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| 06.09.2007 |
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महादेवी वर्मा : जन्मशती संदर्भ
भारतीय चिंतन परंपरा और ‘सप्तपर्णा’ |
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महादेवी वर्मा (1907 ई.) का संपूर्ण साहित्य भारतीय सांस्कृतिक
चेतना से अनुप्राणित है। उनके गीतों में भारत के जातीय साहित्य
की परंपराओं की ध्वनियाँ सुनी जा सकती हैं। संस्कृत और पालि
भाषा के साहित्य के माध्यम से उन्होंने इस देश की चिंतन परंपरा
को आत्मसात करके ही अपने कवि व्यक्तित्व का निर्माण किया है।
मौलिक रचनाकार के अलावा उनका एक रूप सृजनात्मक अनुवादक का भी
है जिसके दर्शन उनकी अनुवाद-कृत ‘सप्तकर्णा’ (1960) में होते
हैं। अपनी सांस्कृतिक चेतना के सहारे उन्होंने वेद, रामायण,
थेर गाथा तथा अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव की कृतियों
से तादात्म्य स्थापित करके 39 चयनित महत्वपूर्ण अंशों का
हिन्दी काव्यानुवाद इस कृति में प्रस्तुत किया है। आरंभ में 61
पृष्ठीय ‘अपनी बात’ में उन्होंने भारतीय मनीषा और साहित्य की
इस अमूल्य धरोहर के संबंध में गहन शोधपूर्ण विमर्ष किया है जो
केवल स्त्री-लेखन को ही नहीं हिंदी के समग्र चिंतनपरक और ललित
लेखन को समृद्ध करता है। संस्कृति और साहित्य के परस्पर संबंध
की तार्किकता का प्रतिपादन करते हुए महादेवी कहती हैं कि एक
विशेष भू-खण्ड में जन्म और विकास पाने वाले मानव को अपनी धरती
से पार्थिव अस्तित्व ही नहीं प्राप्त होता, उसे अपने परिवेश से
विशेष बौद्धिक तथा रागात्मक सत्ता का दाय भी अनायास उपलब्ध हो
जाता है। इतना ही नहीं, वे तो यहाँ तक मानती हैं कि मनुष्य की
रागात्मक वृत्तियों का संघात ही उसके सौंदर्य-संवेदन, जीवन और
जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की
इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से संपृक्त कर अधिक विस्तार
देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है। जहाँ तक परिवर्तन का प्रश्न है, मनुष्य के पार्थिव परिवेश में भी निरंतर परिवर्तन होता रहता है और उसके जीवन में भी। जैसा कि महादेवी कहती हैं, जहाँ किसी युग में ऊँचे पर्वत थे, वहाँ आज गहरा समुद्र है और जहाँ आज अथाह सागर लहरा रहा है, वहाँ किसी भावी युग में दुर्लंघ्य पर्वत सिर उठा कर खड़ा हो सकता है। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन ने भी सफल-असफल संघर्षों के बीच जाग कर, सोकर, चलकर, बैठकर, यात्रा के असंख्य आयाम पार किए हैं। पर न किसी भौगोलिक परिवर्तन से धरती की पार्थिव एकसूत्रता खंडित हुई है, न परिवेश और जीवन की चिर नवीन स्थितियों में मनुष्य अतीत-बसेरों की स्मृति भूला है। यहाँ विचारणीय है कि हमारा विशाल देश, असंख्य परिवर्तन सँभालने वाली अखंड भौगोलिक पीठिका की दृष्टि से विशेष व्यक्तित्व रखता है। मनुष्य जाति के बौद्धिक और रागात्मक विकास ने उस पर जो अमिट चरणचिह्न छोड़े हैं, उन्होंने इसके सब ओर महिमा की विशेष परिधि खींच दी है। यह विशेष परिधि ही भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की द्योतक है। इसे दर्शन, धर्म और साहित्य के माध्यम से व्यक्त चिंतन परंपरा के रूप में भी देखा जा सकता है। इन तीनों में जहाँ दर्शन पूर्ण होने का दावा कर सकता है और धर्म अपने निर्भ्रांत होने की घोषणा कर सकता है, वहीं साहित्य मनुष्य की शक्ति-दुर्बलता, जय-पराजय, हास-अश्रु और जीवन-मृत्यु की कथा होने के कारण मनुष्य रूप में अवतरित होने पर स्वयं ईश्वर को भी पूर्ण मानना अस्वीकार कर सकता है। साहित्य की धारा सभ्यता के आदिकाल से प्रवाहित है तथा अनेक परिवर्तनों से गुजरकर अपनी क्षण-क्षण अभिनवता में जीवंत रहती है। जिस प्रकार नदी के एक होने का कारण उसका पुरातन जल नहीं, नवीन तरंगभंगिमा है, उसी प्रकार साहित्य भी निरंतर प्रवाहमान होने के कारण ही ताजगी से भरपूर है।
