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| 09.07.2008 |
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दोहे : 15 अगस्त प्रो.ऋषभदेव शर्मा |
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१
कटी-फटी आज़ादियाँ, नुचे-खुचे अधिकार। तुम कहते जनतंत्र है, मैं कहता धिक्कार!! २ रहबर! तुझको कह सकूँ, कैसे अपना यार? तेरे-मेरे बीच में, शीशे की दीवार!! ३ मैं तो मिलने को गई, कर सोलह सिंगार। बख्तर कसकर आ गया, मेरा कायर यार॥ ४ ख़सम हमारे की गली, लाल किले के पार। लिए तिरंगा मैं खड़ी, वह ले 'कर' हथियार॥ ५ षष्ठिपूर्ति पर आपसे, मिले खूब उपहार। लाठी, गोली, हथकडी, नारों की बौछार॥ 0 ऐसे तो पहले कभी, नहीं डरे थे आप? आजादी के दर पड़ी, किस चुड़ैल की थाप?? ६ सहसा बादल फट गया, जल बरसा घनघोर! इसी प्रलय की राह में, रोए थे क्या मोर?! ७ चिड़िया उड़ने को चली, छूने को आकाश। तनी शीश पर काँच की, छत, कैसा अवकाश ?! ८ कहना तो आसान है, 'लो, तुम हो आज़ाद'! सहना लेकिन कठिन है, 'वह' जब हो आज़ाद!! ९ अपराधी नेता बने, पकडो इनके केश। जाति धर्म के नाम पर, बाँट रहे ये देश॥ १० कैसा काला पड़ गया, लोकतंत्र का रंग। अब ऐसे बरसो पिया, भीजे सारा अंग॥ |
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