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05.23.2017
 
भारतीय साहित्य में दलित विमर्श : मणिपुरी समाज का संदर्भ
डॉ.ऋषभदेव शर्मा

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में ’दलित’ से अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें जन्म, जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण शताब्दियों तक सामाजिक न्याय और मानवाधिकार से वंचित रहना पड़ा है। मुख्य रूप से वर्ण व्यवस्था में शूद्र समझी जाने वाली जातियाँ, छुआछूत की प्रथा के शिकार अछूत, हरिजन और गिरिजन दलित वर्ग के अंतर्गत आते हैं। सामाजिक विडंबना यह है कि मध्यकाल में स्त्री को भी इसी प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार होना पड़ा; इसलिए इस वर्ग में संपूर्ण समाज की आधी आबादी समझी जानेवाली स्त्री जाति भी शामिल है। शूद्र और स्त्री को ढोल और पशु की भाँति ताड़ना का पात्र घोषित करने वाली परंपरा ने अमानुषिक अत्याचार करके इन वर्गों को इस प्रकार पददलित किया कि इनकी अस्मिता तक विलीन हो गई। आज जब हम दलित विमर्श की बात करते हैं तो एक ओर तो हम इसका संबंध भूमंडलीकरण के साथ उभरे उत्तर आधुनिक विमर्श से जोड़ते हैं तथा दूसरी ओर उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय नवजागरण के उस अधूरे रह गए पक्ष के साथ जोड़ते हैं जिसका नेतृत्व एक ओर तो राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, बालगंगाधर तिलक और महात्मा गाँधी जैसी महान आत्माओं ने तथा दूसरी ओर ज्योति बा फुले, पेरियार, नारायण गुरु और डॉ. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जैसी परिवर्तनकामी विभूतियों ने किया। नवजागरण की पहली परंपरा के नेतागण जहाँ ’सुधार’ की नीति में विश्वास रखते थे वहीं दूसरी परंपरा के नेताओं का विश्वास ’परिवर्तन’ में था। उत्तर आधुनिक विमर्श ने हाशिए के वर्गों को केंद्र के वर्ग बनाने की पहल करके दूसरी परंपरा के इसी विश्वास को नया संदर्भ प्रदान किया और विभिन्न भारतीय भाषाओं में बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में दलित विमर्श तीव्रता के साथ उभरा। इस प्रकार भारतीय समाज और साहित्य के संदर्भ में दलित विमर्श का अभिप्राय है वर्णाश्रम व्यवस्था अथवा तथाकथित मनुवादी या ब्राह्मणवादी व्यवस्था में अस्पृश्यता, दमन और दलन के शिकार निम्न वर्ण या अंत्यजों की पीड़ा की केंद्रीय विमर्श के रूप में स्वीकृति। और इस दलित विमर्श का ध्येय है जाति उन्मूलन।

भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का उभार भारतीय समाज व्यवस्था के परिवर्तन का द्योतक है। यह विडंबना ही है कि समस्त प्राणियों में एक ही परम तत्व के दर्शन करने वाला तथा वर्ण व्यवस्था को गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित करने वाला समाज एक समय इतना कट्टर हो गया कि निम्न वर्ण या जाति में जन्म लेने वालों को सब प्रकार के अवसरों से मनुष्य और मनुष्य में जन्म के आधार पर भेदभाव करते हुए, वंचित किया जाने लगा। इस सारी व्यवस्था के लिए आज प्रायः ’मनुस्मृति’ को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और उन ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिस्थितियों एवं घात-प्रतिघातों की उपेक्षा कर दी जाती है जिन्होंने एक सुचिंतित सामाजिक व्यवस्था को जड़, प्रगतिविरोधी, मानवविरोधी एवं समाजविरोधी रूढ़ में बदल दिया। भारत की लंबी गुलामी का एक बड़ा कारण भारतीय समाज की रूढ़ग्रस्त और सड़ी-गली जाति व्यवस्था और छुआछूत की कुरीति को माना जा सकता है। इसीलिए नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधाओं ने भारत को इस कलंकपूर्ण प्रथा से मुक्त कराने का यथाशक्ति प्रयास किया। यही कारण है कि भारत के संविधान में अनुच्छेद १५ (२ बी) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि जाति के आधार पर भारत के किसी भी नागरिक के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। इसके अलावा लंबे समय तक सामाजिक शोषण और दमन का शिकार रही हरिजन और गिरिजन जातियों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में अलग से सूचीबद्ध किया गया ताकि इनके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके। इन प्रयासों के सुपरिणाम सामने आने लगे हैं जिनमें से एक है भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य की नई प्रवृत्ति का विकास।

भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया में आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में चली मानवाधिकारों की हवा ने दलित चेतना को प्रवाहित करने में बड़ा योगदान किया है। इस क्षेत्र के दलित साहित्यकार जहाँ एक ओर परंपरागत काव्यशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र को अपर्याप्त मानते हुए साहित्य की नई कसौटी की खोज कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे अफ्रीका और अमरीका की अश्वेत जातियों के साहित्य से भी प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं। काव्यभाषा में भी इससे सुनिश्चित परिवर्तन आया है, क्योंकि दलित साहित्य मनोरंजन और आनंद के लिए नहीं, समाज को झकझोरने और जगाने के लिए लिखा जा रहा है। इसीलिए कभी-कभी उसका तेवर प्रगतिशील और जनपक्षीय साहित्य के अन्य आंदोलनों के समान प्रतीत होता है।

म्लेच्छ, अछूत, दस्यु, दास तथा और न जाने कितने गालीवाचक शब्दों से पुकारी गई जातियों ने दलित साहित्य (दलितों द्वारा रचित, दलित चेतना संपन्न साहित्य) के रूप में अपने ’अनुभव’ को उच्च वर्ण के साहित्यकारों के ’अनुमान’ की तुलना में मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करने में सफलता पाई है। अनुभव की मुख्यता होने के कारण यह साहित्य मूलतः आत्मकथात्मक है। हिंदी में १९८० के बाद कई दलित आत्मकथाएँ आईं और चर्चित हुईं (मोहनदास नैमिशराय, ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल चौहान), दलित साहित्य की वार्षिकी का प्रकाशन आरंभ हुआ (जयप्रकाश कर्दमः १९९९), दलित कविता सामने आई (ओमप्रकाश वाल्मीकि, श्यौराज सिंह बेचैन, रजतरानी, सुदेश तनवीर), दलित पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ (अपेक्षा, शंबूक, युद्धरत आमआदमी), दलित उपन्यासों की रचना हुई (छप्परः जयप्रकाश कर्दमः १९९४) तथा समीक्षा के क्षेत्र में दलित विमर्श को व्यापक स्वीकृति प्राप्त हुई। इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य के इतिहास का दलित विमर्श की दृष्टि से पुनर्पाठ भी आरंभ हुआ जिसके परिणामस्वरूप भक्ति साहित्य को नई दृष्टि से व्याख्यायित किया गया तथा बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों का अध्ययन भी दलित चेतना के संदर्भ में किया जाने लगा। इसी से १९१४ में ’सरस्वती’ में प्रकाशित हीरा डोम की कविता ’अछूत की शिकायत’ को हिंदी दलित साहित्य की प्रथम रा के रूप में स्वीकृति प्राप हुई।

यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि फुले और अंबेडकर के प्रभाववश दलित विमर्श का यह विस्फोट सर्वप्रथम मराठी के साहित्य में दिखाई दिया। उसके बाद हिंदी, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और तमिल आदि विविध भारतीय भाषाओं में गत शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रवृत्ति क्रमशः लगगभ साथ-साथ विकसित हुई। इस साहित्यप्रवृत्ति ने साहित्य के केंद्रीय आख्यान के रूप में वर्णविरोधी आख्यान को स्थापित करने का प्रयास किया है जिससे जहाँ एक ओर दलित अस्मिता को सफलतापूर्वक रेखांकित किया जा सका है, वहीं दूसरी ओर असंतोष और आक्रोश की परिणति जातिवादी क्रोध, प्रतिहिंसा और घृणा के रूप में भी सामने आई है - जो इस आंदोलन का चिंताजनक पक्ष है। दलित राजनीति ने भी दलित साहित्यकारों को प्रभावित किया है। विशेषकर दलित पैंथर, बहुजन समाज पार्टी और द्रविड़ विचारधारा वाली पार्टियों में इन्हें अनुकूलता नजर आती है, जो स्वाभाविक भी है। मंडल आयोग संबंधी बहसों का भी दलित साहित्य पर प्रभाव पड़ा है। निश्चय ही दलित साहित्य एक नवीन सामाजिक ऐतिहासिक आख्यान की रचना कर रहा है। परंतु दलित राजनीति द्वारा उसके असंतोष और आक्रोश के अपने निहित स्वार्थ हेतु उपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