इस दृष्टि से भारतीय साहित्य की परीक्षा करने पर उसमें काल,
स्थिति,
जीवन,
समाज,
भाषा,
धर्म आदि से संबंध रखनेवाले अनंत परिवर्तनों की भीड़ में भी एक ऐसी
तारतम्यता मिलती है जिसके अभाव में किसी परिवर्तन की स्थिति संभव नहीं
रहती। महादेवी वर्मा ने इस तारतम्यता की खोज करते हुए माना है कि साहित्य
में संस्कृति की प्राचीनतम अभिव्यक्ति वेद-साहित्य के अतिरिक्त अन्य नहीं
है तथा सहस्रों वर्षों के व्यवधान के उपरांत भी भारतीय चिंतन,
अनुभूति,
सौंदर्यबोध और आस्था में उसके चिह्न अमिट हैं। वैदिक साहित्य में जल,
स्थल,
अंतरिक्ष,
आकाश आदि में व्याप्त शक्तियों की रूपात्मक अनुभूति और उनके रागात्मक
अभिनंदन में वे काव्य और कलाओं के विकास के संकेतों को निहित मानती हैं।
जैसे
रक्ताभ श्वेत अश्वों को जोते रथ में, इसमें संदेह नहीं कि भारतीय जीवन में स्थूल बौद्धिक प्रक्रिया से लेकर गंभीर रागात्मकता तक जो विशेषताएँ हैं, उनका तत्वतः अनुसंधान हमें किसी न किसी पथ से इस बृहत् जीवन-कोष के ही समीप पहुँचता है।
महादेवी जी,
वेद-साहित्य को धर्म-विशेष के परिचायक ग्रंथ-समूह के संकीर्ण अर्थ में नहीं
ग्रहण करतीं। उनके अनुसार उसमें न किसी धर्म-विशेष के संस्थापक के प्रवचनों
का संग्रह है और न किसी एक धर्म की आचार-पद्धति या मतवाद का प्रतिष्ठापन या
प्रतिपादन। वह तो अनेक युगों के अनेक तत्वचिंतक ज्ञानियों और क्रांतद्रष्टा
कवियों की स्वानुभूतियों का संघात है। समझने की बात यह है कि मनुष्य की
प्रज्ञा की जैसी विविधता और उसके हृदय की जैसी रागात्मक समृद्धि
वेद-साहित्य में प्राप्त है,
वह मनुष्य को न एकांगी दृष्टि दे सकती है न अंधविश्वास। इस साहित्य संपदा
के काल के संबंध में इतना तो तय है कि यह जिस रूप में हमें उपलब्ध है,
उस तक पहुँचने में वेदकालीन मनीषा को विशाल समय सागर पार करना पड़ा होगा।
महादेवी के इस तर्क में दम है कि भाषा,
छंद,
चित्रात्मक भाव,
गहन विचार-सरणि आदि से यह किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता कि वह जीवन का तुतला
उपक्रम है। वे इसे मानवता के तारुण्य का ऐसा उच्छल प्रपात मानती हैं जो
अपने दुर्वार वेग को रोकने वाली शिलाओं पर निर्मम आघात करता और मार्ग देने
वाली कोमल धरती को स्नेह से भेंटता हुआ आगे बढ़ता है। यह तारुण्य जीवन से
विरक्त नहीं होता,
संघर्ष से पराजय नहीं मानता,
प्रतिकूल परिस्थितियों से पराङ्मुख नहीं होता और कर्म को किसी कल्पित
स्वर्ग नरक का प्रवेशपत्र नहीं बनाता। उनके मतानुसार इस समस्त वैदिक चिंतन
के मूल में ऋत या उस सनातन नियम का बोध निहित है जिससे सृष्टि का समग्र
जड़-चेतन व्यापार नियमित और संचालित होता है।
चारों वेद,
ब्राह्मण ग्रंथ,
आरण्यक और उपनिषदों तक फैले वैदिक साहित्य के स्रष्टा ऋषि,
जो नियम सृष्टि को संचालित करते हैं,
उनके द्रष्टा मात्र हैं। इस साहित्य के अनुशीलन से पता चलता है कि वेद काल
का मानव भौतिक जीवन का भावुक कलाकार ही नहीं,
आत्मा का अथक शिल्पी भी है। प्रकृति में उसका सौंदर्य-दर्शन केवल कोमल मधुर
तत्वों तक ही सीमित नहीं है,
