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05.23.2017
 

महादेवी वर्मा : जन्मशती संदर्भ

भारतीय चिंतन परंपरा और ‘सप्तपर्णा’
डॉ.ऋषभदेव शर्मा


महादेवी वर्मा (1907 ई.) का संपूर्ण साहित्य भारतीय सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित है। उनके गीतों में भारत के जातीय साहित्य की परंपराओं की ध्वनियाँ सुनी जा सकती हैं। संस्कृत और पालि भाषा के साहित्य के माध्यम से उन्होंने इस देश की चिंतन परंपरा को आत्मसात करके ही अपने कवि व्यक्तित्व का निर्माण किया है। मौलिक रचनाकार के अलावा उनका एक रूप सृजनात्मक अनुवादक का भी है जिसके दर्शन उनकी अनुवाद-कृत ‘सप्तकर्णा’ (1960) में होते हैं। अपनी सांस्कृतिक चेतना के सहारे उन्होंने वेद, रामायण, थेर गाथा तथा अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव की कृतियों से तादात्म्य स्थापित करके 39 चयनित महत्वपूर्ण अंशों का हिन्दी काव्यानुवाद इस कृति में प्रस्तुत किया है। आरंभ में 61 पृष्ठीय ‘अपनी बात’ में उन्होंने भारतीय मनीषा और साहित्य की इस अमूल्य धरोहर के संबंध में गहन शोधपूर्ण विमर्ष किया है जो केवल स्त्री-लेखन को ही नहीं हिंदी के समग्र चिंतनपरक और ललित लेखन को समृद्ध करता है। संस्कृति और साहित्य के परस्पर संबंध की तार्किकता का प्रतिपादन करते हुए महादेवी कहती हैं कि एक विशेष भू-खण्ड में जन्म और विकास पाने वाले मानव को अपनी धरती से पार्थिव अस्तित्व ही नहीं प्राप्त होता, उसे अपने परिवेश से विशेष बौद्धिक तथा रागात्मक सत्ता का दाय भी अनायास उपलब्ध हो जाता है। इतना ही नहीं, वे तो यहाँ तक मानती हैं कि मनुष्य की रागात्मक वृत्तियों का संघात ही उसके सौंदर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से संपृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।

जहाँ तक परिवर्तन का प्रश्न है, मनुष्य के पार्थिव परिवेश में भी निरंतर परिवर्तन होता रहता है और उसके जीवन में भी। जैसा कि महादेवी कहती हैं, जहाँ किसी युग में ऊँचे पर्वत थे, वहाँ आज गहरा समुद्र है और जहाँ आज अथाह सागर लहरा रहा है, वहाँ किसी भावी युग में दुर्लंघ्य पर्वत सिर उठा कर खड़ा हो सकता है। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन ने भी सफल-असफल संघर्षों के बीच जाग कर, सोकर, चलकर, बैठकर, यात्रा के असंख्य आयाम पार किए हैं। पर न किसी भौगोलिक परिवर्तन से धरती की पार्थिव एकसूत्रता खंडित हुई है, न परिवेश और जीवन की चिर नवीन स्थितियों में मनुष्य अतीत-बसेरों की स्मृति भूला है।

यहाँ विचारणीय है कि हमारा विशाल देश, असंख्य परिवर्तन सँभालने वाली अखंड भौगोलिक पीठिका की दृष्टि से विशेष व्यक्तित्व रखता है। मनुष्य जाति के बौद्धिक और रागात्मक विकास ने उस पर जो अमिट चरणचिह्न छोड़े हैं, उन्होंने इसके सब ओर महिमा की विशेष परिधि खींच दी है। यह विशेष परिधि ही भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की द्योतक है। इसे दर्शन, धर्म और साहित्य के माध्यम से व्यक्त चिंतन परंपरा के रूप में भी देखा जा सकता है। इन तीनों में जहाँ दर्शन पूर्ण होने का दावा कर सकता है और धर्म अपने निर्भ्रांत होने की घोषणा कर सकता है, वहीं साहित्य मनुष्य की शक्ति-दुर्बलता, जय-पराजय, हास-अश्रु और जीवन-मृत्यु की कथा होने के कारण मनुष्य रूप में अवतरित होने पर स्वयं ईश्वर को भी पूर्ण मानना अस्वीकार कर सकता है। साहित्य की धारा सभ्यता के आदिकाल से प्रवाहित है तथा अनेक परिवर्तनों से गुजरकर अपनी क्षण-क्षण अभिनवता में जीवंत रहती है। जिस प्रकार नदी के एक होने का कारण उसका पुरातन जल नहीं, नवीन तरंगभंगिमा है, उसी प्रकार  साहित्य भी निरंतर प्रवाहमान होने के कारण ही ताजगी से भरपूर है।