दलित साहित्य का उद्देश्य एकदम साफ है और वह हैः दलित मुक्ति। इसके लिए परंपरागत हिंदू वर्ण व्यवस्था का बहिष्कार करते हुए बाबा साहेब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था इसीलिए दलित साहित्यकारों को बौद्ध धर्म की वर्णविहीन व्यवस्था में अपने लिए पर्याप्त संभावनाएँ दिखाई देती हैं। यही कारण है कि मलयालम और तमिल समाज में दलित आंदोलन बड़ी सीमा तक हिंदू विरोध, ब्राह्मण विरोध और संस्कृत विरोध का पर्याय प्रतीत होता है। ब्राह्मण-अब्राह्मण के कट्टर भेदभाव से ग्रस्त यह समाज दलित के नाम पर समाज को नए सिरे से विघटित करके एक सर्वथा दलित वर्चस्व वाले समाज के संघटन की कल्पना करता है। मलयालम दलित चिंतक कंचा इल्लय्या जब यह घोषणा करते हैं कि बीस-तीस वर्षों के भीतर अंग्रेजी भारत की राष्ट्रभाषा बन जाएगी, हिंदू धर्म एक सामाजिक-धार्मिक शक्ति के रूप में नष्ट हो जाएगा और वेद, उपनिषद तथा गीता से प्रेरणा प्राप्त करने वाले साहित्य के स्थान पर अंबेडकरवादी दलित साहित्य सर्वव्यापी हो जाएगा, तो वे वास्तव में दलित विमर्श को स्वार्थ और घृणा की राजनीति का शिकार बनाने का प्रयास करते प्रतीत होते हैं। ऐसे चिंतक दलित साहित्य को उत्तर-आधुनिक विमर्श के बजाय उत्तर-हिंदू विमर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसके बावजूद यह सत्य है कि अंबेडकरवादी यह साहित्य दलित की मुक्ति की खोज ज्ञान की मुक्ति के रूप में करता है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में बुद्ध ने ज्ञान को उच्च वर्णों के शिकंजे से मुक्त कराया था तथा स्वतंत्र भारत में दलित विमर्श उसी कार्य को करना चाहता है। इसके लिए उसे संवैधानिक शक्ति भी प्राप्त है। यह हर्ष का विषय है कि अंबेडकरवादी यह आंदोलन दलितों को कलम और किताब के माध्यम से संघर्ष के लिए प्रेरित करता है और यह विश्वास करता है कि दलित साहित्य में जड़ रूढ़ जातिवादी सामाजिक संरचना को बदलने की शक्ति निहित है।

विविध भारतीय भाषाओं के साहित्य में दलित विमर्श के इस उभार के संदर्भ में जब हम ने मणिपुरी साहित्य का रुख किया तो यह रोचक तथ्य सामने आया कि अब तक विवेचित अर्थों में दलित विमर्श मणिपुरी साहित्य में सर्वथा अनुपस्थित है। इसका कारण समझने में भी देर नहीं लगी। दरअसल मणिपुरी समाज व्यवस्था में हिंदू समाज व्यवस्था जैसी वर्ण और जाति की प्रथा कभी नहीं रही। वहाँ अस्पृश्यता अथवा जातिगत भेदभाव न पहले था, न आज है। इसका अर्थ है दलित विमर्श के रूढ़ अर्थ में मणिपुरी समाज में जब दलित ही नहीं है, तो वहाँ के साहित्य में दलित विमर्श कहाँ से आएगा।

अब जरा मणिपुरी समाज के इस वैशिष्ट्य की पृष्ठभूमि को खंगाल लेना समीचीन होगा। मणिपुरी मूल समाज में हिंदू धर्म के सदृश भगवान की परिकल्पना नहीं है। वहाँ सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में ’अतिया गुरु शिदबा’ की मान्यता है। अतिया का अर्थ है आकाश जो सर्वव्यापकता का प्रतीक है तथा शिदबा का अर्थ है अमर जो शाश्वता का प्रतीक है। इस प्रकार मणिपुरी समाज में यह मान्यता है कि सर्वव्यापी और शाश्वत शक्ति के रूप में आदि गुरु ने ही सृष्टि की रचना की। गुरु शिदबा के दो पुत्र हुए, ’पाखंबा’ और ’सनामही’। इन दोनों के सात पुत्रों से सात वंश या गोत्र निर्मित हुए, जिनके नाम पर सात राज्य थे। बाद में इन वंशों के अनेक उपवंश बन गए जिनका आगे चलकर एकीकरण होने पर मोइराङ् तथा ’कङ्ला’ नामक दो वंश बने। बाद में ये दोनों भी एकीकृत हो गए और इस तरह एक ही राजवंश बचाः कङ्ला। यह कङ्ला ही आधुनिक मणिपुर है। (कङ् का अर्थ है सूखना तथा लैबक का अर्थ है भूमि। इस प्रकार कङ्ला सूखी भूमि का वाचक है।) इस रूप में लगभग चार-पाँच शताब्दी पूर्व एकीकृत हुए मणिपुर में जाति-पांति के आधार पर किसी भी प्रकार की ऊँच-नीच नहीं थी और न ही वैसा शोषण और दमन था जिसकी चर्चा ब्राह्मणवादी व्यवस्था की शिकार दलित जातियाँ करती है। अर्थात शेष भारत जैसी वर्णव्यवस्था की विकृतियाँ मणिपुरी समाज में कभी नहीं रहीं, आज भी नहीं हैं।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है १३वीं-१४वीं शती में जब मणिपुर में वैष्णव धर्म का प्रवेश हुआ तो पहले-पहल रामानंदी संप्रदाय यहाँ आया। संभवतः ’जाति-पांति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’ के दर्शन में व्यावहारिक रूप से विश्वास करने के कारण ही यह संप्रदाय मणिपुरी समाज को रास आया होगा तथा व्यापक तौर पर वैष्णव धर्म का यहाँ प्रचार हो सका होगा। इतना ही नहीं, बाद में जब बंगाल से गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय मणिपुर पहुँचा तो उसके प्रचारकों ने यहाँ जाति व्यवस्था चलाने का प्रयास भी किया परंतु मणिपुरी समाज के अपने संस्कार इतने प्रबल थे कि जातिगत भेदभाव और छुआछूत यहाँ जड़ नहीं जमा सकी।

