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| 01.16.2009 |
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छब्बीस जनवरी प्रो.ऋषभदेव शर्मा |
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लोकतंत्र का पर्व शुभंकर तानाशाही मिटे, धनबल,भुजबल की कीचड़ में अब तक का इतिहास यही है : ऐसा ही होता आया है ! कब तक लोकतंत्र में जो निर्णय हो जो हो , लोकतंत्र का पर्व शुभंकर |
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