     इस दृष्टि से भारतीय साहित्य की परीक्षा करने पर उसमें काल, स्थिति, जीवन, समाज, भाषा, धर्म आदि से संबंध रखनेवाले अनंत परिवर्तनों की भीड़ में भी एक ऐसी तारतम्यता मिलती है जिसके अभाव में किसी परिवर्तन की स्थिति संभव नहीं रहती। महादेवी वर्मा ने इस तारतम्यता की खोज करते हुए माना है कि साहित्य में संस्कृति की प्राचीनतम अभिव्यक्ति वेद-साहित्य के अतिरिक्त अन्य नहीं है तथा सहस्रों वर्षों के व्यवधान के उपरांत भी भारतीय चिंतन, अनुभूति, सौंदर्यबोध और आस्था में उसके चिह्न अमिट हैं। वैदिक साहित्य में जल, स्थल, अंतरिक्ष, आकाश आदि में व्याप्त शक्तियों की रूपात्मक अनुभूति और उनके रागात्मक अभिनंदन में वे काव्य और कलाओं के विकास के संकेतों को निहित मानती हैं। जैसे

     रक्ताभ श्वेत अश्वों को जोते रथ में,
               
प्राची की तन्वी आई नभ के पथ में,
               
गृह गृह पावक पग पग किरणों से रंजित!
               
आ रही उषा ज्योतिःस्मित!                    (ऋग्वेद)

इसमें संदेह नहीं कि भारतीय जीवन में स्थूल बौद्धिक प्रक्रिया से लेकर गंभीर रागात्मकता तक जो विशेषताएँ हैं, उनका तत्वतः अनुसंधान हमें किसी न किसी पथ से इस बृहत् जीवन-कोष के ही समीप पहुँचता है।

महादेवी जी, वेद-साहित्य को धर्म-विशेष के परिचायक ग्रंथ-समूह के संकीर्ण अर्थ में नहीं ग्रहण करतीं। उनके अनुसार उसमें न किसी धर्म-विशेष के संस्थापक के प्रवचनों का संग्रह है और न किसी एक धर्म की आचार-पद्धति या मतवाद का प्रतिष्ठापन या प्रतिपादन। वह तो अनेक युगों के अनेक तत्वचिंतक ज्ञानियों और क्रांतद्रष्टा कवियों की स्वानुभूतियों का संघात है। समझने की बात यह है कि मनुष्य की प्रज्ञा की जैसी विविधता और उसके हृदय की जैसी रागात्मक समृद्धि वेद-साहित्य में प्राप्त है, वह मनुष्य को न एकांगी दृष्टि दे सकती है न अंधविश्वास। इस साहित्य संपदा के काल के संबंध में इतना तो तय है कि यह जिस रूप में हमें उपलब्ध है, उस तक पहुँचने में वेदकालीन मनीषा को विशाल समय सागर पार करना पड़ा होगा। महादेवी के इस तर्क में दम है कि भाषा, छंद, चित्रात्मक भाव, गहन विचार-सरणि आदि से यह किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता कि वह जीवन का तुतला उपक्रम है। वे इसे मानवता के तारुण्य का ऐसा उच्छल प्रपात मानती हैं जो अपने दुर्वार वेग को रोकने वाली शिलाओं पर निर्मम आघात करता और मार्ग देने वाली कोमल धरती को स्नेह से भेंटता हुआ आगे बढ़ता है। यह तारुण्य जीवन से विरक्त नहीं होता, संघर्ष से पराजय नहीं मानता, प्रतिकूल परिस्थितियों से पराङ्मुख नहीं होता और कर्म को किसी कल्पित स्वर्ग नरक का प्रवेशपत्र नहीं बनाता। उनके मतानुसार इस समस्त वैदिक चिंतन के मूल में ऋत या उस सनातन नियम का बोध निहित है जिससे सृष्टि का समग्र जड़-चेतन व्यापार नियमित और संचालित होता है।