यदि सामाजिक पृष्ठभूमि से अलग होकर विचार करें तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि आर्थिक और राजनैतिक कारणों से वर्ग भेद मणिपुरी समाज में अवश्य उपस्थित है। ध्यान रहे कि जाति और वर्ण सांस्कृतिक प्रत्यय हैं जबकि वर्ग राजनैतिक-धनिकों द्वारा निर्मित श्रेणी है। आर्थिक वर्ग भेद के कारण उच्च वर्ग जिस प्रकार अन्यत्र निम्न वर्ग का शोषण करता रहा है, मणिपुर भी उसका अपवाद नहीं है। अर्थात शोषित-दमित वर्ग यहाँ भी है परंतु उसे दलित विमर्श के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता, अन्यथा ’दलित’ शब्द की परिभाषा को बदलकर उसे शोषित के व्यापक अर्थ में रखना होगा। राजनैतिक और आर्थिक लाभ उठाने की दृष्टि से दक्षिण मणिपुर ’ककचिङ्’ क्षेत्र के अनेक वर्गों ने स्वयं को अनुसूचित प्रमाणित करवा लिया है परंतु वे उस प्रकार के सामाजिक तिरस्कार के पात्र कभी नहीं रहे जिसका अनुभव हिंदू व्यवस्था के हरिजनों-गिरिजनों को है।

यह भी ध्यान देने की बात है कि जिन्होंने अपने-आपको अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अन्य पिछड़ी जातियों में सम्मिलित कर-करा लिया है, मणिपुर में उनकी भी शादियाँ गैर अनुसूचितों और गैर पिछड़ों में होती हैं अर्थात आरक्षण की राजनीति के बावजूद रोटी-बेटी का संबंध समाज के सभी वर्गों के बीच विद्यमान है। यदि नृवंशशास्त्रीय पक्ष की चर्चा करें तो यह भी उल्लेखनीय ह कि मणिपुर में पुराने जमान से सात मीतै राजन्य वर्गों के अलावा नौ गिरिजन वंश भी रहे हैं। लेकन इनके बीच भी जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव कभी नहीं रहा तथा रोटी-बेटी का संबंध इन वंशों के बीच बिना भेदभाव के रहा है। एक और बात ध्यान देने वाली है कि जहाँ शेष भारत में प्रायः बौद्धों की गिनती दलित और पिछड़ों में की जाती है, वहीं मणिपुर में बौद्धधर्मावलंबी भी दलित नहीं हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि मणिपुर में दलन, दमन और शोषण का इतिहास समाजशास्त्रीयता की अपेक्षा राजनीति और प्रशासन से संचालित है। इस प्रकार के दलन, दमन और शोषण का सक्रिय प्रतिरोध और विरोध करने वाले २८ उग्रवादी और प्रतिउग्रवादी संगठन मणिपुर में सक्रिय हैं। लेकिन इन संगठनों का कोई टकराव समाज के किसी वर्ग (जाति या वर्ण) के साथ नहीं है। बल्कि इनका टकराव राजनैतिक, प्रशासनिक, सैनिक और सुरक्षा व्यवस्था से है जिसे ये मणिपुरी समाज के शोषक के रूप में देखते हैं। इसके अलावा मणिपुर में पुराने और अत्याधुनिक मूल्यों का टकराव भी पीढ़ियों के टकराव के रूप में देखा जा सकता है। इस टकराव की साहित्यिक परिणति भी मणिपुरी भाषा के युवा साहित्य अथवा क्रुद्ध साहित्य में अत्यधिक तीव्रता के साथ हुई है। परंतु उसे दलित विमर्श का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