वरन् वह उग्र और रुद्र रूपों में भी आकर्षण का अनुभव करता है। यही कारण है
कि उषा सूक्त में उषा की दीप्त छवि अंकित करने में जिस कुशलता का उपयोग हुआ
है,
वही नासदीय सूक्त में जिज्ञासाओं को सार्थक वाणी दे सकी है। जिस भक्तिजनित
तन्मयता से ऋत् के रक्षक वरुण की वंदना की गई है,
उसी के साथ इंद्र के वज्र-निर्घोष का भी आह्वान किया गया है। वैदिक ऋषि
अपने आपको ‘पृथिवीपुत्र’
की संज्ञा देकर धरती के वरदानों को जैसा आदर देता है,
‘आत्मा का विनाश नहीं होता’
स्वीकार कर वह अखंड चेतना के प्रति भी वैसा ही विश्वास प्रकट करता है। इतना
ही नहीं,
किसी अन्य युग के काव्य में जिन्हें स्थान मिलना कठिन है,
उन विषयों को भी छंदायित करने में ऋषि की प्रतिभा कुंठित नहीं हुई। उलूक,
दादुर,
ऊखल,
श्वान आदि ऐसे ही विषय है।
वैदिक साहित्य में प्रकृति के दैवीकरण की व्याख्या करते हुए महादेवी कहती
हैं कि सूर्य,
उषा,
वरुण आदि आकाश में सबसे ऊँची स्थिति रखने के कारण सृष्टि का नियमन और
संचालन करते हैं। दूसरी ओर वायुमंडल में स्थिति रखनेवाले इंद्र,
मरुत आदि उथल-पुथल उत्पन्न करके भी जल-वृष्टि से पृथ्वी को उर्वर बनाते
हैं। इनके साथ ही,
अग्नि और सोम की पृथ्वी पर इतनी उपयोगी स्थिति थी कि वे पृथ्वी के ही देव
मान लिए गए। यथा,
अग्नि और पृथ्वी की ये स्तुतियाँ अत्यंत अर्थपूर्ण हैं -
छूट
धनुष से फैल गये,
तेरा जो शुभ गंध मिला औषधि,
जल-कण में,
भारतीय चिंतन परंपरा के सूत्रों को जोड़ते हुए कहा जा सकता है कि
वेद-साहित्य की चिंतन-पद्धति ने यदि भारतीय चिंतन को दिशा-ज्ञान दिया है तो
उसकी रागात्मक अनुभूति ने भावी युगों की काव्य-कलाओं में स्पंदन जगाया है।
प्रकृति से रागात्मक संबंध,
उस पर चेतन व्यक्तित्व का आरोप,
रहस्य को व्यक्त करनेवाली जटिल उक्तियाँ,
भक्तिजनित आत्म-निवेदन आदि बिना कोई संस्कार छोड़े हुए अंतर्हित हो गए,
यह समझना मानव-चेतना की संश्लिष्टता पर अविश्वास करना होगा। रात्रि को भी
वैदिक ऋषि ने माता के रूप में संबोधित किया है -
माता रात्रि! सौंप जाना तू
वेद काल के पट-परिवर्तन पर महादेवी की दृष्टि जिस कवि-मनीषी और उसकी कृति
पर सबसे पहले पड़ी है,
उन्हें भारतीय प्रतिभा ने आदिकवि और आदिकाव्य की सार्थक संज्ञा दी है।
सभ्यता की यात्रा में जब नरमेध,
गोमेध,
अश्वमेध आदि के महारव से भरे हुए,
हमारे कर्णरंध्रों में क्षुद्र क्रौंच की दीन क्रंदन-ध्वनि प्रवेश पा लेती
है,
तब हम चौंक उठते हैं। यह लौकिक काव्य के प्रजनन का क्षण है। निस्संदेह
वाल्मीकि की यथार्थवादी,
मर्मभेदी दृष्टि वेदकालीन ऋषि की दृष्टि से भी भिन्न है और मध्ययुगीन भक्त
की दृष्टि से भी,
क्योंकि सामान्यतः एक में जीवन के विविध अभावों की पूर्ति के लिए देव या
देव-समूह की प्रसन्नता की अपेक्षा रहती है तो दूसरी में भवसागर-संतरण के
लिए इष्ट के अनुग्रह की याचना। इन दोनों से स्वतंत्र,
वाल्मीकि की चेतना मनुष्य की विजय-घोषणा के लिए एक ऐसे श्रेष्ठ मानव की
उद्भावना करती है,
जिससे अपने लिए उसे किसी लौकिक या पारलौकिक दान की न अपेक्षा है,
न आवश्यकता।
महादेवी ने इस बात पर भी पर्याप्त बल दिया है कि वाल्मीकि वैदिक ऋषियों के
समान कुल-परंपरा से ऋषि नहीं थे,
बल्कि अपने दृढ़ संकल्प और उसके अनुरूप कठोर साधना से ही उन्होंने ऋषित्व की
प्राप्ति की। इसका अर्थ है कि राम का चरित्र जिस धातु से बना है उसी से राम
कथा के कवि का भी निर्माण हुआ होगा। तभी तो उनके राम यह कह सके -
बंधु
हों मेरे सुखी
इतना ही नहीं,