     चारों वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषदों तक फैले वैदिक साहित्य के स्रष्टा ऋषि, जो नियम सृष्टि को संचालित करते हैं, उनके द्रष्टा मात्र हैं। इस साहित्य के अनुशीलन से पता चलता है कि वेद काल का मानव भौतिक जीवन का भावुक कलाकार ही नहीं, आत्मा का अथक शिल्पी भी है। प्रकृति में उसका सौंदर्य-दर्शन केवल कोमल मधुर तत्वों तक ही सीमित नहीं है, वरन् वह उग्र और रुद्र रूपों में भी आकर्षण का अनुभव करता है। यही कारण है कि उषा सूक्त में उषा की दीप्त छवि अंकित करने में जिस कुशलता का उपयोग हुआ है, वही नासदीय सूक्त में जिज्ञासाओं को सार्थक वाणी दे सकी है। जिस भक्तिजनित तन्मयता से ऋत् के रक्षक वरुण की वंदना की गई है, उसी के साथ इंद्र के वज्र-निर्घोष का भी आह्वान किया गया है। वैदिक ऋषि अपने आपको ‘पृथिवीपुत्र की संज्ञा देकर धरती के वरदानों को जैसा आदर देता है, ‘आत्मा का विनाश नहीं होता स्वीकार कर वह अखंड चेतना के प्रति भी वैसा ही विश्वास प्रकट करता है। इतना ही नहीं, किसी अन्य युग के काव्य में जिन्हें स्थान मिलना कठिन है, उन विषयों को भी छंदायित करने में ऋषि की प्रतिभा कुंठित नहीं हुई। उलूक, दादुर, ऊखल, श्वान आदि ऐसे ही विषय है।

     वैदिक साहित्य में प्रकृति के दैवीकरण की व्याख्या करते हुए महादेवी कहती हैं कि सूर्य, उषा, वरुण आदि आकाश में सबसे ऊँची स्थिति रखने के कारण सृष्टि का नियमन और संचालन करते हैं। दूसरी ओर वायुमंडल में स्थिति रखनेवाले इंद्र, मरुत आदि उथल-पुथल उत्पन्न करके भी जल-वृष्टि से पृथ्वी को उर्वर बनाते हैं। इनके साथ ही, अग्नि और सोम की पृथ्वी पर इतनी उपयोगी स्थिति थी कि वे पृथ्वी के ही देव मान लिए गए। यथा, अग्नि और पृथ्वी की ये स्तुतियाँ अत्यंत अर्थपूर्ण हैं -

           छूट धनुष से फैल गये,
               
जैसे दिशि दिशि में बाण,
          
त्यों फैले स्फलिंग तुम्हारे,
               
अहे अर्चि - संधान!                    (ऋग्वेद)

            अक्षय जल अक्षय होने के हित लाये हम,
          
अमर अग्नि के साथ अजर गृह में आये हम!।          (अथर्ववेद)

तेरा जो शुभ गंध मिला औषधि, जल-कण में,
          
अप्सरियाँ गंधर्व जिसे रखते निज तन में,
          
उस सौरभ से गात हमारा तू सुरभित कर,
          
पड़े किसी की द्वेष-दृष्टि ओ जननि न हम पर।     (अथर्ववेद)

     भारतीय चिंतन परंपरा के सूत्रों को जोड़ते हुए कहा जा सकता है कि वेद-साहित्य की चिंतन-पद्धति ने यदि भारतीय चिंतन को दिशा-ज्ञान दिया है तो उसकी रागात्मक अनुभूति ने भावी युगों की काव्य-कलाओं में स्पंदन जगाया है। प्रकृति से रागात्मक संबंध, उस पर चेतन व्यक्तित्व का आरोप, रहस्य को व्यक्त करनेवाली जटिल उक्तियाँ, भक्तिजनित आत्म-निवेदन आदि बिना कोई संस्कार छोड़े हुए अंतर्हित हो गए, यह समझना मानव-चेतना की संश्लिष्टता पर अविश्वास करना होगा। रात्रि को भी वैदिक ऋषि ने माता के रूप में संबोधित किया है -

           माता रात्रि! सौंप जाना तू
               
हमें उषा के संरक्षण में,
          
उषा हमें फिर, तुझे सौंप दे
               
संध्या समय विदा के क्षण में!                  (अथर्ववेद)

     वेद काल के पट-परिवर्तन पर महादेवी की दृष्टि जिस कवि-मनीषी और उसकी कृति पर सबसे पहले पड़ी है, उन्हें भारतीय प्रतिभा ने आदिकवि और आदिकाव्य की सार्थक संज्ञा दी है। सभ्यता की यात्रा में जब नरमेध, गोमेध, अश्वमेध आदि के महारव से भरे हुए, हमारे कर्णरंध्रों में क्षुद्र क्रौंच की दीन क्रंदन-ध्वनि प्रवेश पा लेती है, तब हम चौंक उठते हैं। यह लौकिक काव्य के प्रजनन का क्षण है। निस्संदेह वाल्मीकि की यथार्थवादी, मर्मभेदी दृष्टि वेदकालीन ऋषि की दृष्टि से भी भिन्न है और मध्ययुगीन भक्त की दृष्टि से भी, क्योंकि सामान्यतः एक में जीवन के विविध अभावों की पूर्ति के लिए देव या देव-समूह की प्रसन्नता की अपेक्षा रहती है तो दूसरी में भवसागर-संतरण के लिए इष्ट के अनुग्रह की याचना। इन दोनों से स्वतंत्र, वाल्मीकि की चेतना मनुष्य की विजय-घोषणा के लिए एक ऐसे श्रेष्ठ मानव की उद्भावना करती है, जिससे अपने लिए उसे किसी लौकिक या पारलौकिक दान की न अपेक्षा है, न आवश्यकता।

