर वो सूरज की रोशनी है या आनेवाली ट्रेन की लाईट? कौन जाने...प्यार के कई रूप देख चुका था वो, इसलिए इस बार सँभल के, सावधानी से कदम बढ़ाना चाहता था वो।..

मन में कई उमड़ते-घुमड़ते सवालों के बादल थे, किस से पूछे? आख़िर शाम को उसने नंबर मिला दिया था चिंकी का...। क्यों? उसे ख़ुद को नहीं पता...। शायद उसे लगा वो समझ सकती है उसकी उलझन, आख़िर उसका काम ही है ये... वही गर्मजोशी से जवाब दिया उसने, सुना ज़्यादा, बोला कम और शायद यही चाहिए था, अपना गुबार खाली कर दिया उसने...। फिर एक सिलसिला चल पड़ा था बातों का और फिर कुछ ही दिनों में टॉपिक बदलते-बदलते एक दूसरे की जॉब की कठिनाइयों, बॉस की बुराई, देश की हालत, अन्ना के आन्दोलन, दिल्ली के रेप, ब्लैक मनी से होते-होते एक दूसरे की दिनचर्या, परिवार, खाना खाया या नहीं? शादी क्यों नहीं की, कभी प्यार हुआ या नहीं? तक पहुँच गया था। उसके सामने वो ख़ुद को खोल के रख देता था, कोई दुराव-छिपाव नहीं, कोई डर नहीं भला या बुरा लगने का। सब बता देता था अब वो कौन सी लड़की देखी, क्या देखा। अपने पुराने एकतरफ़ा प्यार की छुपी हुई टीस के बारे में भी बताया उसने... क्यों, पता नहीं, पर काफी दिनों बाद ख़ुद को हल्का महसूस कर रहा था, जैसे कोई मवाद निकल गया हो जो धीरे-धीरे शरीर को गला रहा था अब तक, अन्दर ही अन्दर...।

पर कुछ और भी हो रहा साथ-साथ...। जो वो समझ नहीं पा रहा था...। कि क्यों जब पापा बोल रहे थे कि निधि का परिवार उन्हें अच्छा लगा, लड़की भी अच्छी लगी, तब उसे कोई विशेष ख़ुशी नहीं हुई, क्यों जब उसने निधि से बात की थी तो उसकी आवाज़ में वो चिंकी को ढूँढ रहा था, बस औपचारिक बातें ही की उसने निधि से, लग रहा था जैसे कोई नोट्स माँग रहा हो बस, लगा ही नहीं कि यह दोनों शादी करने वाले हैं, क्यों उसके पास निधि से बोलने को कुछ नहीं होता और क्यों चिंकी से उसकी बातें ख़त्म ही नहीं होती, क्यों जब चिंकी उसकी शादी की बात करती है तो वो कहीं खो जाता है...।

कुछ और भी फ़ील किया था उसने, कभी-कभी चिंकी उससे पूछती है कि कहाँ तक पहुँची बात शादी की, तो उसका सवाल में ज़्यादा इंटरेस्ट रहता है और जवाब सुन के बस वो, थोड़े ठहराव के बाद, धीरे से "अच्छा है", "बढ़िया", "सही है", इसके आगे कुछ नहीं बोलती। अब कभी-कभी फ़्लर्ट करने पर पहले की तरह हँसती नहीं है। उसे कुछ-कुछ महसूस हो रहा था, और इसलिए साथ-साथ उसकी बेचैनी भी बढ़ रही थी..। बंधन शिथिल हो रहे थे, चीज़ें बिखर रही थीं, दोस्ती के बंधन को तोड़ देने की हद तक।...

कल ही तो जाना था उसे निधि के घर, आज रात उसने जब उसने बात की, तो चिंकी कुछ ज़्यादा ही सीरियस लग रही थी, जब चिंटू मज़ाक में हँस के बोला था, "लगता है तुम्हें मुझसे प्यार हो गया है?" तब वो हमेशा की तरह ये नहीं बोली, "तुम न, बहुत बड़े फ़्लर्ट हो" ऐसा कई बार पहले भी बोल चुका था वो बिना किसी फीलिंग के। ...आज जब उसने हँस के कहा था, "अब मेरी बीवी तो तुमसे बात करने न देगी, तुम कैसे रहोगी मेरे बिना, तुम्हें तो कीड़ा है मुझसे बात करने का।" तब उसने जो जवाब दिया था, उसे सुन के हँस नहीं पाया था वो, उसका गला सूख गया था अचानक।

उसने बहुत धीरे से कहा था, "यह मेरी प्रॉब्लम है, मैं तुम्हे परेशान नहीं करूँगी...।"

