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| 12.22.2007 |
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कठिन पल |
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जीवन के कठिन इस पथ में
पल क्यूँ निरर्थक लगते हैं, हर राह हमारी है सूनी सी हम यूँ ही अकेले चलते हैं। ऐसे भी कई मौसम हैं यहाँ जिन्हें लोग बहारें कहते हैं, हमें जो सदा घेरे रहते हैं उन्हें लोग पतझड़ कहते हैं। ग़ैरों के साथ का भ्रम न था अपनों ने दर्द बहुत दिए हैं, काँटों से बचना तो जाना था घाव फूलों से क्यूँ आज मिले हैं। रातों की ख़ामोशियों में हम सितारों को ढूँढते रहते हैं, निकले जो वो कभी पर्दे से बेज़ार हम से ज़्यादा लगते हैं। आशियाना बनाने की तमन्ना की नज़र ज़माने वाले लगाते हैं, आँसू हमारी आँखों को देकर मुस्कुराने की सज़ा सुनाते हैं। दोस्तों की तलाश में निकले तो दुश्मनों के काफ़िले मिलते हैं, भगवान से की जब शिकायत तो कुछ वो भी तुम्हारे निकले हैं। |
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