     महादेवी ने इस बात पर भी पर्याप्त बल दिया है कि वाल्मीकि वैदिक ऋषियों के समान कुल-परंपरा से ऋषि नहीं थे, बल्कि अपने दृढ़ संकल्प और उसके अनुरूप कठोर साधना से ही उन्होंने ऋषित्व की प्राप्ति की। इसका अर्थ है कि राम का चरित्र जिस धातु से बना है उसी से राम कथा के कवि का भी निर्माण हुआ होगा। तभी तो उनके राम यह कह सके -

                बंधु हों मेरे सुखी
                    
हो क्षेम-मंगल-योग
               
शपथ आयुष की
                    
यही बस राज्य का उपयोग।        (भरत-मिलन/रामायण)

इतना ही नहीं, महादेवी ने यह भी लक्षित किया है कि विद्रोही आदिकवि की करुणार्द्र दृष्टि के आकर्षण से उषा, मरुत् आदि के दिव्य रूपों में आकाशचारिणी प्रकृति अपने धूलि के देश और तृणों के कुटीर में लौट आई। जिससे महाकाव्य के अंग के रूप में प्रकृति-वर्णन, ऋतु-वर्णन आदि की परंपरा का सूत्रपात हुआ। हेमंत ऋतु का वर्णन करते हुए कवि की उत्प्रेक्षा द्रष्टव्य है -

                दक्षिण दिशिचारी रवि से -
                    
है उत्तर दिशा विहीन,
               
तिलकहीन बाला सी उसकी
                    
हुई कांति छविहीन।              (हेमंत वर्णन/रामायण)

     काव्य की दृष्टि से आदिकवि के उत्तराधिकारियों में अश्वघोष और कालिदास को प्रमुख माना जाता है, परंतु जैसा कि महादेवी वर्मा ने बताया है, आदिकाव्य और उक्त महाकवियों की रचनाओं के बीच में बौद्धधर्म विषयक पालि वाङ्मय का इतना विस्तार है जिसे पार किए बिना हम उन तक नहीं पहुँच सकते। महादेवी ने प्राचीन साहित्य का अनुशीलन सर्वथा धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि भाषा, धर्म-सिद्धांत आदि की दृष्टि से भिन्न होने पर भी पालि वाङ्मय, अपनी आत्मा में भारतीय होने के कारण, भारतीय साहित्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण आयाम है।

     पालि वाङ्मय के अंतर्गत त्रिपिटक में बौद्ध धर्म संबंधी साहित्य की विषय-क्रमानुसार तीन मंजूषाएँ संगृहीत है - विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। इनमें साहित्य की दृष्टि से सुत्तपिटक को ही महादेवी ने सर्वसाधारण के लिए महत्वपूर्ण माना है, क्योंकि उसमें धम्मपद, जातक कथाएँ, थेर-थेरी गाथाएँ जैसी कृतियाँ शामिल हैं, जिनके अभाव में हमारे साहित्य का इतिहास अधूरा रह जाता है। महादेवी जी याद दिलाती हैं कि हमारा साहित्य गीत की दृष्टि से विशेष समृद्ध रहा है तथा वीतराग भिक्षु-भिक्षुणियों के ये गीत हमारी अटूट गीत-परंपरा की उज्ज्वल कड़ियाँ हैं। उन्होंने विस्तार से इस तथ्य को उभारा है कि इन थेर गाथाओं में मुखर हो उठने वाले हृदय कितने विविध हैं!  कोई राजकुमार है कोई दासीपुत्र, कोई ब्राह्मण है कोई शूद्र, कोई साध्वी है कोई नगरवधू, कोई महिषी है और कोई क्रीत सेविका। कोई प्रिय पत्नी से वियुक्त है, कोई माता पिता से। कोई विलास-वैभव की एकरसता से थक कर आया है, कोई कठोर परिश्रम की विविध चोटों से आहत होकर। सारांश यह कि विविध वर्ण, परिवार और परिस्थितियों के भुक्तभोग इन छंदों में अपनी कथाएँ गूँथते हैं। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने के कारण इन भिक्षुओं के गीतों में स्वानुभूतिजन्य वैविध्य मिलता है। उदाहरण के लिए जो राज्य-सुख छोड़कर आया है वह अपरिग्रह को अधिक महत्व देता है, जो कठोर श्रम करके आया है वह श्रमिक जीवन की वेदना के विषय में अधिक कहता है। जो उच्च वर्ण से संबद्ध है वह ज्ञान और तप की विशेषता की चर्चा अधिक करता है, जो शूद्र कुल से आया है वह समानता को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। जो दास रह चुका है वह मुक्ति की अधिक प्रशस्ति करता है, जो स्वामी रह चुका है वह पर-पीड़न की अधिक निंदा करता है। इसीलिए महादेवी ने माना है कि इन गाथाओं में हमें तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का जैसा परिचय और उसमें पोषित मानव-जीवन का जैसा चित्र प्राप्त होता है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। वे यह भी बताती हैं कि जिन भिक्षु-भिक्षुणियों के गीत उपलब्ध हैं, उनकी संख्या क्रमशः २६५ और ७३ के लगभग है। कतिपय उदाहरण :

