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05.23.2017
 
छब्बीस जनवरी
प्रो.ऋषभदेव शर्मा

लोकतंत्र का पर्व शुभंकर
मंगलमय हो !

तानाशाही मिटे,
      उपनिवेशी सोच हटे,
            सम्प्रदाय औ' जातिवाद की
                  धुँध कटे, अँधियार छँटे !
गति को वरें -
      प्रगति को चुन लें -
          दलबंदी के दलदल में जो
               संविधान के पाँव फँसे हैं !

धनबल,भुजबल की कीचड़ में
      जन गण जो आकंठ धँसे हैं ,
          प्राणों की पुकार को
               सुन लें !

अब तक का इतिहास यही है :
प्रभुता पाकर
सब
जनता के खसम बन गए !

ऐसा ही होता आया है !
ऐसा ही होने वाला है !!

कब तक
लोक शक्ति मुहताज रहेगी
त्रिशंकुओं के तंत्र मंत्र की ?

लोकतंत्र में जो निर्णय हो
नीर - क्षीर सबके समक्ष हो !
कुर्सीवालों के समक्ष अब
एक समांतर लोकपक्ष हो !!

जो हो ,
जनता की इच्छा से तय हो !

लोकतंत्र का पर्व शुभंकर
मंगलमय हो !!


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