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ISSN 2292-9754

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08.04.2014


मैं बुझे चाँद सा

मैं बुझे चाँद सा
अन्धेरे में छिपा हुआ बैठा था
सब रागिनियाँ डूब चुकी थीं
प्रलय निशा में

तभी जगे तुम
दूर सिंधु के जल में झलमल
और बांसुरी ऐसी फूँकी
अंधकार को फाँक फाँक में चीर चीर कर
सातों सुर बज उठे
सात रंगों वाले

बुझे चाँद में एक एक कर
सभी कलाएँ थिरक उठीं।


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