                पर्वत की सरिता को तजकर,
                    
आज नहीं अवसर प्रवास का,
               
रम्य यहीं है वास क्षेमकर,
                    
क्षेम मयी यह नदी सुहाती!        (धम्मिको थेरो)

                नव किशलय दल से युक्त द्रुमाली
                    
लगती है अंगार - अरुण,
               
इन तरुओं ने अब त्याग दिये,
                    
वे जीर्ण पत्र के शीर्ण वसन।
                    
कोपलें लाल सी अगणित ले
                    
ये अर्चिष्मान हुए भासित!         (दसनिपात)

                पुष्ट उन्नत यह मेरा वक्ष
                    
कभी था सुगठित और सुगोल,
               
जलरहित चर्म-थैलियों तुल्य
                    
जरा से है अवनत बेडौल।
                          
सत्यवादी के मृषा न बोल।  (अंबपाली)

     सांस्कृतिक चिंतन प्रवाह में इस साहित्य की महत्ता का मूल्यांकन करने के लिए यह तथ्य काफी है कि स्तुतिपरक और दिव्यज्ञानसंभूत वेद-गीतों से ये गीत सर्वथा भिन्न प्रतीत होते हैं, परंतु ज्ञान की महिमा, जीवन की यथार्थ पृष्ठभूमि के संगीत तथा प्रकृति के प्रति रागात्मकता के कारण ये तत्वतः वेदगीतों के निकट पहुँचते हैं, अतः ये भी एक ही मूल भावधारा के विकास के सोपान हैं। भारतीय प्रतिभा प्रकृति के प्रति सनातन रागमयी है, इसका निश्चित प्रमाण इन वीतराग भिक्षुओं की गाथाएँ हैं। वेदकालीन कवि ऋषि तो प्रकृति के प्रति साधिकार राग रखता है, क्योंकि वह उसे माया या भ्रांति नहीं मानता। जीवन के दुःखमय दर्शन की न उसने खोज की है और न उस दुःख से मुक्ति की कामना उसकी जानी पहचानी हैं।  इसके विपरीत बौद्ध भिक्षु सौंदर्य को नश्वर और भ्रांति मानता है। उसके निकट जीवन दुःख का दूसरा नाम है। न वह मधुर संगीत पर मुग्ध होने का अधिकार रखता है, न सुंदर चित्र की रंगरेखाओं में स्वयं को भुला सकता है। परंतु इन गीतों को देखने से पता चलता है कि प्रकृति ने उसकी समस्त साधना पर विजय पा ली - संभवतः उसके अनजाने ही।

     इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि कुशल संगीतज्ञ, कवि, दार्शनिक और महायान के प्रवर्तकों में महत्वपूर्ण स्थिति रखने वाले अश्वघोष संस्कृत महाकाव्यकारों में प्रथम भक्त कवि हैं, जिनके निकट उनका कथानायक लोकोत्तर ही नहीं, एकमात्र उपास्य भी है। तुलनात्मक अनुशीलन करते हुए महादेवी ने दिखाया है कि आदिकवि को राम के लोकोत्तर गुणों ने आकर्षित अवश्य किया था, किंतु वे राम के अनन्य भक्त नहीं हैं तथा कालिदास की विस्तृत काव्य-चित्रशाला में भी ऐसा कोई पात्र नहीं मिलता जिसे कवि का एकमात्र इष्ट कहा जा सके। परंतु अश्वघोष (ई. पू. पहली शती) के बुद्ध कथानायक भी हैं और उपास्य भी। उनकी साहित्यिक कृतियों के रूप में बुद्धचरित, सौंदरनंद (दो महाकाव्य) और सारिपुत्र प्रकरण के कुछ अंश उपलब्ध हैं।सप्तपर्णा में सम्मिलित अश्वघोष की कुछ काव्य पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना उचित होगा। यथा -