महादेवी ने यह भी लक्षित किया है कि विद्रोही आदिकवि की करुणार्द्र दृष्टि
के आकर्षण से उषा,
मरुत् आदि के दिव्य रूपों में आकाशचारिणी प्रकृति अपने धूलि के देश और
तृणों के कुटीर में लौट आई। जिससे महाकाव्य के अंग के रूप में
प्रकृति-वर्णन,
ऋतु-वर्णन आदि की परंपरा का सूत्रपात हुआ। हेमंत ऋतु का वर्णन करते हुए कवि
की उत्प्रेक्षा द्रष्टव्य है -
दक्षिण दिशिचारी रवि से -
काव्य की दृष्टि से आदिकवि के उत्तराधिकारियों में अश्वघोष और कालिदास को
प्रमुख माना जाता है,
परंतु जैसा कि महादेवी वर्मा ने बताया है,
आदिकाव्य और उक्त महाकवियों की रचनाओं के बीच में बौद्धधर्म विषयक पालि
वाङ्मय का इतना विस्तार है जिसे पार किए बिना हम उन तक नहीं पहुँच सकते।
महादेवी ने प्राचीन साहित्य का अनुशीलन सर्वथा धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से करते
हुए यह प्रतिपादित किया है कि भाषा,
धर्म-सिद्धांत आदि की दृष्टि से भिन्न होने पर भी पालि वाङ्मय,
अपनी आत्मा में भारतीय होने के कारण,
भारतीय साहित्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण आयाम है।
पालि वाङ्मय के अंतर्गत त्रिपिटक में बौद्ध धर्म संबंधी साहित्य की
विषय-क्रमानुसार तीन मंजूषाएँ संगृहीत है - विनयपिटक,
सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। इनमें साहित्य की दृष्टि से सुत्तपिटक को ही
महादेवी ने सर्वसाधारण के लिए महत्वपूर्ण माना है,
क्योंकि उसमें धम्मपद,
जातक कथाएँ,
थेर-थेरी गाथाएँ जैसी कृतियाँ शामिल हैं,
जिनके अभाव में हमारे साहित्य का इतिहास अधूरा रह जाता है। महादेवी जी याद
दिलाती हैं कि हमारा साहित्य गीत की दृष्टि से विशेष समृद्ध रहा है तथा
वीतराग भिक्षु-भिक्षुणियों के ये गीत हमारी अटूट गीत-परंपरा की उज्ज्वल
कड़ियाँ हैं। उन्होंने विस्तार से इस तथ्य को उभारा है कि इन थेर गाथाओं में
मुखर हो उठने वाले हृदय कितने विविध हैं!
कोई राजकुमार है कोई दासीपुत्र,
कोई ब्राह्मण है कोई शूद्र,
कोई साध्वी है कोई नगरवधू,
कोई महिषी है और कोई क्रीत सेविका। कोई प्रिय पत्नी से वियुक्त है,
कोई माता पिता से। कोई विलास-वैभव की एकरसता से थक कर आया है,
कोई कठोर परिश्रम की विविध चोटों से आहत होकर। सारांश यह कि विविध वर्ण,
परिवार और परिस्थितियों के भुक्तभोग इन छंदों में अपनी कथाएँ गूँथते हैं।
अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने के कारण इन भिक्षुओं के गीतों में स्वानुभूतिजन्य
वैविध्य मिलता है। उदाहरण के लिए जो राज्य-सुख छोड़कर आया है वह अपरिग्रह को
अधिक महत्व देता है,
जो कठोर श्रम करके आया है वह श्रमिक जीवन की वेदना के विषय में अधिक कहता
है। जो उच्च वर्ण से संबद्ध है वह ज्ञान और तप की विशेषता की चर्चा अधिक
करता है,
जो शूद्र कुल से आया है वह समानता को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। जो दास रह
चुका है वह मुक्ति की अधिक प्रशस्ति करता है,
जो स्वामी रह चुका है वह पर-पीड़न की अधिक निंदा करता है। इसीलिए महादेवी ने
माना है कि इन गाथाओं में हमें तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
का जैसा परिचय और उसमें पोषित मानव-जीवन का जैसा चित्र प्राप्त होता है,
वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। वे यह भी बताती हैं कि जिन भिक्षु-भिक्षुणियों के
गीत उपलब्ध हैं,
उनकी संख्या क्रमशः २६५ और ७३ के लगभग है। कतिपय उदाहरण :
पर्वत
की सरिता को तजकर,
नव किशलय दल से युक्त द्रुमाली |