दलित विमर्श के अंतर्गत ही प्रायः स्त्री विमर्श की चर्चा भी की जाती है। मणिपुर के संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि यहाँ स्त्रियाँ शेष भारत की अपेक्षा सदा ही बेहतर स्थिति में, जागरूक, संघर्षशील, शक्ति संपन्न तथा परिवार से लेकर समाज तक के निर्णयों को प्रभावित करने में सक्षम और आंदोलनधर्मी रही हैं। मणिपुरी भाषा के साहित्य में मणिपुरी स्त्री की यह छवि देखी जा सकती है।
यहाँ सहज ही प्रश्न उठता है कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की भाषाओं के साहित्य में दलित विमर्श की क्या स्थिति है। उल्लेखनीय है कि असम का समाज बड़ी सीमा तक जातिवादी है तथा जातिवादी बंधन यहाँ उत्तर भारत से भी उग्र है। इसीलिए असमिया साहित्य में दलित विमर्श उपलब्ध है। त्रिपुरा में भी जहाँ बंगाल का प्रभाव है वहाँ जातिभेद है; और जातिवादी दलन भी। परिणामस्वरूप दलित विमर्श का साहित्य भी वहाँ हैं। इसी प्रकार नेपाल के प्रभाववश सिक्किम में जाति व्यवस्था आज भी अत्यंत दृढ़ है तथा छुआछूत और अंधविश्वास व्याप्त है। वहाँ के साहित्य में भी दलित विमर्श का उभार स्वाभाविक है।

मणिपुर की भांति अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय और नगालैंड में जाति भेद न होने के कारण वहाँ के साहित्य में दलित विमर्श नहीं है। यहाँ इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि नगालैंड में जनजाति की व्यवस्था अभी भी सभ्यता की आदिम अवस्था में सुरक्षित है और उनकी अपनी जनजातीय संस्थाएँ है जिनमें वर्ण या जातिगत सामाजिक अन्याय और भेदभाव की कोई अवधारणा ही नहीं है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि सभ्यता की आदिम व्यवस्था में वर्ण या जाति की संकल्पना के लिए कोई स्थान नहीं था।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य में दलित विमर्श के व्यापक प्रचलन का मूल कारण जाति और वर्ण पर आधारित सामाजिक भेदभाव रहा है तथा जिन समाजों में इस प्रकार का भेदभाव नहीं पाया जाता वहाँ दलित विमर्श अनुपस्थित है। यहाँ मैं यह जोड़ना चाहूँगा कि यदि दलित विमर्श और दलित साहित्य का उद्देश्य जाति का उन्मूलन करना तथा बिना जातिगत आधार वाले समाज का निर्माण करना है तो साहित्यकारों, विशेषकर दलित साहित्यकारों, को मणिपुरी समाज का अध्ययन करना चाहिए। वर्णविहीन समाज के साथ-साथ मणिपुर का समाज स्त्री सशक्तीकरण के दृष्टि से भी विशेष स्थान का अधिकारी है। साहित्यकारों को इस बात की ओर भी ध्यान देना चाहिए कि दलित स्त्री को मणिपुरी स्त्री का ’रोल मॉड’ दिया जा सकता है। दमन और दलन के वर्णेतर स्वरूप और उसके प्रतिकार को भी यदि आधुनिक भारतीय साहित्य के एक सरोकार के रूप में रेखांकित किया जाए तो इसके लिए भी मणिपुरी साहित्य का निकट से अनुशीलन अपेक्षित है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि साहित्य का उद्देश्य कभी भी सामाजिक घृणा और प्रतिहिंसा का प्रचार करके समाज को विघटित करना नहीं हो सकता। बल्कि उसे सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। दलित साहित्य से भी मानवमात्र की यही अपेक्षा है। इसीलिए सामाजिक न्याय पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना की दृष्टि से दलित साहित्यकारों को मणिपुरी भाषा और साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन अवश्य करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि जातिविहीन समाज व्यवस्था का जीवंत मॉडल आज भी मणिपुरी समाज में व्यवहार में है जिसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में दलित साहित्य द्वारा उभारा जा सकता है और प्रतिपादित किया जा सकता है कि जाति उन्मूलन असंभव नहीं है।


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