           आज उज्ज्वल तिलक -
               
द्रुम को भेंट कर यह
          
पीतवर्ण रसाल -
               
शाखा यों सुशोभित,
          
शुभ्र वेशी पुरुष के
               
ज्यों संग नारी
          
पीत केसर - अंग -
               
रागों से प्रसाधित।              (वसंत वर्णन/बुद्धचरित)

तेजकांति से युक्त वपुष को
               
देख देख कर वे महिला जन,
          
‘इसकी भार्या धन्य हुई है
               
कहती थीं, पर शुद्ध-भाव-मन।                  (बुद्धचरित) 

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि अश्वघोष के पास कवि का संवेदनशील हृदय भी है और संसार को दुःखात्मक और त्याज्य माननेवाला दर्शन भी।

 

अश्वघोष के बाद सप्तपर्णा में कालिदास को ऐसे व्यक्तित्व के रूप में देखा गया है जिसे भारत की वाग्देवता संचारिणी दीपशिखा के समान उद्भासित करके फिर अतीत के अंधकार में नहीं छोड़ जा सकी। उनके काव्यों की चमत्कारिक असाधारणता पर मुग्ध लोक, मानो अपने विस्मय को व्यक्त करने के लिए ही उनपर चरम मूर्खता का आरोप करने में भी कुंठित नहीं हुआ। सत्य न होते हुए भी ऐसी किंवदंतियाँ उनकी लोकोत्तर प्रतिभा की स्वीकृति-मात्र हैं। ऐतिहासिक परिस्थतियों की विवेचना से पता चलता है कि कालिदास के समय (चौथी शताब्दी के आसपास) तक भारतीय जीवन और समाज में एक स्थिर सौंदर्य आ चुका था। महाभारत काल की चरम स्वच्छंदता और उसकी चरम ध्वंस में परिणति, बौद्ध युग का चरम बंधन और वज्रयान में उसकी चरम मुक्ति के शिखर और गर्त पार करके जीवन-प्रवाह समतल भूमि पर आ गया था और यह सत्य है कि समतल पर मंथर जल का एक प्रशांत उदार सौंदर्य होता है। इसीलिए हम देख सकते हैं कि कालिदास ने जीवन की गतिशीलता के मर्म और उसके विविध सौंदर्य की अनुभूति ही नहीं प्राप्त की, उस अनुभूति के सत्य को, राग-रस-रंगमयी वाणी भी दी। इनकी कृतियों में मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञान शाकुंतल (तीन नाटक) तथा ऋतुसंहार, मेघदूत, कुमारसंभव और रघुवंश (चार काव्य) उपलब्ध हैं। द्रष्टव्य है कि कालिदास में विद्रोह का स्वर नहीं है, वे केवल सौंदर्य और विलास के कवि हैं। इसका कारण बताते हुए महादेवी ने कहा है कि कालिदास का समय निर्माण का युग था। विद्रोह के स्वर की न कवि को आवश्यकता थी, न समाज को। वे आगे स्पष्ट करती हैं कि कालिदास सौंदर्य और प्रेम के अमर गायक हैं, किंतु उनकी कृतियों में व्यक्त सौंदर्य और प्रेम के द्वंद्व को किसी प्रचलित रूढ़भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वे मानती हैं कि चमत्कारिक बाह्य रंग-रेखाओं में व्यक्त सौंदर्य, जिसका परिचय मोहमुग्ध कर देता है, कवि का लक्ष्य नहीं, क्योंकि वह असाधारण सौंदर्य तब तक बार-बार असफल होता रहता है, जब तक उसकी असाधारण तथा अपरिचित रेखाएँ साधारण और परिचित नहीं हो जातीं और उनमें जीवन के तरल-करुण रंग नहीं छलकने लगते। इन तरल-करुण रंगों के सहारे कालिदास सीधे वाल्मीकि के सौंदर्यबोध की परंपरा से जुड़ जाते हैं।

इसी प्रकार वैदिक साहित्य से ही हम देख सकते हैं कि भारतीय काव्य में प्रकृति के उपासकों की परंपरा अविच्छिन्न और दीर्घ है। किंतु उस परंपरा में कालिदास की, अर्चना ही नहीं, देवता-विग्रह की भावना भी विशिष्ट है। उनके निकट मानव, पशु, पक्षी, नदी, निर्झर, पर्वत, शाद्वल आदि में ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी उपेक्षा की जा सके। ‘हिमालय तो खैर पार्वती के जनक हैं, इसलिए उनके प्रति कवि का विशेष लगाव है -

