Sahitya Kunj – ऋचा वर्मा – Richa Verma

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ISSN 2292-9754

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01.29.2018


कविता की उपज

कविता यूँ ही नहीं कल्पती
किसी दृश्य के सरोकार से अनायास ही

हृदय की तलहटी में
जो कई छाप छूट गयी हैं
जिन्हें हम साथ ले आये थे
कुछ ख़ास जगहों से

उन्हीं विचारों का
निर्बाध मंथन
...और तब वह
घुमड़ घुमड़ कर आती है ऊपर तक।

जैसे मथते मथते दही से
मक्खन स्वतः ही सतह पर आ जाता है
या फिर पानी की तली में पड़े
चावल को जब ऊर्जा मिलती है
तो वह अपने पूरे आकार
और स्वाद से भर जाता है

वर्षों से पल रहे विचारों का पुलंदा
अपने प्रतिबिंब की तलाश में घूमता है
आख़िर इन्हें ख़र्चना है
सुखद भविष्य के लिए

पर याद रहे कि कवि हो
कोई दलाल न हो
महज़ बयान न हो उन पदों में
कोई सवाल भी हो।


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