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ISSN 2292-9754

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10.07.2014


क्या है ?

सुनो!
हवा ने
एक दिन
मेरे कान उमेठे;
मैंने यूँ ही पूछा – ‘क्या है?’
उत्तर मिला – ‘प्यार’.

दूसरे दिन
एक फूल ने
मेरा गाल थपथपाया;
मैंने चौंक कर पूछा – ‘क्या है?’
उत्तर मिला – ‘प्यार’.

तीसरे दिन
बिजलियों ने
मेरे होंठ छुए;
मैंने सहम कर पूछा – ‘क्या है?’
उत्तर मिला – ‘प्यार’.

चौथे दिन
मौसम ने
मुझे बाँहों में दबोच लिया;
मैंने गुस्से में पूछा – ‘क्या है?’
उत्तर मिला – ‘प्यार’.

पाँचवें दिन
इंद्रधनुष
मेरे आँचल में बँधा गया;
मैंने संकोचपूर्वक पूछा – ‘क्या है?’
उत्तर मिला – ‘प्यार’.

छठे दिन
मेरी गोद में
सूरज था;
मैंने विवश होकर पूछा – ‘क्या है?’
उत्तर मिला – ‘प्यार’.

सातवें दिन
मुझे तश्तरी में
परोसा गया था
मैंने कराहते हुए पूछा – ‘क्या है?’

एक उत्तर
मेरे मांस के
टुकड़े को
दांतों तले चीथता हुआ
किचकिचाया – ‘प्यार’।


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