           जब मस्तक खुजलाते हैं गज,
          
देवदारु से संघर्षणरत,
          
उनसे बहकर क्षीर सुरभिमय
          
कर देता शिखरों को सुरभित।                  (कुमारसंभव)

     यहीं यह भी याद करना जरूरी है कि कालिदास की उपमाओं की विशेषता प्रख्यात है, किंतु इस विशेषता के मूल में कोई चमत्कार न होकर जीवन और प्रकृति के विविध रूपों में व्याप्त एकता की अनुभूति  ही निहित है। महादेवी के अनुसार तो वस्तुतः चमत्कार का अभाव ही कालिदास की कृतियों का चमत्कार है। उनकी कृतियों में न तो जीवन असामान्य है न प्रकृति, परंतु कवि के जिस दृष्टिबिंदु पर इनका सम्मिलन होता है, वही चमत्कारिक रंगों में प्रतिफलित हो उठता है। रघुवंश और ‘अभिज्ञान शाकुंतल के कुछ भावपूर्ण स्थल इस संदर्भ में द्रष्टव्य हैं-

           पाला था अपत्य सम जिसको
               
ऋषि-वधुओं ने दे नीवार,
          
खड़ा हुआ था वही हरिण-दल
               
रूँधे पर्णकुटी के द्वार।
          
थालों में जल पीने वाले
               
खग शंका से हों न अधीर,
          
हट जाती थीं मुनि-कन्याएँ
               
दे कर त्वरित् द्रुमों में नीर।              (रघुवंश)

'सुमन के भी स्पर्श से जब
               
प्राण तन को छोड़ जाता,
          
मारने के हित न साधन
               
कौन सा पाता विधाता!            (अज विलाप/रघुवंश)

स्वामिनी गृह की रहीं तुम
               
मंत्रणा में सचिव तत्पर,
          
कक्ष के एकांत में मेरी
               
तुम्हीं प्रिय संगिनी वर।
          
तुम कलाओं में ललित
               
मेरी रहीं शिष्या प्रवीणा,
          
निष्करुण यम ने तुम्हीं को
               
छीन क्या मेरा न छीना!              (रघुवंश)

           यह वही सरयू, सदा मेरे लिए जो मान्य,
          
धाय उत्तर कोशलों की एक जो सामान्य।
          
पुष्ट होते वे इसी की खेल सिकता-गोद,
          
वृद्धि पाते हैं मधुर पय-पान से सामोद।           (रघुवंश)

     आज विदा होगी शकुंतला
               
सोच हृदय आता है भर-भर,
          
दृष्टि हुई धुँधली चिंता से
               
रुद्ध अश्रु से कंठ रुद्धस्वर।
          
जब ममता से इतना विचलित
               
व्यथित हुआ वनवासी का मन,
          
तब दुहिता विछोह नूतन से
               
पाते कितनी व्यथा गृहीजन!              (अभिज्ञान शाकुंतल)

‘साधारण को इस प्रकार ‘असाधारण बनाने की कला ही कालिदास की श्रेष्ठता का आधार है।

कालिदास के परवर्ती संस्कृत कवियों में महादेवी के अनुसार भवभूति (आठवीं शती) का व्यक्तित्व सबसे विशिष्ट है।  इस विद्रोही कवि का अधिकांश जीवन संघर्ष में व्यतीत हुआ। इनके तीन नाटक उपलब्ध हैं - महावीरचरित, मालतीमाधव और उत्तररामचरित। महादेवी के अनुसार करुणा भवभूति के चिंतन का केंद्रबिंदु भी है और जीवन का सम भी, अतः किसी भी दुःखार्त के प्रति उनकी समवेदना सहज है। उन्होंने विशेष रूप से लक्षित किया है कि भवभूति के युग के समाज की नारी और शूद्र आदि के प्रति जो हीन भावना और अंध रूढ़ियों के प्रति जो निष्ठा रही होगी, उससे कवि प्रभावित नहीं जान पड़ता। उत्तररामचरित में राम के स्वगत कथन इसका ज्वलंत प्रमाण हैं -

           दलित उर को कर रहा है घोर दुख का वेग,
               
पर नहीं दो खंड हो जाता हृदय यह टूट।
          
शोक-मूर्च्छित हो रही है विकल मेरी देह,
               
चेतना से, किंतु यह पाती नहीं है छूट।
          
दग्ध करता गात मेरा तीव्र अंतर्दाह,
               
किंतु उसको कर न पाता वह जलाकर क्षार।
          
नियति मेरे मर्म पर करती कठिन आघात
               
काटती है, किंतु वह मेरा न जीवन-तार।         (उत्तररामचरित)

