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12.22.2007
 

चुनाव अभियान
रिकी मेहरा


गलियाँ विरान, मोहल्ला सुनसान, शहर जैसे शमशान है
कहीं आँखों में नमी, कहीं अश्क, कहीं इन्सान परेशान है।

जले वहाँ, फूँकी ईमारतें, बिखरा हर ओर सामान है
जाने कहाँ से इस ओर आया सियासत का तूफ़ान है।

जज़्बात का बवण्डर बन के आया वो हैवान है
काँप उठी धरती, भीगा रक्तपात से आसमान है।

भोर में न शंख बजा, शाम को सुना ना आज़ान है
लहू बहा जिन धर्मों का, रंग उन सबका समान है।

ना यह जंग, ना ज़लज़ला, ना किसी आपदा का पैग़ाम है
भारत की राजनीति का यह सिर्फ़ एक चुनाव अभियान है।

और अन्त में, एक पार्टी कार्यकर्त्ता जो चुनाव के इस
मन्जर को देख रहा है, अपने नेता से कहता है-

मेरे दिल से राजनीति का असर कुछ यूँ कम हुआ
तेरे आने की ना खुशी हुई और न जाने का ग़म हुआ

लोग मुझसे पूछते हैं हमारे मुल्क की दास्तां
कहता हूँ मैं रोकर कि एक फ़साना था जो अब ख़त्म हुआ

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