और तब से ही वो परेशान है, अचानक उससे हुई सारी बातों के मतलब बदलने लगे, रात भर पता नहीं क्या-क्या सोचता रहा। उसे लगा जैसे लाइफ ने एक सर्किल पूरा कर लिया है वो फिर वहीँ आ गया है, जहाँ से वो शुरू हुआ था, बस इस बार वो दूसरे छोर पे था...। उसे कोई अंतर नहीं लगा ख़ुद में और उनमें जिनसे वो प्यार और फिर नफ़रत कर के अब धीरे-धीरे भूल रहा था...। वो भी तो आज वही कर रहा था, जिसके लिए उन लड़कियों को गालियाँ देता था। अब उसकी लड़ाई सिर्फ ख़ुद से ही रह गयी थी।

सुबह बेमन से तैयार हुआ वो, उसे छोड़ के सब खुश लग रहे थे, जैसे कोई एग्ज़ान देने जा रहा हो जिसका उसे सिलेबस भी न पता हो... हाँ सही ही तो है। वो जानता ही क्या है, निधि के बारे में? बस यह एक समझौता ही तो है यह सब... बिना जाने एक दूसरे से बँध जाना और फिर जीवन भर एक दूसरे को समझने की कोशिश करना, और फिर अंत में थक-हार के एक दूसरे को उस हद तक चेंज कर लेना जहाँ दोनों ख़ुद से भी अलग हो जाते हैं।

दोपहर में पहुँचे थे वो निधि के घर। दोनों परिवार हँस-हँस के मिल रहे थे जैसे के दूसरे को न जाने कब से जानते हों। निधि भी आई थी सामने बैठी थी, हल्का-हल्का मुस्कुराती हुई... आज यह हँसी बुरी लग रही थी उसे... आख़िर उसने सोच लिया वो बोल देगा निधि से... घर वालों को बाद में भी समझा लिया जायेगा। बहुत ड्रामा होगा, पर वो लाइफ़ से ड्रामा नहीं कर सकता।

1-2 घंटे सब लोग साथ ही बैठे रहे, फिर दोनों को कुछ देर अकेले के लिए थोड़ा टाइम मिला तो

चिंटू ने कहा, "निधि, मैं तुमसे कुछ कहना चाह रहा था।"

निधि ने धीरे से हाँ में सर हिलाया था, "ह्म्म्म"

"तुम बहुत अच्छी हो, और तुम मुझे पसंद भी हो, पर एक बात है। जब तुमने पूछा था कि तुम्हारी लाइफ़ में कोई है क्या, तब कोई नहीं था, पर अब मुझे लग रहा है, की शायद कुछ है।"

निधि ने देखा था, पता नहीं उन आँखों में क्या था? चिंटू को लगा जैसे वो हँस रही है पर ऐसा नहीं हो सकता, शायद यह व्यंग्य हो।

चिंटू ने दोहराया, "मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। वो चिंकी याद है न, जिसने शादी.कॉम वाली जिसके बारे में मैंने तुम्हें बताया था, कल उसने कुछ ऐसा कहा, जिससे मुझे लग रहा है कि मैं तुमसे शादी करके उसके साथ गलत कर रहा हूँ, तुम ही बताओ अब मुझे क्या करना चाहिए?"

निधि ने रहस्यमयी आवाज़ में उत्तर दिया, "सर, ये सही टाइम है बात करने का, ऐसे मैं आपको चिंकी से ही शादी करनी चाहिए सर!"

और फिर ज़ोर से हँस पड़ी थी वो, वही जानी-पहचानी उन्मुक्त, निश्छल हँसी जो वो पहले भी सुन चुका था फ़ोन पे कई बार...चौंकने की बारी अब चिंटू की थी...।

"चिंकी तुम, ... तुम निधि?"

एक साथ कई सारे भाव एक साथ उसके चेहरे पे छा गये थे... पर फ़ाइनली वो बस बदहवास ही नज़र आ रहा था...। "पर तुम कैसे?"

निधी ने मुस्कुराते हुए कहा, "याद है जब मैंने तुम्हे बताया था कि एक प्रोफ़ाइल का इंटरेस्ट आया है, तब मैं सही थी... फिर तुमसे बात करके लगा कि तुम्हें जाने नहीं दिया जा सकता, किसी और के लिए। मेरे घर वाले भी ढूँढ रहे थे मेरे लिए, फिर मैंने तुम्हें अपनी ही आईडी बता दी थी, और बस फिर आगे तो तुम जानते ही हो...।"

चिंटू फिर बेवकूफ़ बन गया था लाइफ़ में...एक लड़की के हाथों...। पर हार के इतना ख़ुश वो कभी नहीं हुआ था...।


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