सप्तपर्णा के अंतर्गत आर्षवाणी, वाल्मीकि, थेरगाथा, अश्वघोष, कालिदास और भवभूति के बाद सातवें सोपान पर महादेवी वर्मा ने जयदेव को प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने बताया है कि जयदेव (१२वीं शती का पूर्वार्द्ध) का जब आविर्भाव हुआ तब संस्कृत के श्रृंगारी काव्य के नायक-नायिका के रूप में राधाकृष्ण की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। महादेवी ने यह भी स्पष्ट किया है कि श्रृंगार-भाव जीवन की मूलप्रवृत्तियों में स्थिति रखता है, अतः अन्य मूलप्रवृत्तियों के समान उसका भी संस्कार और उदात्तीकरण स्वाभाविक है तथा जयदेव ने ‘गीत गोविंद के माध्यम से यही सांस्कृतिक दायित्व संपन्न किया है।

महादेवी परंपरा के प्रवाह की पड़ताल करते हुए बताती हैं कि भारतीय गीत साहित्य अंतरंग और बहिरंग दोनों में विविध है। इसके अंतर्गत उषा की दिव्य सुषमा से लेकर दादुर की ध्वनि तक को अपनी सीमा में सुरक्षित रखनेवाले वेदगीत हैं। भिक्षु-भिक्षुणियों के साधनामय जीवन की कथा सुनानेवाले गीतिवृत्त हैं। दैनंदिन जीवन के अतिपरिचित और क्षणिक सुख-दुःख, मिलन-विरह, पर्व-उत्सव आदि को लय के तार में गूँथ कर अक्षय माधुर्य देनेवाले लोकगीत हर साँस में मुखरित हैं। सिद्धों के गूढ़ और गुरु ज्ञान को संगीत के पंख देनेवाले मंत्रगीत भी साहित्य का महार्घ न्यास हैं। सारांश यह कि बुद्धि की जटिल प्रक्रिया से हृदय की सरल संप्रेषणीयता तक, जो कुछ भारतीय प्रतिभा संचित कर सकी, उसे उसने जीवन का छंद बना कर कंठों में सुरक्षित रखने का अथक प्रयास भी किया है। गीतगोविंद, इस अविच्छिन्न गीत परंपरा की मूल्यवान कड़ी है। यथा -

           छाया सरस वसंत विपिन में,
               
करते श्याम विहार!
          
युवति जनों के संग रास रच
               
करते श्याम विहार!
          
ललित लवंग लताएँ छूकर
               
बहता मलय समीर;
          
अलि-संकुल पिक के कूजन से
               
मुखरित कुंज-कुटीर;
                    
विरहि-जनों के हित दुरंत
                          
इस ऋतुपति का संचार!
                               
करते श्याम विहार!         (गीत गोविंद)

     जयदेव की कविता को श्रृंगारिक कहें या भक्ति परक - इस विवाद को अनावश्यक मानते हुए महादेवी ने प्रतिपादित किया है कि राधाकृष्ण को केंद्र बनाकर चलनेवाली श्रृंगार-उपासना और उन्हें आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक मान कर विकास करनेवाली भक्ति-भावना की संधि में जयदेव का आविर्भाव होने के कारण उन्हें दोनों का दायभाग अनायास प्राप्त हो गया।

     इस प्रकार, महादेवी जी ने सप्तपर्णा में संस्कृत और पालि साहित्य के चयनित अंशों का काव्यानुवाद प्रस्तुत करते समय अपनी दृष्टि भारतीय चिंतनधारा और सौंदर्यबोध की परंपरा के इतिहास पर केंद्रित रखी है। उनकी यह कृति उन्हें एक सफल सृजनात्मक काव्यानुवादक, साहित्येतिहासकार तथा संस्कृति-चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित करने में पूर्ण समर्थ है, इसमें संदेह नहीं। अंततः कवयित्री के शब्दों में कहें तो -

भारतीय वाङ्मय की रूपमयता विविध और चेतना सर्वात्मिका है। उसमें से कुछ पंक्तियाँ लेकर उसका परिचय देना, कुछ बूँद जल लेकर समुद्र का परिचय देने के समान हो जाता है। पर यह सत्य है कि हम अपनी छोटी गंगाजली में जितना जल भर लेते हैं, उतना ही तो गंगा में नहीं होता और जितनी वर्षा से हमारा बोया बीज अंकुरित हो जाता है, उतनी ही तो मेघ के जलदान की सीमा नहीं होती।

महादेवी के असीम अवदान की तुलना में यह आलेख भी अत्यंत सीमित प्रयास भर ही तो है!


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